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पत्रकार

Illustration/Perplexity AI

भारत के नए आय कर कानून से स्वतंत्र पत्रकार और डिजिटल क्रिएटर क्यों डरे हुए हैं?

भारत की संसद ने 12 अगस्‍त को आय कर कानून, 2025 पारित किया था। इसके बाद मीडिया में यह चर्चा जोर पकड़ने लगी कि टैक्‍स अधिकारी अब अपने विस्‍तारित अधिकारों का दुरुपयोग कर के कहीं पत्रकारों के स्रोतों को उजागर न करने लगें, उनकी निगरानी न करने लग जाएं और वित्तीय अपराधों के आरोपों से उन्‍हें निशाना न बनाने लग जाएं। इस संदर्भ में कमेटी टु प्रोटेक्‍ट जर्नलिस्‍ट्स (सीपीजे) की सोमी दास ने सरकार की मीडिया पर बढ़ती हुई निगरानी और नए कर कानून के निहितार्थों पर इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन के अपार गुप्‍ता से बात की है।

पत्रकारों का सरकारी उत्पीड़न बढ़ा, 2022 में 194 पत्रकार हमलों का शिकार: RRAG

बीते 27 जून को जारी एक विज्ञप्ति में आरआरएजी ने बताया कि 194 में से 103 पत्रकारों को राजकीय हमले का शिकार होना पड़ा जबकि 91 पत्रकारों को राजनीतिक कार्यकर्ताओं और राज्‍येतर इकाइयों ने अपना निशाना बनाया।

श्रद्धांजलि: शीतला जी ने मिशन और सेकुलर पत्रकारिता का उच्च मापदंड स्थापित किया

अयोध्या से निकलने वाले सहकारी अखबार ‘जनमोर्चा’ के संस्थापक और प्रधान संपादक शीतला सिंह के निधन पर उन्हें याद कर रहे हैं ‘ब्लिट्ज’ से जुड़े रहे लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप कपूर

भारत का पत्रकार मानवाधिकार कार्यकर्ता कैसे बना?

इस प्रेस स्‍वतंत्रता दिवस पर युनेस्‍को की थीम में एक अदृश्‍य सबक छुपा है, कि अब समुदाय, पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता के बीच अंतर बरतने का वक्‍त जा चुका

A Baiga tribal with her infant in the government hospital, Balaghat

बालाघाट: ‘नक्सलमुक्त’ जिले में मलेरिया से मर रहे कुपोषित बच्चों का जिम्मेदार कौन?

बालाघाट के वनांचल में रहने वाले आदिवासियों को दशकों के ‘लाल आतंक’ से पिछले साल मुक्ति मिली ही थी कि उनके शरीर पर किसी अभिशाप की तरह लाल चकत्ते उभरना शुरू हो गए। शुरू में तो उन्‍होंने भी इसे दैवीय प्रकोप ही माना, फिर बुखार चढ़ा तो पहले से कुपोषित शरीर ने चिकित्‍सा सेवाओं के अभाव में जवाब देना शुरू कर दिया। जून में पहले बच्‍चे की मौत हुई। आज बच्‍चों की मौत का आंकड़ा दो दर्जन के पार जा चुका है। राज्‍य को नक्‍सलमुक्‍त घोषित कर के अपनी पीठ थप‍थपा चुकी सरकार मलेरिया से हलकान है। विरोध में आदिवासियों ने जिला बंद का आह्वान कर डाला है। बालाघाट से नितेश उचबगले की रिपोर्ट

BJP, Bengal and Gen Z still in a single frame

बंगाल: सौ दिन की सरकार, GenZ की फुहार और दिसंबर का मौन इंतजार

बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की सरकार को बने सौ दिन पूरे हो गए। वैसे तो इस प्राचीन महादेश में पचास साल में भी कुछ खास नहीं बदलता, पर हर नई सरकार का रिपोर्ट कार्ड जांचने की पुरानी पत्रकारीय रवायत भी है। यहां सरकार भले मई में बदल चुकी थी, लेकिन उसके ठीक बाद हुए जेन ज़ी आंदोलन ने सिर मुंड़ाते ओले पड़ने की कहावत चरितार्थ कर दी। नतीजा- ऊपरी बदलावों को छोड़ दें, तो बंगाल में फिलहाल सब कुछ ठहरा हुआ है या कहें जस का तस है। हर कोई अपने वक्‍त के इंतजार में एक-दूसरे को ताड़ रहा है। बीते एक साल से बंगाल पर करीबी निगाह रखे अमन गुप्‍ता की फॉलो-अप रिपोर्ट

