Politics

A Gen-Z protestor at Jantar Mantar, 24 July 2026 (Abhishek Srivastava/FUS)

क्‍या लोकतंत्र में तानाशाही को संवैधानिक रूप से बैन किया जा सकता है? एक जरूरी सबक

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क्‍या लोकतंत्र में एक अलोकतांत्रिक दल पर प्रतिबंध की कार्रवाई करना अलोकतांत्रिक है? यह दुविधा कम से कम सौ साल पुरानी है, लेकिन इसे हल करने की मिसाल 1950 के दशक के जर्मनी में मौजूद है। जब लोकतंत्र को निगल जाने वाली तानाशाही ताकत चुनावी रास्‍ते से सत्ता में आ जाए, तो संविधान और अदालतें बहुत कुछ ऐसा कर सकती हैं जिससे लोकतंत्र में स्‍वस्‍थ राजनीतिक प्रतिस्‍पर्धा की बहाली हो सके। प्रिंस्‍टन में राजनीतिशास्‍त्र के प्रोफेसर यान-वर्नर म्‍यूलर की प्रासंगिक टिप्‍पणी, प्रोजेक्‍ट सिंडिकेट के सौजन्‍य से

Prof. Arun Kumar

पूंजी के राज में मजदूर कैसे बेदखल और अदृश्य हो गया? अर्थशास्त्री प्रो. अरुण कुमार का व्याख्यान

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मौजूदा दुनिया में जब भी मजदूरों की बात होगी, सबसे बुनियादी अंतर्विरोध पूंजी बनाम श्रम से ही बात उठेगी। पिछले सौ साल में कैसे पूंजी की बढ़ती हुई ताकत ने श्रमिकों को संगठित होने से रोका, कमजोर किया, कभी उनके संगठित होने का फायदा उठाया तो कभी उन्‍हें बिखेर दिया, यह न सिर्फ पूंजीवाद बल्कि मजदूर आंदोलन का भी इतिहास है। इसी इतिहास की रोशनी में और भारत के असंगठित मजदूरों के खास संदर्भ में आज की दुनिया और भविष्‍य के खतरों पर अर्थशास्‍त्री प्रो. अरुण कुमार ने दिल्‍ली में 5 जून 2026 को एक लंबा व्‍याख्‍यान दिया। व्‍याख्‍यान जेएनयू में उनके सहपाठी रहे शिक्षाविद अनिल चौधरी की स्‍मृति में था। उस व्‍याख्‍यान का लिप्‍यंतरित, संक्षिप्‍त और संपादित रूप

आंदोलन, दमन और बेकारी: दिल्ली NCR के मजदूर आंदोलन पर जन हस्तक्षेप की जांच रिपोर्ट

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दिल्‍ली से सटे नोएडा, गुड़गांव और मानेसर में बीते अप्रैल में भड़के मजदूरों के गुस्‍से और राज्‍य द्वारा दमन की पूरी कहानी सुनाई जानी अभी बाकी है। जो हजार से मजदूर गिरफ्तार किए गए थे, उन्‍हें अब भी कोई नहीं जानता। जो बंद हैं, उनमें भी चार-पांच सार्वजनिक चेहरे ही पोस्‍टरों पर हैं। अनाम और बेनाम मजदूर जो गांव लौट गए थे, वापस आकर बेरोजगार पड़े हैं। जो भीतर हैं, उनके परिजन जेल के चक्‍कर काट रहे हैं। मजदूर आंदोलन और दमन पर नागरिक मंच ‘जन हस्‍तक्षेप’ ने एक जांच रिपोर्ट दिल्‍ली में 19 जून को जारी की है। उसके कुछ संपादित अंश

Emperor's mask has fallen, representative image made by AI

मुखौटा गिर चुका है: शासक की निजी डिजिटल जागीर बनते जा रहे देश और नागरिक के सवाल पर

