पारंपरिक मेलों का सिकुड़ता संसार, पूंजी के हमले में बेदखल होते जा रहे अनुभवी कामगार

Bhado Mela, Ratanpur, Kutch
An old woman selling bangles at Bhado Mela, Ratanpur, Kutch (Photo: Abhishek Srivastava)
श्रावणी मेले शुरू हो चुके हैं। अब साल के अंत तक मेलों का सिलसिला देश में चलता रहेगा और उत्‍सवी माहौल तो होली के बाद ही जाकर थमेगा। जो समाज साल के आधे से ज्‍यादा वक्‍त मेले-ठेले, व्रत-त्‍यौहार, जलसों और यात्राओं में गुजारता हो, वहां सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि कितनी बड़ी आबादी का जीवन-जगत इनके सहारे टिका होगा। छह साल पहले अचानक आए कोरोना ने समाज में दूरियां बढ़ाईं, मेलजोल पर पाबंदियां लगाईं, तो मेलों का स्‍वरूप भी बदलता गया। आज हालत ये है कि पारंपरिक मेलों पर टिकी लाखों जिंदगियां विस्‍थापित हो चुकी हैं और इसकी गिनती कहीं नहीं है। बाजार, पूंजी और सरकार में फंसकर दम तोड़ते मेलों के समाज पर अमरपाल सिंह वर्मा की लंबी कहानी

सावन आता है तो झूले पड़ते हैं। झूले पड़ते हैं तो मेले सजते हैं। मेले सजते हैं तो लोग मिलते हैं। लोग मिलते हैं तो मन खिलते हैं। मौसम, मेले और मन का रिश्‍ता हमारे समाज में सदियों पुराना है पर देखते-देखते यह हमारी आंखों के सामने बदल रहा है। अब न मौसम अपने वक्‍त पर आता है। न मेले अपने पारंपरिक स्‍वरूप में लगते हैं। न मौसम और मेलों से मन ही जुड़ते हैं।

फिर भी, औपचारिक रूप से सावन के आने और मेलों का मौसम शुरू होने पर इनके बारे में बातें तो होती ही हैं। जब हरिद्वार के कांवड़ मेले से कांवड़ि‍ये चलते हैं तो चाहे अनचाहे आसपास के शहरों का जीवन अस्‍तव्‍यस्‍त हो ही जाता है। भरी बारिश में सड़क से लेकर सियासत तक फिसलनदार हो जाती है। इसी किचकिच में कुछ अदृश्‍य प्राणी सतह पर नमूदार हो आते हैं- झूलेवाले, बिजली वाले, मिट्टी और लकड़ी के सामान बनाने वाले शिल्‍पकार, कारीगर, रंगरेज, खिलौने बेचने वाले, चूड़ी वाले, कपड़े वाले, बरतन वाले, सर्कस वाले, नट, आदि। बेशक, अब ये लोग कम ही दिखते हैं।

समय की अजीब चाल ने इस समाज में मेलों पर निर्भर रहने वाले ज्‍यादातर अदृश्‍य कामगारों को पार्श्‍व में धकेल दिया है। भारत में देसी शिल्‍प और कला की कम से कम तीन हजार लोक परंपराएं हैं और खुद सरकार मानती है कि तीन दर्जन से ज्‍यादा अब विलुप्‍तप्राय हैं। ऐसी विलुप्त हो चुकी कुछ पेशागत परंपराओं पर स्वतंत्र काम भी हुए हैं। इसके पीछे बाजार, सरकार और पूंजी की वह मिलीजुली गति जिम्‍मेदार है जिसने गांव-कस्‍बे के लोगों की आजीविका और उत्‍पादन के देसी तंत्र को अप्रासंगिक बना डाला है। इसीलिए आजकल के मेले जो पहले से ज्‍यादा भव्‍य और चमकदार दिखते हैं, उनके पीछे एक घना अंधेरा कायम है जिसमें इस समाज की कई सच्‍चाइयां दफन हैं।



दरअसल, बाहरी चमक-धमक के पीछे की वह दुनिया ही बदल चुकी है जो सदियों कई सामाजिक तबकों की आजीविका और हमारे समाज की सहकारिता का आधार रही। महंगी होती मैदानों की नीलामी, नई सरकारी शर्तें, बढ़ती लागत और बड़ी पूंजी के बढ़ते दखल ने झूला संचालकों, छोटे दुकानदारों और पारंपरिक मेला आयोजकों के सामने आज अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया है। यह रिपोर्ट भारत के मेलों की बदलती हुई प्रकृति की पड़ताल करती है।

