Pyre protest against Ken-Betwa project in April 2026

लोकप्रियता के दौर में जल, जंगल और जमीन के संघर्ष : संदर्भ केन-बेतवा आंदोलन

देश में आजकल आंदोलन का माहौल है- जमीन पर कम (या कम-चर्चित) और इंटरनेट पर ज्‍यादा। ऐतिहासिक अन्‍यायों और हकमारी के खिलाफ देश भर में दशकों से लगातार चल रहे सत्ता-विरोधी जमीनी जन आंदोलनों की जगह एक बार फिर आभासी तिकड़मों से छेकने की कोशिश की जा रही है, जैसा 2011 में हुआ था। इस बार भी तमाम आंदोलनकारी भ्रमित हो रहे हैं। ‘जेन-ज़ी’ की पीठ पर जारी इस हो-हल्‍ले में लगातार बारह दिन तक सत्‍याग्रह करने वाले केन-बेतवा परियोजना-विरोधी आदिवासी औरतों और बुजुर्गों की आवाज कहीं दब गई है। हालिया केन-बेतवा नदीजोड़ विरोधी आंदोलन को सतीश भारतीय ने विस्‍तार से कवर किया है। उनके मध्‍य प्रदेश से भेजे डिस्‍पैच, बातचीत और अतीत के प्रसंगों के सहारे इस पर्यावरण दिवस पर जल, जंगल, जमीन बचाने वाले जन आंदोलनों की गति और नियति पर यह लंबी कहानी

Speckled Cobra in a field near an agricultural worker, WHO

MP : तांत्रिक हो या अफसर, यहां सबके लिए है सांप के जहर में अवसर सिवाय मरने वाले के…

कभी सपेरों का देश कहे जाने वाले भारत में सांप के काटे से मरने वालों की संख्‍या पूरी दुनिया में सर्पदंश से होने वाली मौतों की आधी से ज्‍यादा है। अस्‍पतालों का टोटा, अंधविश्‍वास की व्‍याप्ति और विलुप्‍त होते देसी उपचारक समस्‍या को और गहरा कर रहे हैं। जहररोधी उपलब्‍ध करवाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका, सरकार के निर्देश, और बीते सात साल से हर 19 सितंबर को मनाए जा रहे अंतरराष्‍ट्रीय सर्पदंश जागरूकता दिवस का कोई असर नहीं पड़ रहा है। उलटे, सांप भी अब भ्रष्‍टाचार की चपेट में आ गए हैं। अपनी तरह का मौलिक सांप घोटाला देखने वाले मध्‍य प्रदेश के सागर से सतीश भारतीय की रिपोर्ट