Culture

Salute to America event in Washington, D.C., 5 July, 2026

ढाई सदी की अमेरिकी आजादी हम सबके लिए एक अफसोस और खतरा क्यों है

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आज से पचास साल पहले अमेरिकी आजादी की दो सदी पूरी होने का वक्‍त ऐसा था जब अमेरिकी समाज में आलोचना के आंतरिक स्‍वर विरोधाभासों को संतुलित करते दिखते थे। उस वक्‍त किताबों, फिल्‍मों और लोकप्रिय संस्‍कृति के उत्‍पादों में लोगों की आत्‍मा का शुद्धिकरण करने की फिर भी एक ताकत शेष थी। आज उसकी कल्‍पना ही संभव नहीं है। आखिर अमेरिकी समाज अपने ढाई सौवें साल में यहां तक कैसे पहुंचा? इसके हमारे लिए क्‍या निहितार्थ हैं? प्रोजेक्‍ट सिंडिकेट के सौजन्‍य से यानिस वारूफाकिस की टिप्‍पणी

Kalahandi Police and Vedanta

सिजिमाली से आगे: पूर्वी घाटों में वेदांता-अदाणी की घेराबंदी के बीच आदिवासियों का संघर्ष जारी

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मार्च के अंत में हमने ओडिशा के माली पर्वतों पर बॉक्‍साइट खनन और उसके खिलाफ चल रहे आदिवासियों के संघर्ष का हाल दिया था, तब तक यह ख़बर राष्‍ट्रीय सुर्खियों में नहीं आई थी। ठीक हफ्ते भर बाद 6-7 अप्रैल की दरमियानी रात कंटामाल गांव में जो पुलिसिया कहर बरपा, उसने अदाणी, वेदांता और ओडिशा की सरकार के बीच मुनाफे के गठजोड़ को अचानक खोल दिया। चौतरफा प्रदर्शन हुए और अब तक घने जंगलों में छुपे रायगड़ा और कालाहांडी के भीतर चल रही कॉरपोरेट साजिशें दुनिया के सामने खुल गईं। अप्रैल से लेकर अब तक उस इलाके में चले घटनाक्रम पर सिद्धार्थ कार और रंजना पाढ़ी द्वारा भेजा फॉलो-अप

Sculpture of a Fisherman, Princep Ghat, Kolkata

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव : मत्स्य, मद, मत्सर, मोह का तंत्र लोक

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किसी भी जगह की संस्‍कृति का सवाल बहुत जटिल होता है। उसमें हाथ डालने से पहले उसका मर्म समझना बहुत अहम है। इस संदर्भ में पश्चिम बंगाल और भाजपा का रिश्‍ता इसलिए दिलचस्‍प हो जाता है क्‍योंकि यह दक्षिणपंथी राजनीतिक दल अपनी सत्ता के मद में तंत्र-साधना का वामाचारी बन गया है। भारत के इतिहास और बंगभंग पर अंग्रेजों के पलटान से सबक लिए बगैर वह मछली पकड़ने के चक्‍कर में खूब मछली खाये जा रहा है। बनारस से वरिष्‍ठ पत्रकार अजय राय की टिप्‍पणी

Kashi

पुस्तक अंश : बनारस की ‘अदृश्य औरतों’ को सुने बगैर इस शहर को क्यों नहीं समझा जा सकता?

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बनारस या काशी पर अतीत से लेकर अब तक जितनी किताबें लिखी गई हैं, भारत में उसका कोई जोड़ नहीं है। तकरीबन हर मशहूर किताब काशी की शाश्‍वत और पवित्र छवि को ही उभारती है। काल प्रवाह में जम चुकी बनारस की इस छवि पर आलोचनात्‍मक शब्‍द कम लिखे गए हैं। फ्रंटपेज प्रकाशन से शीघ्र प्रकाशित होने वाली लेनिन रघुवंशी, चंद्र मिश्रा और श्रुति नागवंशी द्वारा सह-लिखित ‘काशी’ इस मायने में पुरानी लीक को न सिर्फ तोड़ती है, बल्कि बन और बिगड़ रहे बनारस पर एक बार फिर से सोचने को मजबूर करती है। कुल 12 अध्‍यायों में बंटी अंग्रेजी में लिखी यह पुस्‍तक धर्म और मिथक से लेकर सामान्‍य जीवन में छुपे प्रतिरोध के दर्शन, जाति-वर्ग-लिंग से लेकर बाजार तक बंटवारे की राजनीति और उम्‍मीद के संभावित तत्त्वों पर एक जटिल सूत्रीकरण है। प्रकाशक और लेखकों की अनुमति से पुस्‍तक के सातवें अध्‍याय से चुने हुए कुछ अनूदित अंश

Womens March in Sijimali

तिजिमाली: पूरा इलाका बना रणक्षेत्र, एक वक्त खाना खाकर वेदांता के खिलाफ डटे हैं आदिवासी

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अक्‍टूबर, 2023 में हमने पहली बार कालाहांडी के सिजिमाली और खंडुआलमाली गांवों से वेदांता और अदाणी के खिलाफ खुल रहे आंदोलन के एक मोर्चे को यहां रिपोर्ट किया था। ढाई साल के भीतर इलाके में आग लग चुकी है। पूरा इलाका छावनी बना हुआ है। मनमानी गिरफ्तारियां जारी हैं। फर्जी मुकदमे लादे जा रहे हैं और आदिवासियों का घर से निकलना मुहाल हो चुका है। रंजना पाढ़ी और रैन्‍डल सेक्‍वेरा के भेजे अपडेट के आधार पर खनन प्रभावित गांवों के एकदम ताजा हाल पर फॉलो अप

