Politics

The Battle of Chile

बीत चुकी दुनिया और उसके लोगों की एक फिल्म, जो उम्मीद की स्मृतियां बहाल करती है!

by

डॉक्‍युमेंटरी निर्माताओं में बहुत कम लोग ऐसे हैं जिनका समूचा काम एक ही विषय के इर्द-गिर्द अलग-अलग पहलुओं को समेटता हुआ अपने समय के कालानुक्रमिक दस्‍तावेज जैसा हो। चिली की तानाशाही और लोकजीवन के प्रसंग में पात्रीसियो गुज्‍़मान ने आजीवन जो काम किया, वही काम बीते पचास साल से आनंद पटवर्धन भारत में साम्‍प्रदायिकता की विभिन्‍न छायाओं के साथ कर रहे हैं। स्‍वाभाविक है कि गुज्‍़मान के काम का पटवर्धन पर गहरा असर रहा होगा। खुद आनंद पटवर्धन के शब्‍दों में, गुज्‍़मान की ऐतिहासिक फिल्‍म ‘द बैटल आफ चिली’ पर कुछ शब्‍द

Fatima Nafees, mother of disappeared JNU student Najeeb Ahmad

गुमशुदा बच्चों के नाम: माल्विनास की बर्बरताएं, मार्केज़ के विवरण और माँओं की बददुआएं

by

जेएनयू के छात्र नजीब को गायब हुए अगले महीने दस साल पूरे हो जाएंगे। उसकी सरकारी फाइल बंद की जा चुकी है, लेकिन माँ फातिमा ने हार नहीं मानी है। उनकी कानूनी लड़ाई जारी है- बिलकुल अर्जेंटीना की एस्तेला कार्लोतो की तरह, जिन्‍होंने अपनी आधे से ज्‍यादा जिंदगी अपनी बेटी और नाती को खोजने में लगा दी। जिस देश में हर साल चार से पांच लाख लोग ‘गुमशुदा’ दर्ज किए जाते हैं, वहां उनकी कहानियां कहने पर लगी अघोषित पाबंदी मार्केज़ की याद दिलाती है, जिन्‍होंने सबसे पहले माल्विनास में अर्जेंटीना के गुमशुदा बेटों की नियति को उजागर किया था। मार्केज़ अब सौ साल के हो रहे हैं। विद्यार्थी चटर्जी का यह लेख मार्केज़ की जन्‍मशती, नजीब की गुमशुदगी और दुखियारी माँओं के नाम

BJP, Bengal and Gen Z still in a single frame

बंगाल: सौ दिन की सरकार, GenZ की फुहार और दिसंबर का मौन इंतजार

by

बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की सरकार को बने सौ दिन पूरे हो गए। वैसे तो इस प्राचीन महादेश में पचास साल में भी कुछ खास नहीं बदलता, पर हर नई सरकार का रिपोर्ट कार्ड जांचने की पुरानी पत्रकारीय रवायत भी है। यहां सरकार भले मई में बदल चुकी थी, लेकिन उसके ठीक बाद हुए जेन ज़ी आंदोलन ने सिर मुंड़ाते ओले पड़ने की कहावत चरितार्थ कर दी। नतीजा- ऊपरी बदलावों को छोड़ दें, तो बंगाल में फिलहाल सब कुछ ठहरा हुआ है या कहें जस का तस है। हर कोई अपने वक्‍त के इंतजार में एक-दूसरे को ताड़ रहा है। बीते एक साल से बंगाल पर करीबी निगाह रखे अमन गुप्‍ता की फॉलो-अप रिपोर्ट