राजस्थान के डूंगरपुर शहर में रेडिमेड कपड़ों से सजी एक छोटी सी दुकान है। दुकान के भीतर बीचोबीच बैठे छुट्टन खान मुस्कराते हुए बताते हैं, ‘यह मेरा दूसरा धंधा है।‘

इस सरल वाक्‍य के पीछे की कहानी असाधारण है। करीब चालीस साल तक छुट्टन खान का कोई स्थाई पता नहीं था। उनका घर मथुरा में था, लेकिन जिंदगी देश भर में लगने वाले मेलों में गुजरती थी। वे राजस्थान से गुजरात, मध्य प्रदेश से महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश, हरियाणा से दिल्ली घूमते रहते थे। साल का अधिकांश समय सफर करते हुए सडक़ पर गुजरता था। एक मेला खत्म होता, ट्रक में सामान लदता और अगले पड़ाव का सफर शुरू हो जाता।

शुरुआत में वे किताबों की दुकान लगाते थे। तीस साल तक उन्‍होंने किताबें बेचीं। जब किताबों का कारोबार कमजोर पडऩे लगा तब प्लास्टिक और घरेलू उपयोग का सामान बेचने लगे। यह बदलाव भी उन्होंने उसी सहजता के साथ स्वीकार कर लिया जैसे कुछ दिनों बाद हर बार किसी नये शहर को अपना लेते थे। उनकी दुनिया मौसम से नहीं, बल्कि मेलों के कैलेंडर से चलती थी। वह हंसते हुए याद करते हैं, ‘घर में जितने दिन रहते थे, उससे ज्यादा तो सड़क पर सफर में रहते थे।’

फिर 2020 का साल आया। कोरोना महामारी के कारण देशव्यापी लॉकडाउन लगा। चलते हुए मेले रद्द हो गए। जिन मेलों में हर्षोल्लास था, एक झटके में वे बेरौनक हो गए। छुट्टन खान अपना सामान लेकर किसी तरह डूंगरपुर लौट आए। उन्होंने प्लास्टिक का पूरा स्टॉक घर की छत पर रख दिया। उन्हें भरोसा था कि कुछ महीने बाद हालात सामान्य हो जाएंगे और वे फिर से उसी जीवन में लौट जाएंगे जिसे उन्होंने कई दशक दिए थे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

पहले एक महीना बीता। फिर दूसरा। फिर पूरा साल। फिर दूसरा साल भी चला गया। दो साल तक मेले बंद रहे। छत पर रखा माल धूप और बारिश में धीरे-धीरे खराब होता गया। जब तक बाजार खुले और मेले दोबारा शुरू हुए, तब तक नुकसान इतना बड़ा हो चुका था कि उसी कारोबार में लौटना उनके लिए लगभग असंभव हो गया। आखिरकार उन्होंने डूंगरपुर में ही रेडिमेड कपड़ों की एक स्थाई दुकान खोल ली।

वह बताते हैं, ‘कोरोना ने दो साल छीन लिए। उसके बाद जब मेले शुरू हुए तो स्टॉल का किराया ही इतना बढ़ गया कि पुराना सारा हिसाब-किताब बदल गया। पहले दस दिन के मेले में जो दुकान करीब दस हजार रुपये में मिल जाती थी, उसके लिए पच्चीस-तीस हजार रुपये मांगे जाने लगे।’


Chhuttan Khan, who used to work in fairs now runs a garment shop in Dungarpur, Rajasthan
डूंगरपुर के छुट्टन खान: मेला क्या छूटा जिंदगी ही बदल गई

इस तरह के हालात का शिकार अकेले छुट्टन खान नहीं हैं। भीड़ लौट आई है, पर मेलों से जीवन भर का रिश्‍ता रखने वाले तमाम लोग नहीं लौटे हैं। छुट्टन मेलों की दुनिया से दूर जा चुके अपने पुराने साथियों के नाम गिनवाते हैं। कोई रेडीमेड कपड़ों की दुकान चला रहा है। किसी ने आर्टिफिशियल ज्वेलरी का कारोबार शुरू कर दिया। किसी ने झूलों का काम छोड़कर टैक्सी खरीद ली। कोई अपने शहर में छोटा सा व्यवसाय करने लगा।

