Nobel Peace Prize: निरंकुशता के दौर में लगातार सच कहते जाने की सहजता के नाम
नोबेल पुरस्कारों की अपनी कुछ सीमाएं हैं। उसका इतिहास विवादों से मुक्त नहीं है। पिछले साल हुई शांति पुरस्कार की किरकिरी उदाहरण है। वैसे भी, पुरस्कार देना दुनिया में शांति नहीं ला देता, लेकिन कभी-कभार कोई पुरस्कार व्यक्ति से अधिक उस सिद्धांत के सम्मान में होता है जिसका वह व्यक्ति महज प्रतिनिधि बन जाता है। इस बार की नोबेल शांति पुरस्कार विजेता दक्षिण अफ्रीकी न्यायविद् नवि पिल्लै के मामले में यह बात सच है। जब पूरी दुनिया में निरंकुश सत्ताएं कानून के राज को खारिज करती जा रही हों, पिल्लै को मिला सम्मान नूरेम्बर्ग से इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट तक चली आई द्वितीय विश्वयुद्धोत्तर विरासत को बचाने का महत्त्व रेखांकित करता है, जिसके मूल में कानून की सार्वभौमिकता और मनुष्य की गरिमा का सिद्धांत है। शैलेंद्र चौहान की टिप्पणी