Working Class

Bhado Mela, Ratanpur, Kutch

पारंपरिक मेलों का सिकुड़ता संसार, पूंजी के हमले में बेदखल होते जा रहे अनुभवी कामगार

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श्रावणी मेले शुरू हो चुके हैं। अब साल के अंत तक मेलों का सिलसिला देश में चलता रहेगा और उत्‍सवी माहौल तो होली के बाद ही जाकर थमेगा। जो समाज साल के आधे से ज्‍यादा वक्‍त मेले-ठेले, व्रत-त्‍यौहार, जलसों और यात्राओं में गुजारता हो, वहां सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि कितनी बड़ी आबादी का जीवन-जगत इनके सहारे टिका होगा। छह साल पहले अचानक आए कोरोना ने समाज में दूरियां बढ़ाईं, मेलजोल पर पाबंदियां लगाईं, तो मेलों का स्‍वरूप भी बदलता गया। आज हालत ये है कि पारंपरिक मेलों पर टिकी लाखों जिंदगियां विस्‍थापित हो चुकी हैं और इसकी गिनती कहीं नहीं है। बाजार, पूंजी और सरकार में फंसकर दम तोड़ते मेलों के समाज पर अमरपाल सिंह वर्मा की लंबी कहानी

Kashi

पुस्तक अंश : बनारस की ‘अदृश्य औरतों’ को सुने बगैर इस शहर को क्यों नहीं समझा जा सकता?

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बनारस या काशी पर अतीत से लेकर अब तक जितनी किताबें लिखी गई हैं, भारत में उसका कोई जोड़ नहीं है। तकरीबन हर मशहूर किताब काशी की शाश्‍वत और पवित्र छवि को ही उभारती है। काल प्रवाह में जम चुकी बनारस की इस छवि पर आलोचनात्‍मक शब्‍द कम लिखे गए हैं। फ्रंटपेज प्रकाशन से शीघ्र प्रकाशित होने वाली लेनिन रघुवंशी, चंद्र मिश्रा और श्रुति नागवंशी द्वारा सह-लिखित ‘काशी’ इस मायने में पुरानी लीक को न सिर्फ तोड़ती है, बल्कि बन और बिगड़ रहे बनारस पर एक बार फिर से सोचने को मजबूर करती है। कुल 12 अध्‍यायों में बंटी अंग्रेजी में लिखी यह पुस्‍तक धर्म और मिथक से लेकर सामान्‍य जीवन में छुपे प्रतिरोध के दर्शन, जाति-वर्ग-लिंग से लेकर बाजार तक बंटवारे की राजनीति और उम्‍मीद के संभावित तत्त्वों पर एक जटिल सूत्रीकरण है। प्रकाशक और लेखकों की अनुमति से पुस्‍तक के सातवें अध्‍याय से चुने हुए कुछ अनूदित अंश

Labour leader Keir Starmer’s vctory celebrations in London

ब्रिटेन : इतिहास की सबसे ज्यादा ‘सर्वहारा’ सरकार से क्या उम्मीद की जानी चाहिए?

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लेबर पार्टी के नेता कीर स्‍टार्मर की आगामी कैबिनेट में जितने सदस्‍य मजदूर तबके की पैदाइश हैं, उतने ब्रिटेन के इतिहास में किसी सरकार में कभी नहीं रहे। इसका मतलब क्‍या है? क्‍या इसका नीति-निर्माण पर कोई खास असर पड़ेगा या ब्रिटेन के पैदाइशी अभिजात्‍यों के दबाव में अपने वर्ग के लिए कुछ करने की उनकी लालसा दबी ही रह जाएगी? प्रोजेक्‍ट सिंडिकेट के सौजन्‍य से समाजशास्‍त्री एरन रीव्‍स और सैम फ्रीडमैन का आकलन