हरिद्वार के राजू भाई, जो बरसों आर्टिफिशियल ज्वेलरी बेचते थे अब दूसरा व्यवसाय कर रहे हैं। धौलपुर के रामावतार, जो चाबी के छल्लों पर नाम उकेरते थे इस धंधे से बाहर निकल चुके हैं। जोधपुर के भीकाराम ने रेडीमेड कपड़ों की स्थाई दुकान खोल ली है। ऐसे नामों की सूची लंबी है। छुट्टन बताते हैं, ‘दो साल तक मेले ही नहीं लगे। हर आदमी को घर चलाने के लिए कोई न कोई दूसरा काम पकड़ना पड़ा। बाद में जब मेले शुरू भी हुए, तब तक बहुत से लोग लौटने की स्थिति में नहीं रहे।’

छुट्टन जो बता रहे हैं, वही इस कहानी का सबसे कम दिखाई देने वाला पक्ष है। कोरोना ने लगभग हर क्षेत्र को प्रभावित किया, लेकिन घुमंतू मेला अर्थव्यवस्था पर उसका असर अलग था। इन लोगों के पास न स्थाई दुकान थी, न नियमित ग्राहक और न ही ऐसी पूंजी जिसके सहारे वे दो साल तक बिना आय के टिक सकते। उनकी आय का एक ही स्रोत था- मेला। जब मेले बंद हुए तो आय भी शून्य हो गई। उस दौरान किसी ने कर्ज लिया। किसी ने वाहन बेच दिया। किसी ने गहने गिरवी रखे। किसी ने मजदूरी शुरू कर दी। कई लोगों ने मजबूरी में नया व्यवसाय अपना लिया। ज्यादातर झूलेवालों ने अपने लाखों के झूले आधे से भी कम कीमत पर बेच दिए।

यह सही है कि हर किसी ने मेला नहीं छोड़ा और हर कोई मेले से नहीं छूट गया, लेकिन यह भी सच है कि लगभग हर किसी की जिंदगी तो बदल ही गई। और यह बदलाव केवल आय का नहीं था। यह भरोसे का भी था।

आम धारणा यही है कि कोरोना खत्म होने के बाद अर्थव्यवस्था पटरी पर आ गई, लेकिन मेला कारोबार से जुड़े लोग इससे सहमत नहीं दिखते। उनका मानना है कि महामारी के बाद लौटी दुनिया पहले जैसी नहीं थी।

ग्राहकों की क्रय-शक्ति पर असर पड़ा था। आयोजन की लागत बढ़ चुकी थी। मैदानों का किराया बढ़ गया। डीजल महंगा हो गया। ट्रांसपोर्ट की लागत बढ़ गई। टेंट, डोम, बिजली, जनरेटर, मजदूरी और तकनीकी कर्मचारियों पर खर्च पहले की तुलना में कहीं अधिक हो गया। जो घाटा महामारी ने दिया था, उसकी भरपाई का मौका मिलने से पहले ही नई आर्थिक चुनौतियां सामने आ गईं। यही कारण है कि कई लोगों ने मेलों में लौटने के बजाय नया काम चुन लिया। विकल्प के अभाव में जो लोग लौटे भी, उन्हें लगा कि जिस दुनिया को छोड़कर वे गए थे वह अब कहीं नहीं थी।


बिहार सरकार झूठ बोल रही है या घर लौट कर खाली बैठे लाखों प्रवासी मजदूर?


पंजाब के श्री मुक्तसर साहिब के अंकुश सेठी उन लोगों में हैं जो अब तक संघर्ष कर रहे हैं। करीब दस वर्ष पहले उन्होंने दो झूलों से काम शुरू किया था। कारोबार बढ़ा तो बैंक से लोन लेकर झूलों की संख्या बढ़ाई। उन्हें विश्वास था कि धीरे-धीरे निवेश किए पैसे की भरपाई हो जाएगी। फिर कोरोना आ गया। दो साल तक झूले खड़े रहे। आय बंद हो गई, लेकिन बैंक की किस्तें चालू रहीं। महामारी के बाद जब मेले फिर शुरू हुए तो उन्हें उम्मीद थी कि अब नुकसान की भरपाई हो जाएगी पर ऐसा नहीं हुआ।