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दुनिया की राजनीति और आर्थिकी आपस में मिलकर कैसे आधुनिक राज्‍य के चरित्र को बदल रही है; सम्‍प्रभु लोकतांत्रिक राष्‍ट्रों के भीतर चुनी हुई सरकार और नागरिक के बीच का रिश्‍ता कैसे विकृत हो रहा है; और अपनी अंतर्वस्‍तु व स्‍वरूप में हर लोकशाही कैसे राजशाही की ओर बढ़ रही है; इन विषयों पर दुनिया भर में कोरोना के बाद से बहुत चर्चा हुई है। भारत अपवाद है। यहां राज्‍य-सम्‍बंधी विमर्श नदारद दिखता है जबकि पांचसाला चुनाव ही विमर्शों के केंद्र में रहता है। फॉलो-अप स्‍टोरीज़ के संरक्षक रहे दिवंगत शिक्षाविद् अनिल चौधरी राज्‍य, सरकार, कानून और समाज की जटिल गुत्‍थी पर लगातार बोलते थे। उनके 76वें जन्‍मदिवस पर दिल्‍ली में आयोजित सम्मिलन इसी विषय पर परिचर्चा का बायस बना। सम्मिलन में प्रस्‍तुत अरुण सिंह का लिखा यह आधारपत्र बदलती हुई दुनिया पर कुछ रोशनी डालता है

Cow chewing TMC flag, a roadside view in Kolkata

बंगाल: भारत का इकलौता चुनाव, जिसमें जीत-हार के आगे-पीछे कायम है भय की दोहरी सियासत

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पश्चिम बंगाल का बहुचर्चित चुनाव 4 मई को आए परिणामों के साथ तकनीकी रूप से समाप्‍त हो गया है, लेकिन ऐसा लगता है कि यह परिणाम लंबी चलने वाली एक फिल्‍म का केवल ट्रेलर था। चुनाव नतीजे के दो दिनों के भीतर जो भयावह और हिंसक घटनाक्रम देखने में आया है, वह बंगाल की धरती पर कायम सियासी ध्रुवीकरण का स्‍वाभाविक विस्‍तार लगता है। इस चुनावी फिल्‍म का मुख्‍य प्‍लॉट था डर, जिसे हारने और जीतने वाले दोनों दलों ने बराबर पैदा किया, पाला-पोसा और लगातार आगे बढ़ाया। पिछले एक साल से पश्चिम बंगाल घूम रहे अमन गुप्‍ता की यह कहानी समझाती है कि आजाद भारत में यह चुनाव ऐतिहासिक क्‍यों था

A saffron clad man crossing College Street in Kolkata

पश्चिम बंगाल : जीत-हार से परे, राजनीति की ऑप्टिक्स को कैसे बदल रहा है प्रवासी ‘हिन्दुस्तानी’ वोटर

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पश्चिम बंगाल में 29 अप्रैल को दूसरे और आखिरी चरण का मतदान होना है। वोटिंग कलकत्ते में भी है, जो उत्तर-भारतीय प्रवासियों का सबसे बड़ा केंद्र है। इसी वोटबैंक के दम पर भारतीय जनता पार्टी पश्चिम बंगाल की सत्ता में आने का दावा कर रही है। चुनाव के सबसे बड़े सवाल हार-जीत से इतर, असल कहानी यह है कि हिंदी बोलने वाले उत्तर भारत के प्रवासी बंगाल की राजनीति को देखने-समझने के तरीकों को कैसे बुनियादी ढंग से बदल रहे हैं। अमन गुप्‍ता पिछले साल भर से बंगाल जाकर वहां की बदलती हुई जमीन का जायजा लेते रहे हैं। अब भी वे कोलकाता में ही हैं। बंगाल में राजनीतिक धारणा-निर्माण और प्रवासियों के बीच रिश्‍ते पर अमन गुप्‍ता के अनुभवों का निचोड़ बताती उनकी ही कहानी

