Collective rites of 13 tribals killed in Kalinganagar in January 2006

कलिंगनगर हत्याकांड: बीस साल बाद भी जिंदा संघर्षों में धधक रही हैं 13 आदिवासियों की चिताएं

जो लोग यूं ही मर जाते हैं, जिंदा लोग उनको स्‍मृतियों में संजोते हैं। जो लोग लड़ते हुए मारे जाते हैं उन्‍हें संजोना नहीं पड़ता। उलटे, वे भविष्‍य के संघर्षों को जिंदा रखने का काम करते हैं। ओडिशा का कलिंगनगर इसका गवाह है जहां के आदिवासी बीस साल पहले पुलिस के हाथों शहीद हुए अपने पुरखों की लड़ाई को सब कुछ गंवाकर आज भी कायम रखे हुए हैं। उनके पैर के नीचे से जमीन जा चुकी है और सिर से आकाश, लेकिन जिंदगी की उम्‍मीदें हर रोज धरनों, सभाओं और कंपनी राज के दमन में हरी हैं। लंबे समय से ओडिशा के जनसंघर्षों को दर्ज कर रहीं रंजना पाढ़ी की कलिंगनगर नरसंहार की बीसवीं बरसी पर लंबी कहानी

A demonstrator holds a placard during a protest against the release of the convicts in Bilkis Bano case

नए भारत में बलात्कारियों का संरक्षण : कैसे अच्छे दिन? किसके अच्छे दिन?

बीते कुछ बरसों के दौरान भारत में यौन अपराधों और इनके केस में सजा होने के बीच बहुत गहरी खाई पनपी है। पीड़ितों की खुदकशी से लेकर उन्‍हीं पर पलट कर मुकदमा किया जाना, अपराधियों का माल्‍यार्पण, सरवाइवर के बयान पर संदेह खड़ा किया जाना, और आखिरकार सजा मिलने पर भी बलात्कारियों का जमानत पर बाहर निकल आना दंडमुक्ति की फैलती संस्कृति का पता देता है। 2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार आने से पहले राज्यसत्ता और पितृसत्ता ने इसकी जमीन बना दी थी। नारीवादी लेखिका-कार्यकर्ता रंजना पाढ़ी की विस्तृत पड़ताल