Technology

Existential threat of AI

अगले दो से तीन साल में AI समूचे मीडिया को निगल जाएगा, मनुष्य को विस्थापित कर देगा!

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘परीक्षा पर चर्चा’ के दौरान विद्याथिर्यों से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के समझदारी भरे उपयोग का आग्रह करते हुए कहा है कि वे उस पर निर्भर न हों, बल्कि केवल दिशानिर्देश के लिए सहयोग लें। यह बात सुनने में जितनी अच्‍छी लगती है, उतनी ही सदिच्‍छा भरी है। AI जितनी तेजी से मानवीय उद्यमों की जगह छेकता जा रहा है, आने वाले दो से तीन साल में तकरीबन समूचे पारंपरिक मीडिया में वह मनुष्‍य की भूमिका का खत्‍म कर देगा। प्रोजेक्‍ट सिंडिकेट के AI संपादक चार्ल्‍स फर्गुसन ने AI कंपनियों के प्रमुखों से इस विषय में बात कर के एक चेतावनी भरा लेख लिखा है, जिसे पढ़ा जाना चाहिए

2025 Nepalese Gen Z movement protesters celebrating

हमारी उद्देश्यपूर्ण सामाजिक कार्रवाइयों के परिणाम क्या हमारे नियंत्रण से बाहर निकल चुके हैं?

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प्रौद्योगिकी ने बीते दो दशकों में सामूहिक कार्रवाई, गोलबंदी, और आंदोलन का स्‍वरूप बुनियादी रूप से बदल डाला है। निश्‍चित रूप से सामाजिक कार्रवाइयां सोद्देश्‍य ही की जाती हैं, लेकिन उनके नतीजे करने वालों के हाथ से फिसल भी जाते हैं। आज की दुनिया इस मामले में कहीं ज्‍यादा अनिश्चित हो चली है। जैसे, नेपाल में युवाओं की ताजा बगावत जिसने दो दिन में सत्ता तो पलट दी, लेकिन उस क्रम में हुई भारी हिंसा से युवाओं ने खुद को अलग भी कर लिया। जो अंतिम परिणाम निकला, क्‍या बगावत उसी उद्देश्‍य से थी? हम नहीं जानते। अप्रत्‍याशित नतीजों के समाजविज्ञान पर एडवर्ड टेनर की यह टिप्‍पणी शायद रोशनी दे