RSS Chief Shri Mohan Bhagwat

GenZ-भागवत संवाद : काल के कठघरे में खड़ा संघ और सवाल पूछता नए दौर का प्रतिवादी

सत्ता के ऊपर फुलप्रूफ नियंत्रण के बावजूद देश में स्थितियां कुछ ऐसी बन चुकी हैं कि न सिर्फ पांचसाला चुनाव लड़ने वाली भाजपा, बल्कि भविष्‍य को अपने वैचारिक निर्धार के हिसाब से गढ़ने वाली उसकी मातृसंस्‍था आरएसएस भी बेचैन है। बेचैनी इस हद तक कि पचहत्तर पार कर रहे इनके शीर्ष बुजुर्गों को युवाओं से सीधा संवाद करने की मजबूरी आन पड़ी है। कभी संकेतों में राजनीति करने वाला संघ अब अपने ही कहे का व्‍याख्‍याकार है। संघ प्रमुख आजकल जितना बोल रहे हैं, वह अभूतपूर्व है। क्‍या बदले हुए समय और पीढ़ी के साथ यह महज तादात्‍म्‍य बैठाने की कवायद है या कुछ और? हालिया घटनाक्रम पर संघ के जानकार व्‍यालोक की टिप्‍पणी

आंदोलन, दमन और बेकारी: दिल्ली NCR के मजदूर आंदोलन पर जन हस्तक्षेप की जांच रिपोर्ट

दिल्‍ली से सटे नोएडा, गुड़गांव और मानेसर में बीते अप्रैल में भड़के मजदूरों के गुस्‍से और राज्‍य द्वारा दमन की पूरी कहानी सुनाई जानी अभी बाकी है। जो हजार से मजदूर गिरफ्तार किए गए थे, उन्‍हें अब भी कोई नहीं जानता। जो बंद हैं, उनमें भी चार-पांच सार्वजनिक चेहरे ही पोस्‍टरों पर हैं। अनाम और बेनाम मजदूर जो गांव लौट गए थे, वापस आकर बेरोजगार पड़े हैं। जो भीतर हैं, उनके परिजन जेल के चक्‍कर काट रहे हैं। मजदूर आंदोलन और दमन पर नागरिक मंच ‘जन हस्‍तक्षेप’ ने एक जांच रिपोर्ट दिल्‍ली में 19 जून को जारी की है। उसके कुछ संपादित अंश

Pyre protest against Ken-Betwa project in April 2026

लोकप्रियता के दौर में जल, जंगल और जमीन के संघर्ष : संदर्भ केन-बेतवा आंदोलन

देश में आजकल आंदोलन का माहौल है- जमीन पर कम (या कम-चर्चित) और इंटरनेट पर ज्‍यादा। ऐतिहासिक अन्‍यायों और हकमारी के खिलाफ देश भर में दशकों से लगातार चल रहे सत्ता-विरोधी जमीनी जन आंदोलनों की जगह एक बार फिर आभासी तिकड़मों से छेकने की कोशिश की जा रही है, जैसा 2011 में हुआ था। इस बार भी तमाम आंदोलनकारी भ्रमित हो रहे हैं। ‘जेन-ज़ी’ की पीठ पर जारी इस हो-हल्‍ले में लगातार बारह दिन तक सत्‍याग्रह करने वाले केन-बेतवा परियोजना-विरोधी आदिवासी औरतों और बुजुर्गों की आवाज कहीं दब गई है। हालिया केन-बेतवा नदीजोड़ विरोधी आंदोलन को सतीश भारतीय ने विस्‍तार से कवर किया है। उनके मध्‍य प्रदेश से भेजे डिस्‍पैच, बातचीत और अतीत के प्रसंगों के सहारे इस पर्यावरण दिवस पर जल, जंगल, जमीन बचाने वाले जन आंदोलनों की गति और नियति पर यह लंबी कहानी

Cow chewing TMC flag, a roadside view in Kolkata

बंगाल: भारत का इकलौता चुनाव, जिसमें जीत-हार के आगे-पीछे कायम है भय की दोहरी सियासत

पश्चिम बंगाल का बहुचर्चित चुनाव 4 मई को आए परिणामों के साथ तकनीकी रूप से समाप्‍त हो गया है, लेकिन ऐसा लगता है कि यह परिणाम लंबी चलने वाली एक फिल्‍म का केवल ट्रेलर था। चुनाव नतीजे के दो दिनों के भीतर जो भयावह और हिंसक घटनाक्रम देखने में आया है, वह बंगाल की धरती पर कायम सियासी ध्रुवीकरण का स्‍वाभाविक विस्‍तार लगता है। इस चुनावी फिल्‍म का मुख्‍य प्‍लॉट था डर, जिसे हारने और जीतने वाले दोनों दलों ने बराबर पैदा किया, पाला-पोसा और लगातार आगे बढ़ाया। पिछले एक साल से पश्चिम बंगाल घूम रहे अमन गुप्‍ता की यह कहानी समझाती है कि आजाद भारत में यह चुनाव ऐतिहासिक क्‍यों था