God and Rebel

बाग़ी बादशाह ट्रम्प : वही क़ातिल वही मुंसिफ़ अदालत उसकी वो शाहिद…

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पूरी दुनिया के शासक आज की तारीख में राज्‍येतर गिरोहों के सहारे अपना राज कायम किए हुए हैं ताकि वे सुविधाजनक ढंग से अपनी कार्रवाइयों से इनकार कर सकें, लेकिन एक ऐसा शख्‍स है जो अपने गिरोहों से दूरी नहीं कायम रखता- ट्रम्‍प! अमेरिका का राष्‍ट्रपति कानून का रखवाला है लेकिन कानून तोड़ने वाले गिरोहों का सबसे बड़ा सरगना भी; वह सरकार है लेकिन सरकार से निजी हर्जाने की मांग कर रहा मुकदमे में खड़ा वादी भी है। प्रोजेक्‍ट सिंडिकेट के सौजन्‍य से ट्रम्‍प पर ज़ीज़ेक की टिप्‍पणी

MAGA rally US, Courtesy Project Syndicate

किताबी फासीवाद : अपने वैचारिक वारिसों के लिए बीसवीं सदी के फासिस्टों की नुस्खा-पर्ची कैसी होगी?

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जो नाज़ीवादी और फासीवादी ताकतें बीसवीं सदी में चले लोकतांत्रिक संघर्षों में खत्‍म हो गई मानी जा रही थीं, उनका इक्‍कीसवीं सदी में नई शक्‍ल में उभार यह सोचने को विवश करता है कि उनकी योजना क्‍या है और आने वाली दुनिया की सूरत कैसी होगी। प्रोजेक्‍ट सिंडिकेट के सौजन्‍य से प्रसिद्ध अर्थशास्‍त्री यानिस वारूफाकिस की एक कल्‍पना, जिसमें वे गिनवा रहे हैं कि आज के फासिस्‍टों के पूर्वज अगर किसी तिजोरी में कोई नुस्‍खा-पर्ची छोड़ गए रहे हों तो उस पर क्‍या-क्‍या लिखा होगा।

Kailash Vijayvargiya

इंदौर : दो दर्जन मौतों के बाद वह इस्तीफा, जिसका इंतजार तो सबको था पर अब तक हुआ नहीं

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कैलाश विजयवर्गीय ने कभी कहा था कि संघ ही देश को बचा सकता है। जाहिर है, फिर संघ ऐसा कहने वाले को क्‍यों न बचाता? खासकर तब, जब उस शख्‍स की ऐसी तूती बोलती है कि खुद कांग्रेस के नेता भी उसी के भरोसे राजनीति करते हैं। नतीजा, कलक्‍टर तक संघ के दफ्तर तलब कर लिए गए। इंदौर के भागीरथपुरा में जब दो दर्जन लोग गंदा पानी पीकर मरे और अभूतपूर्व ढंग से एक स्‍वर में कैलाश की गरदन मांगी गई, तो इस मांग का मजाक बनना तय था। पूरी कहानी सुना रहे हैं इंदौर से लौटकर अमन गुप्‍ता

100 Years of CPI

भारत में कम्युनिस्ट पार्टी के सौ साल : शहादतों, योगदानों और संघर्षों का एक सरल सफरनामा

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सौ साल पहले यह प्रयोग रहा होगा, लेकिन आज संयोग लगता है कि भारत सरकार को चलाने वाली राजनैतिक पार्टी की मातृसंस्‍था आरएसएस और उसकी राजनीति की सतत विरोधी रही कम्‍युनिस्‍ट पार्टी के सौ साल एक साथ 2025 में पूरे हुए हैं। एक सदी के दौरान कई धड़ों और धाराओं में बंट चुकी कम्‍युनिस्‍ट पार्टी आज भले अपने अवसान पर दिखती है, लेकिन इस समाज को दिए उसके योगदानों और शहादतों की दास्‍तान बहुत लंबी और बड़ी है, जिससे युवा पीढ़ी अधिकांशत: अनजान है। भारतीय कम्‍युनिस्‍ट पार्टी की स्‍थापना के सौ वर्ष पूरे होने पर ट्राइकॉन्टिनेंटल सामाजिक शोध संस्‍थान के कई डोजियर से तैयार की हुई एक सरल कहानी को फॉलो-अप स्‍टोरीज़ साभार अपने पाठकों के लिए प्रस्‍तुत कर रहा है।