उनके सामने एक नई चुनौती आ गई। मैदान महंगे हो चुके थे। डीजल महंगा हो गया। ट्रांसपोर्ट महंगा हो गया। तकनीकी कर्मचारियों और बिजली का खर्च बढ़ चुका था। उधर आयोजकों पर भी लागत का दबाव था, इसलिए झूला संचालकों से पहले की तुलना में अधिक हिस्सा लिया जाने लगा। अंकुश कहते हैं कि ‘कोरोना से पहले झूलों की कमाई को मैं और आयोजक आधा-आधा बांट लेते थे, लेकिन अब 70 फीसदी आयोजक रखता है और 30 फीसदी हमारे हिस्से आता है। इससे कमाई तो दूर, हमारे खर्चे ही पूरे नहीं होते।‘

वे कहते हैं, ‘झूले मेरे हैं। उन्हें एक राज्य से दूसरे राज्य तक पहुंचाने का खर्च मेरा है। बैंक का कर्ज मेरा है, लेकिन अब छह महीने से झूले गोदाम में पड़े हैं और मैं किस्‍तें नहीं चुका पा रहा हूं।‘  

अंकुश का दर्द केवल एक व्यक्ति की आर्थिक परेशानी नहीं है। इसमें उस असंगठित अर्थव्यवस्था की कमजोरी झलकती है जहां अधिकांश निवेश व्यक्तिगत कर्ज पर आधारित होता है और नुकसान की भरपाई के लिए कोई सुरक्षा-तंत्र मौजूद नहीं होता। खिलौने बेचने वाले, चूड़ी वाले, कपड़े वाले, बरतन वाले, किताबों की दुकान लगाने वाले, बड़े-बड़े झूले चलाने वाले, मौत का कुआं लगाने वाले, मिठाई बनाने वाले, बिजली मिस्‍त्री, ट्रांसपोर्टर और अस्थाई मजदूर, आदि हजारों परिवारों की आजीविका मेलों की दुनिया से जुड़ी रही है। इनमें से अधिकांश का कोई स्थाई बाजार नहीं होता। उनका बाजार वहीं बनता है जहां मेला लगता है। साल का कैलेंडर महीनों से नहीं, मेलों से तय होता है। गर्मियों की छुट्टियों में कहां मेला लगेगा, सावन में कहां जाना है, दशहरे पर किस शहर में मेला है, दीपावली के बाद किस राज्य की ओर निकलना है- मेलेवालों की पूरी जिंदगी ऐसे ही सवालों के बीच गुजरती है।

राजस्थान के अजमेर जिले का टांटोटी गांव मेलों से जुड़े असंगठित क्षेत्र पर कोरोना के कारण पड़े असर का बड़ा उदाहरण है। यह गांव मेला कारोबार की दुनिया में एक अलग पहचान रखता है। इस गांव के अनेक परिवार पीढ़ियों से झूले लगाने और चलाने के काम से जुड़े रहे हैं। इस गांव के बच्चे स्कूलों में जाकर लिखना-पढ़ना नहीं सीखते। ये बच्चे बचपन से ट्रकों, लोहे के ढांचों और मेले के मैदानों के बीच बड़े होते हैं। यही उनका पेशा है, पहचान है, यही आजीविका और यही विरासत।


कुम्भ-2025: एक अपराधी की सरकारी प्रेरक-कथा में छुपी मल्लाहों की सामूहिक व्यथा


कोरोना के दौरान जब दो साल तक मेले बंद रहे तो इस गांव के अनेक परिवारों पर आर्थिक संकट टूट पड़ा। कुछ लोगों ने मजबूरी में अपने झूले बेच दिए। कई लोग कर्ज में डूब गए। जो लोग इस पेशे में टिके रहे वे आज भी बढ़ती लागत और घटते मुनाफे से जूझ रहे हैं। गांव के झूला संचालक चेमुद्दीन कहते हैं, ‘हमारे पास दूसरा हुनर नहीं है। बाप-दादा यही काम करते थे, हम भी इसी काम पर आश्रित हैं।’

इस वाक्‍य के भीतर पीढिय़ों का भविष्य छिपा है। कोई आइटी इंजीनियर कंपनी बदल सकता है, एक शिक्षक दूसरे स्कूल में पढ़ा सकता है, लेकिन जिसने बचपन से केवल मेले लगाए हों, विशाल झूले खड़े किए हों और साल का अधिकांश समय ट्रकों के साथ एक शहर से दूसरे शहर घूमते हुए बिताया हो उसके लिए दूसरा पेशा चुनना इतना आसान और सहज नहीं होता।

यह केवल पेशा बदलने की कहानी नहीं है। यह इंसान की पूरी जीवनशैली के बिखरने का एक जटिल फसाना है। बकौल छुट्टन, ‘जिस काम, माहौल में ज्यादातर जिंदगी बिता दी हो उससे अलग होना बड़ा मुश्किल है, लेकिन चारा भी कोई नहीं।’