RSS Chief Shri Mohan Bhagwat

GenZ-भागवत संवाद : काल के कठघरे में खड़ा संघ और सवाल पूछता नए दौर का प्रतिवादी

by

सत्ता के ऊपर फुलप्रूफ नियंत्रण के बावजूद देश में स्थितियां कुछ ऐसी बन चुकी हैं कि न सिर्फ पांचसाला चुनाव लड़ने वाली भाजपा, बल्कि भविष्‍य को अपने वैचारिक निर्धार के हिसाब से गढ़ने वाली उसकी मातृसंस्‍था आरएसएस भी बेचैन है। बेचैनी इस हद तक कि पचहत्तर पार कर रहे इनके शीर्ष बुजुर्गों को युवाओं से सीधा संवाद करने की मजबूरी आन पड़ी है। कभी संकेतों में राजनीति करने वाला संघ अब अपने ही कहे का व्‍याख्‍याकार है। संघ प्रमुख आजकल जितना बोल रहे हैं, वह अभूतपूर्व है। क्‍या बदले हुए समय और पीढ़ी के साथ यह महज तादात्‍म्‍य बैठाने की कवायद है या कुछ और? हालिया घटनाक्रम पर संघ के जानकार व्‍यालोक की टिप्‍पणी

A Gen-Z protestor at Jantar Mantar, 24 July 2026 (Abhishek Srivastava/FUS)

क्‍या लोकतंत्र में तानाशाही को संवैधानिक रूप से बैन किया जा सकता है? एक जरूरी सबक

by

क्‍या लोकतंत्र में एक अलोकतांत्रिक दल पर प्रतिबंध की कार्रवाई करना अलोकतांत्रिक है? यह दुविधा कम से कम सौ साल पुरानी है, लेकिन इसे हल करने की मिसाल 1950 के दशक के जर्मनी में मौजूद है। जब लोकतंत्र को निगल जाने वाली तानाशाही ताकत चुनावी रास्‍ते से सत्ता में आ जाए, तो संविधान और अदालतें बहुत कुछ ऐसा कर सकती हैं जिससे लोकतंत्र में स्‍वस्‍थ राजनीतिक प्रतिस्‍पर्धा की बहाली हो सके। प्रिंस्‍टन में राजनीतिशास्‍त्र के प्रोफेसर यान-वर्नर म्‍यूलर की प्रासंगिक टिप्‍पणी, प्रोजेक्‍ट सिंडिकेट के सौजन्‍य से

Prof. Arun Kumar

पूंजी के राज में मजदूर कैसे बेदखल और अदृश्य हो गया? अर्थशास्त्री प्रो. अरुण कुमार का व्याख्यान

by

मौजूदा दुनिया में जब भी मजदूरों की बात होगी, सबसे बुनियादी अंतर्विरोध पूंजी बनाम श्रम से ही बात उठेगी। पिछले सौ साल में कैसे पूंजी की बढ़ती हुई ताकत ने श्रमिकों को संगठित होने से रोका, कमजोर किया, कभी उनके संगठित होने का फायदा उठाया तो कभी उन्‍हें बिखेर दिया, यह न सिर्फ पूंजीवाद बल्कि मजदूर आंदोलन का भी इतिहास है। इसी इतिहास की रोशनी में और भारत के असंगठित मजदूरों के खास संदर्भ में आज की दुनिया और भविष्‍य के खतरों पर अर्थशास्‍त्री प्रो. अरुण कुमार ने दिल्‍ली में 5 जून 2026 को एक लंबा व्‍याख्‍यान दिया। व्‍याख्‍यान जेएनयू में उनके सहपाठी रहे शिक्षाविद अनिल चौधरी की स्‍मृति में था। उस व्‍याख्‍यान का लिप्‍यंतरित, संक्षिप्‍त और संपादित रूप

आंदोलन, दमन और बेकारी: दिल्ली NCR के मजदूर आंदोलन पर जन हस्तक्षेप की जांच रिपोर्ट

by

दिल्‍ली से सटे नोएडा, गुड़गांव और मानेसर में बीते अप्रैल में भड़के मजदूरों के गुस्‍से और राज्‍य द्वारा दमन की पूरी कहानी सुनाई जानी अभी बाकी है। जो हजार से मजदूर गिरफ्तार किए गए थे, उन्‍हें अब भी कोई नहीं जानता। जो बंद हैं, उनमें भी चार-पांच सार्वजनिक चेहरे ही पोस्‍टरों पर हैं। अनाम और बेनाम मजदूर जो गांव लौट गए थे, वापस आकर बेरोजगार पड़े हैं। जो भीतर हैं, उनके परिजन जेल के चक्‍कर काट रहे हैं। मजदूर आंदोलन और दमन पर नागरिक मंच ‘जन हस्‍तक्षेप’ ने एक जांच रिपोर्ट दिल्‍ली में 19 जून को जारी की है। उसके कुछ संपादित अंश

