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Fatima Nafees, mother of disappeared JNU student Najeeb Ahmad

गुमशुदा बच्चों के नाम: माल्विनास की बर्बरताएं, मार्केज़ के विवरण और माँओं की बददुआएं

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जेएनयू के छात्र नजीब को गायब हुए अगले महीने दस साल पूरे हो जाएंगे। उसकी सरकारी फाइल बंद की जा चुकी है, लेकिन माँ फातिमा ने हार नहीं मानी है। उनकी कानूनी लड़ाई जारी है- बिलकुल अर्जेंटीना की एस्तेला कार्लोतो की तरह, जिन्‍होंने अपनी आधे से ज्‍यादा जिंदगी अपनी बेटी और नाती को खोजने में लगा दी। जिस देश में हर साल चार से पांच लाख लोग ‘गुमशुदा’ दर्ज किए जाते हैं, वहां उनकी कहानियां कहने पर लगी अघोषित पाबंदी मार्केज़ की याद दिलाती है, जिन्‍होंने सबसे पहले माल्विनास में अर्जेंटीना के गुमशुदा बेटों की नियति को उजागर किया था। मार्केज़ अब सौ साल के हो रहे हैं। विद्यार्थी चटर्जी का यह लेख मार्केज़ की जन्‍मशती, नजीब की गुमशुदगी और दुखियारी माँओं के नाम

Labour leader Keir Starmer’s vctory celebrations in London

ब्रिटेन : इतिहास की सबसे ज्यादा ‘सर्वहारा’ सरकार से क्या उम्मीद की जानी चाहिए?

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लेबर पार्टी के नेता कीर स्‍टार्मर की आगामी कैबिनेट में जितने सदस्‍य मजदूर तबके की पैदाइश हैं, उतने ब्रिटेन के इतिहास में किसी सरकार में कभी नहीं रहे। इसका मतलब क्‍या है? क्‍या इसका नीति-निर्माण पर कोई खास असर पड़ेगा या ब्रिटेन के पैदाइशी अभिजात्‍यों के दबाव में अपने वर्ग के लिए कुछ करने की उनकी लालसा दबी ही रह जाएगी? प्रोजेक्‍ट सिंडिकेट के सौजन्‍य से समाजशास्‍त्री एरन रीव्‍स और सैम फ्रीडमैन का आकलन