हनुमानगढ़ के एनएम पीजी कॉलेज में समाजशास्त्र की सहायक प्रोफेसर डॉ. अर्चना गोदारा पारंपरिक मेलों को भारतीय समाज की सामाजिक पूंजी का महत्वपूर्ण हिस्सा मानती हैं। वे बताती हैं कि ये मेले ऐसे सार्वजनिक मंच थे जहां अलग-अलग जातियों, समुदायों, गांवों और पीढ़ियों के लोग बिना किसी औपचारिक व्यवस्था के एक-दूसरे से जुड़ते थे।

डॉ. अर्चना कहती हैं, ‘ऑनलाइन बाजार और डिजिटल अर्थव्यवस्था ने पारंपरिक व्यवसायों को गहराई से प्रभावित किया है। जो लोग समय के साथ डिजिटल माध्यमों से जुड़ गए उन्हें नए अवसर मिले हैं, लेकिन हस्तशिल्पियों, कारीगरों और अन्य पारंपरिक व्यवसायों से जुड़े अनेक लोग आज भी अपनी आजीविका के लिए ऐसे मेलों पर निर्भर हैं। ऐसे में यदि किसी भी कारण से ये पारंपरिक मेले धीरे-धीरे समाप्त होते हैं तो इसका असर केवल हजारों परिवारों की रोजी-रोटी पर ही नहीं पड़ेगा, बल्कि ग्रामीण समाज की पहले से कमजोर हो रही सामुदायिक और सहभागी संस्कृति और भी अधिक क्षीण हो जाएगी।‘


Dr. Archana Godara, Assistant Professor of Sociology in Hanumangarh, Rajasthan
  • डॉ. अर्चना गोदारा, समाजशास्त्री

करीब चार-पांच दशक पहले तक अधिकांश मेले मंदिरों, दरगाहों और स्थानीय उत्सवों से जुड़े होते थे। झूले वाले, छोटे व्यापारी और दुकानदार दूर-दूर से आते, कुछ दिनों के लिए अस्थाई डेरा डालते और मेला खत्‍म होते ही अगले शहर की ओर निकल पड़ते थे। कई मेलों में तो बैठने की जगह का किराया तक नहीं लिया जाता था। फिर धीरे-धीरे व्यापारिक मेले बढ़े। पेशेवर आयोजकों का एक वर्ग उभरा। व्यवस्था बदली, लेकिन लंबे समय तक इस दुनिया की बुनियाद रिश्तों, भरोसे और अनुभव पर टिकी रही।

पिछले एक दशक में एक नया बदलाव शुरू हुआ जिसे कोरोना महामारी ने तेज कर दिया। आम तौर पर इस बदलाव की चर्चा महामारी से शुरू होती है, लेकिन जिन लोगों ने पूरी जिंदगी मेलों में बिताई है वे कहते हैं कि कोरोना केवल पहला झटका था। असल बदलाव तो उसके बाद आया। कोरोना की पाबंदियां खत्म होने के बाद जब मेले लौटे तब मैदान पहले जैसे नहीं रहे। नीलामी महंगी हो चुकी थी। आयोजन की लागत बढ़ चुकी थी। टेंट, डोम, जनरेटर, बिजली, सुरक्षा, तकनीकी कर्मचारियों और प्रशासनिक औपचारिकताओं पर खर्च लगातार बढ़ रहा था।

मेला आयोजक बताते हैं कि इसी दौरान बड़ी पूंजी वाले नए खिलाड़ी इस कारोबार में उतरने लगे। प्रतिस्पर्धा का स्वरूप बदल गया और उसका सबसे बड़ा असर उन लोगों पर पड़ा जो इस पूरी व्यवस्था की सबसे निचली सीढ़ी पर खड़े थे, जैसे झूला संचालक, छोटे दुकानदार और घूम-घूमकर काम-धंधा करने वाले परिवार।

इस संवाददाता ने पिछले चार दशक में अनेक मेले देखे हैं। कोरोना से पहले के जीवंत मेले, कोरोनाकाल में बंद पड़े मेले और कोरोना के बाद सिर उठाने की कोशिश कर रहे मेले भी। इस दौरान राजस्थान, गुजरात, पंजाब, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश के मेला आयोजकों, झूला संचालकों, दुकानदारों और इस कारोबार से जुड़े अनेक लोगों से बातचीत के दौरान एक सवाल बार-बार सामने आया कि क्या भारत की पारंपरिक मेला अर्थव्यवस्था अब ऐसे बाजार में बदल रही है जहां टिके रहने के लिए अनुभव नहीं, बल्कि बड़ी पूंजी की जरूरत है? यही सवाल अब मेलों की दुनिया का केन्द्रीय प्रश्न बन चुका है।