Emperor's mask has fallen, representative image made by AI

मुखौटा गिर चुका है: शासक की निजी डिजिटल जागीर बनते जा रहे देश और नागरिक के सवाल पर

by

दुनिया की राजनीति और आर्थिकी आपस में मिलकर कैसे आधुनिक राज्‍य के चरित्र को बदल रही है; सम्‍प्रभु लोकतांत्रिक राष्‍ट्रों के भीतर चुनी हुई सरकार और नागरिक के बीच का रिश्‍ता कैसे विकृत हो रहा है; और अपनी अंतर्वस्‍तु व स्‍वरूप में हर लोकशाही कैसे राजशाही की ओर बढ़ रही है; इन विषयों पर दुनिया भर में कोरोना के बाद से बहुत चर्चा हुई है। भारत अपवाद है। यहां राज्‍य-सम्‍बंधी विमर्श नदारद दिखता है जबकि पांचसाला चुनाव ही विमर्शों के केंद्र में रहता है। फॉलो-अप स्‍टोरीज़ के संरक्षक रहे दिवंगत शिक्षाविद् अनिल चौधरी राज्‍य, सरकार, कानून और समाज की जटिल गुत्‍थी पर लगातार बोलते थे। उनके 76वें जन्‍मदिवस पर दिल्‍ली में आयोजित सम्मिलन इसी विषय पर परिचर्चा का बायस बना। सम्मिलन में प्रस्‍तुत अरुण सिंह का लिखा यह आधारपत्र बदलती हुई दुनिया पर कुछ रोशनी डालता है

Cow chewing TMC flag, a roadside view in Kolkata

बंगाल: भारत का इकलौता चुनाव, जिसमें जीत-हार के आगे-पीछे कायम है भय की दोहरी सियासत

by

पश्चिम बंगाल का बहुचर्चित चुनाव 4 मई को आए परिणामों के साथ तकनीकी रूप से समाप्‍त हो गया है, लेकिन ऐसा लगता है कि यह परिणाम लंबी चलने वाली एक फिल्‍म का केवल ट्रेलर था। चुनाव नतीजे के दो दिनों के भीतर जो भयावह और हिंसक घटनाक्रम देखने में आया है, वह बंगाल की धरती पर कायम सियासी ध्रुवीकरण का स्‍वाभाविक विस्‍तार लगता है। इस चुनावी फिल्‍म का मुख्‍य प्‍लॉट था डर, जिसे हारने और जीतने वाले दोनों दलों ने बराबर पैदा किया, पाला-पोसा और लगातार आगे बढ़ाया। पिछले एक साल से पश्चिम बंगाल घूम रहे अमन गुप्‍ता की यह कहानी समझाती है कि आजाद भारत में यह चुनाव ऐतिहासिक क्‍यों था

A saffron clad man crossing College Street in Kolkata

पश्चिम बंगाल : जीत-हार से परे, राजनीति की ऑप्टिक्स को कैसे बदल रहा है प्रवासी ‘हिन्दुस्तानी’ वोटर

by

पश्चिम बंगाल में 29 अप्रैल को दूसरे और आखिरी चरण का मतदान होना है। वोटिंग कलकत्ते में भी है, जो उत्तर-भारतीय प्रवासियों का सबसे बड़ा केंद्र है। इसी वोटबैंक के दम पर भारतीय जनता पार्टी पश्चिम बंगाल की सत्ता में आने का दावा कर रही है। चुनाव के सबसे बड़े सवाल हार-जीत से इतर, असल कहानी यह है कि हिंदी बोलने वाले उत्तर भारत के प्रवासी बंगाल की राजनीति को देखने-समझने के तरीकों को कैसे बुनियादी ढंग से बदल रहे हैं। अमन गुप्‍ता पिछले साल भर से बंगाल जाकर वहां की बदलती हुई जमीन का जायजा लेते रहे हैं। अब भी वे कोलकाता में ही हैं। बंगाल में राजनीतिक धारणा-निर्माण और प्रवासियों के बीच रिश्‍ते पर अमन गुप्‍ता के अनुभवों का निचोड़ बताती उनकी ही कहानी