पुस्तक अंश : बनारस की ‘अदृश्य औरतों’ को सुने बगैर इस शहर को क्यों नहीं समझा जा सकता?
बनारस या काशी पर अतीत से लेकर अब तक जितनी किताबें लिखी गई हैं, भारत में उसका कोई जोड़ नहीं है। तकरीबन हर मशहूर किताब काशी की शाश्वत और पवित्र छवि को ही उभारती है। काल प्रवाह में जम चुकी बनारस की इस छवि पर आलोचनात्मक शब्द कम लिखे गए हैं। फ्रंटपेज प्रकाशन से शीघ्र प्रकाशित होने वाली लेनिन रघुवंशी, चंद्र मिश्रा और श्रुति नागवंशी द्वारा सह-लिखित ‘काशी’ इस मायने में पुरानी लीक को न सिर्फ तोड़ती है, बल्कि बन और बिगड़ रहे बनारस पर एक बार फिर से सोचने को मजबूर करती है। कुल 12 अध्यायों में बंटी अंग्रेजी में लिखी यह पुस्तक धर्म और मिथक से लेकर सामान्य जीवन में छुपे प्रतिरोध के दर्शन, जाति-वर्ग-लिंग से लेकर बाजार तक बंटवारे की राजनीति और उम्मीद के संभावित तत्त्वों पर एक जटिल सूत्रीकरण है। प्रकाशक और लेखकों की अनुमति से पुस्तक के सातवें अध्याय से चुने हुए कुछ अनूदित अंश