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Joaquin Phoenix in a still from Joker (2019)

हँसना मना है : फ़रमाँ-बरदारी की पूंजी-केंद्रित संस्कृति में धूमिल पड़ता सार्वजनिक हास्यबोध

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हँसी मनुष्‍य की सबसे सहज अभिव्‍यक्ति है; हँसी हर दर्द की दवा है; लेकिन हँसना ही मर्ज बन जाए तब? पहली बार इमरजेंसी के दौरान हँसने पर रखी जा रही निगाह और लोकतंत्र के अंतिम क्षण पर निकलती निरंकुश हँसी की बात रघुवीर सहाय ने की थी। तब से लेकर अब तक, समाज में हँसी सहज नहीं रही है। अब हँसने के प्रयत्‍न करने पड़ते हैं, जैसा परसाई ने बरसों पहले कहा था, कि शीत और गर्मी के बीच से जो जितना वसंत निकाल सके, निकाल ले। दो पाटों के बीच फँसे ‘घायल वसंत’ में चोटिल हास्‍यबोध के सामाजिक इतिहास पर श्रीप्रकाश की नजर

Gabbar Singh, the most recognised face of Sholay

पूरे पचास साल: मौलिकता की बहसों के बीच फैलता एक सिनेमा का लोक-जीवन

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सांभा के ‘पूरे पचास हजार’ और गब्‍बर के ‘पचास-पचास कोस दूर’ वाले अतिपरिचित संवादों से कल्‍ट बन चुकी ‘शोले’ को आए इस स्‍वतंत्रता दिवस पर पूरे पचास साल हो रहे हैं। मनोरंजन का एक लोक‍रंजक उत्‍पाद कैसे लोक को घेरता है तो घेरता ही चला जाता है, ‘शोले’ यदि इसका जीवंत उदाहरण है तो इसकी वजह उसकी राजनीतिक पृष्‍ठभूमि है। यह फिल्‍म इमरजेंसी के बीचोबीच आई थी- एकदम चरम दिनों में, महज डेढ़ महीने में। आज भले घोषित इमरजेंसी नहीं है, लेकिन स्थितियां कुछ कम भी नहीं हैं और अन्‍याय व जुल्‍म के खिलाफ ‘शोले’ निरंकुशता के आकाश में अटल सूरज की तरह चमक रही है। ‘शोले’ की पृष्‍ठभूमि और प्रासंगिकता पर चर्चा कर रहे हैं श्रीप्रकाश