ज्ञान का पतन, AI और स्वतंत्र ढंग से सोचने की इंसानी क्षमता का दुर्लभ होते जाना
हजारों साल से यह समझ बनी हुई है कि मनुष्य का दिमाग, बोध की क्षमता और विवेक उससे अलगाये नहीं जा सकते। इसीलिए मनुष्य के ऊपर संपूर्ण नियंत्रण असंभव है। विचार और ज्ञान के बाजार ने प्रौद्योगिकी के सहारे इस सच को चुनौती दे दी है। अब विश्लेषण, संसाधन, और निर्णय, सब कुछ भाड़े पर उपलब्ध है। फिर मनुष्य खुद को ज्ञानवान, विचारवान बनाने पर समय क्यों खर्च करे? इसकी प्रेरणा उसे कौन दे? नतीजा भयावह हो सकता है। प्रोजेक्ट सिंडिकेट के सौजन्य से सामी महरूम का विश्लेषण