Bhado Mela, Ratanpur, Kutch

पारंपरिक मेलों का सिकुड़ता संसार, पूंजी के हमले में बेदखल होते जा रहे अनुभवी कामगार

श्रावणी मेले शुरू हो चुके हैं। अब साल के अंत तक मेलों का सिलसिला देश में चलता रहेगा और उत्‍सवी माहौल तो होली के बाद ही जाकर थमेगा। जो समाज साल के आधे से ज्‍यादा वक्‍त मेले-ठेले, व्रत-त्‍यौहार, जलसों और यात्राओं में गुजारता हो, वहां सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि कितनी बड़ी आबादी का जीवन-जगत इनके सहारे टिका होगा। छह साल पहले अचानक आए कोरोना ने समाज में दूरियां बढ़ाईं, मेलजोल पर पाबंदियां लगाईं, तो मेलों का स्‍वरूप भी बदलता गया। आज हालत ये है कि पारंपरिक मेलों पर टिकी लाखों जिंदगियां विस्‍थापित हो चुकी हैं और इसकी गिनती कहीं नहीं है। बाजार, पूंजी और सरकार में फंसकर दम तोड़ते मेलों के समाज पर अमरपाल सिंह वर्मा की लंबी कहानी