Detained journalists showing Press ID to police in Delhi

दो दिन की पत्रकारिता: जब घेराव, हमले और हिरासत का शिकार बने 37 से ज्यादा मीडियाकर्मी

बीते दशकों के दौरान 10-11 अक्‍टूबर के दो दिन देश की पत्रकारिता में हमेशा याद रखे जाने के लिए दर्ज हो गए जब सुप्रीम कोर्ट को सरकार के दिए आश्‍वासन के बावजूद राजधानी की सड़कों पर महज अपना काम कर रहे पत्रकारों को बेरहमी से मारा गया, घसीटा गया और उठा कर हिरासत में भेज दिया गया। कोविड के बाद लगे लॉकडाउन और उससे पहले नागरिकता विरोधी आंदोलन की कवरेज में भी ऐसे दृश्‍य देखने को मिले थे, लेकिन इस बार मामला इसलिए गंभीर है क्‍योंकि पत्रकारों पर हमले में दिल्‍ली पुलिस और प्रशासन के साथ राज्‍येतर तत्त्वों की भी भागीदारी थी। कमेटी टु प्रोटेक्‍ट जर्नलिस्‍ट्स ने एक अंतरिम सूची बनाई है, हालांकि हमलों और हिरासतों की वास्‍तविक संख्‍या इससे कहीं ज्‍यादा है। सीपीजे की सोमी दास की रिपोर्ट

Illustration/Perplexity AI

भारत के नए आय कर कानून से स्वतंत्र पत्रकार और डिजिटल क्रिएटर क्यों डरे हुए हैं?

भारत की संसद ने 12 अगस्‍त को आय कर कानून, 2025 पारित किया था। इसके बाद मीडिया में यह चर्चा जोर पकड़ने लगी कि टैक्‍स अधिकारी अब अपने विस्‍तारित अधिकारों का दुरुपयोग कर के कहीं पत्रकारों के स्रोतों को उजागर न करने लगें, उनकी निगरानी न करने लग जाएं और वित्तीय अपराधों के आरोपों से उन्‍हें निशाना न बनाने लग जाएं। इस संदर्भ में कमेटी टु प्रोटेक्‍ट जर्नलिस्‍ट्स (सीपीजे) की सोमी दास ने सरकार की मीडिया पर बढ़ती हुई निगरानी और नए कर कानून के निहितार्थों पर इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन के अपार गुप्‍ता से बात की है।