कलिंगनगर हत्याकांड: बीस साल बाद भी जिंदा संघर्षों में धधक रही हैं 13 आदिवासियों की चिताएं
जो लोग यूं ही मर जाते हैं, जिंदा लोग उनको स्मृतियों में संजोते हैं। जो लोग लड़ते हुए मारे जाते हैं उन्हें संजोना नहीं पड़ता। उलटे, वे भविष्य के संघर्षों को जिंदा रखने का काम करते हैं। ओडिशा का कलिंगनगर इसका गवाह है जहां के आदिवासी बीस साल पहले पुलिस के हाथों शहीद हुए अपने पुरखों की लड़ाई को सब कुछ गंवाकर आज भी कायम रखे हुए हैं। उनके पैर के नीचे से जमीन जा चुकी है और सिर से आकाश, लेकिन जिंदगी की उम्मीदें हर रोज धरनों, सभाओं और कंपनी राज के दमन में हरी हैं। लंबे समय से ओडिशा के जनसंघर्षों को दर्ज कर रहीं रंजना पाढ़ी की कलिंगनगर नरसंहार की बीसवीं बरसी पर लंबी कहानी