Giving Birth in a Prison Cell by Malak Mattar

फ़लस्तीन: ध्वंस, निर्वासन, और उदासी के बीच जैतून-सी उपजी प्रतिरोध और उम्मीद की कला

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समूची दुनिया आज युद्ध के कगार पर खड़ी है, लेकिन फ़लस्‍तीन की जनता तो बीते आठ दशक से एक ऐसे मुसलसल युद्ध में मुब्तिला है जिसका कोई जवाब किसी के पास नहीं है। इतने लंबे और व्‍यापक ध्‍वंस के बाद समाज सामान्‍यत: टूट जाते हैं, लेकिन फलस्‍तीन की संस्‍कृति जैतून की जड़ों की तरह पुख्‍ता है। उसे फिर से उग आने का इंतजार भर है। यहां के मशहूर कलाकारों और चित्रकारों की कृतियों में अभिव्‍यक्‍त उदासी और उम्‍मीद की एक झलक दिखा रहे हैं पंकज निगम

Manikarnika in its original form, 2019

खंडित हुआ महादेव का त्रिशूल: काशी विध्‍वंस के नये अध्‍याय मणिकर्णिका पर भ्रम-खंडन

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पिछले दिनों बनारस के मणिकर्णिका घाट पर तोड़ी गई अहिल्‍याबाई होल्‍कर की प्रतिमा को लेकर राष्‍ट्रीय स्‍तर पर जो बवाल मचा, उसके बाद इस घटना को झूठा ठहराने के कई प्रयास हुए। जब संस्कृति बनाम विकास पर बहस उठी, तो इस क्रम में कुछ ऐसा लेखन सामने आया जिसमें पौराणिक और मिथकीय सूत्रों के हवाले से मणिकर्णिका घाट पर चल रही तोड़फोड़ को आधुनिक विकास के मुहावरे में उचित या स्‍वाभाविक ठहराया गया। ऐसी मिथकीय कुव्‍याख्‍याओं के भ्रमजाल को तोड़ते हुए काशी की संस्‍कृति और जन के हक में कुछ तथ्‍यात्‍मक बातें बता रहे हैं बनारस से वरिष्‍ठ पत्रकार अजय राय

Gargi Chakraborty

हम दिल्ली में उनकी बाट जोहते रहे, वे कोलकाता से ही कॉमरेड सुमित के पास चली गईं…

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प्रतिष्ठित इतिहासकार, महिला और कम्‍युनिस्‍ट आंदोलन की महत्‍वपूर्ण आवाज डॉ. गार्गी चटर्जी बीते 2 मार्च को नहीं रहीं। उनका 78 वर्ष की उम्र में कोलकाता में निधन हो गया। अभी साल भर भी नहीं हुआ उनके जीवनसाथी सुमित चक्रवर्ती को गुजरे हुए जो साप्‍ताहिक पत्रिका मेनस्‍ट्रीम के संपादक हुआ करते थे और देश के बौद्धिक समाज के भीतर बचे-खुचे चुनिंदा नैतिक स्‍वरों में एक थे। सुमित चक्रवर्ती और गार्गी चक्रवर्ती के साथ अपनी मुलाकातों, संस्‍मरणों और प्रसंगों पर श्रद्धांजलि-स्‍वरूप विनीत तिवारी की टिप्‍पणी

Ram Singh Jakhad

राम सिंह जाखड़: राजनीतिक बंदियों की काल कोठरी में अतीत से आती उम्मीद की रोशनी

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पिछले साल की शुरुआत में भारत की जेलों में कैद लोगों की संख्‍या पांच लाख को पार कर गई थी। इनमें 75 प्रतिशत ऐसे बंदी थे जिनके मुकदमों की सुनवाई भी शुरू नहीं हुई थी। इन्‍हीं में सैकड़ों राजनीतिक कैदी भी हैं, जिन्‍हें भारत सरकार अलग से कोई श्रेणी नहीं मानती। इनकी संख्‍या बीते दो-तीन वर्षों में तेजी से बढ़ी है। भीमा-कोरेगांव के दर्जन भर बंदियों से लेकर उमर खालिद, सोनम वांग्‍चुक ऐसे कुछ परिचित नाम हैं। आजादी से पहले राजनीतिक बंदी रहे 22 फरवरी, 1916 को जन्मे छात्र नेता राम सिंह जाखड़ का जेल वृत्तान्‍त इन बंदियों के लिए एक प्रेरक गाथा है। आर्काइव के कोनों से निकली कहानी सुना रहे हैं अखिलेश यादव

Existential threat of AI

अगले दो से तीन साल में AI समूचे मीडिया को निगल जाएगा, मनुष्य को विस्थापित कर देगा!

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘परीक्षा पर चर्चा’ के दौरान विद्याथिर्यों से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के समझदारी भरे उपयोग का आग्रह करते हुए कहा है कि वे उस पर निर्भर न हों, बल्कि केवल दिशानिर्देश के लिए सहयोग लें। यह बात सुनने में जितनी अच्‍छी लगती है, उतनी ही सदिच्‍छा भरी है। AI जितनी तेजी से मानवीय उद्यमों की जगह छेकता जा रहा है, आने वाले दो से तीन साल में तकरीबन समूचे पारंपरिक मीडिया में वह मनुष्‍य की भूमिका का खत्‍म कर देगा। प्रोजेक्‍ट सिंडिकेट के AI संपादक चार्ल्‍स फर्गुसन ने AI कंपनियों के प्रमुखों से इस विषय में बात कर के एक चेतावनी भरा लेख लिखा है, जिसे पढ़ा जाना चाहिए