महामारी के बाद जनवरी 2022 में जब कुछ राज्यों में सीमित स्तर पर मेले लगने शुरू हुए, तब राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले के संगरिया के मीरा कॉलेज में लगे मेले में इस संवाददाता की मुलाकात कई ऐसे लोगों से हुई थी जिनकी पूरी दुनिया इन मेलों के इर्द-गिर्द घूमती थी। किसी ने पहली बार कर्ज लिया था। किसी ने घर का सामान बेचकर परिवार चलाया था। किसी को डर था कि यदि महामारी की एक और लहर आ गई तो उसका कारोबार हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा।



कोरोना अब अतीत की बात हो चला है। देश भर में मेले फिर लग रहे हैं। वे फिर से पहले जैसी रौनक से भरने लगे हैं। शाम ढलते ही रोशनी में नहाये झूले घूमते हैं, लाउडस्पीकरों पर संगीत बजता है, खिलौनों और मिठाइयों की दुकानें सज जाती हैं और इन मेलों में हजारों लोग परिवार के साथ मेले का आनंद लेने पहुंचते हैं। बाहर से देखने पर ऐसा लगता है मानो महामारी ने इस दुनिया को केवल दो साल के लिए ठप किया था, अब सब कुछ पहले जैसा हो गया है। यह दृश्य अधूरा है।

आज पांच साल बाद उन्हीं लोगों से दोबारा बात करने पर महसूस होता है कि महामारी का डर तो खत्म हो गया, लेकिन असुरक्षा नहीं गई। उसका स्वरूप बदल गया है। अब चिंता वायरस की नहीं, बाजार की है।

पैसे का निर्णायक बन जाना मेलों की दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ है। पहले सबसे बड़ी पूंजी मेले लगाने का अनुभव होता था। वह सांस्‍कृतिक पूंजी थी। अब सबसे बड़ी पूंजी पैसा है।

देश के सभी राज्यों में सरकारी निकायों ने कई स्थानों पर सार्वजनिक मैदानों का आवंटन ई-नीलामी के माध्यम से करना शुरू किया है। सिद्धांत रूप से यह व्यवस्था पारदर्शी कही जा सकती है, लेकिन हिमाचल में 13 साल से मेले लगा रहे जतिन कुमार का तर्क है कि इसका एक परिणाम यह भी हुआ कि पूंजी सबसे निर्णायक चीज बन गई है। नतीजतन मेले अब पूंजीपतियों के होकर रह गए हैं।

गुजरात मेला वेलफेयर एसोसिएशन के प्रतिनिधि परेश भट्ट बताते हैं कि लगभग एक दशक पहले तक कई बड़े मैदान अपेक्षाकृत कम किराये पर मिल जाते थे। धीरे-धीरे नीलामी की रकम लाखों से बढ़कर कई जगह करोड़ों रुपये तक पहुंच गई। भट्ट के मुताबिक इस नई प्रतिस्पर्धा में वे लोग पिछड़ने लगे जिनके पास अनुभव तो था, लेकिन बड़ी पूंजी नहीं थी।

राजस्थान के जोधपुर में रावण का चबूतरा इसका एक उदाहरण है। यह मैदान बरसों से मेलों का प्रमुख केंद्र रहा है। यहां एक मेला समाप्त होता, तो दूसरा शुरू हो जाता था। झूले आते, दुकानें सजतीं और कुछ दिनों के लिए पूरा मैदान एक अस्थाई शहर में बदल जाता था। पिछले कुछ साल में यह मैदान एक बड़े विवाद का केंद्र बन गया। सवाल यह नहीं था कि मेला लगेगा या नहीं। सवाल यह था कि मेला लगाएगा कौन?



फरवरी 2026 में जब जोधपुर नगर निगम ने मैदान को बार-बार नीलामी कर के किराये पर देने के बजाय साढ़े तीन करोड़ रुपये की न्यूनतम बोली में पूरे साल के लिए ई-नीलामी की प्रक्रिया शुरू की, तो मेलेवालों के नवगठित संगठन भारतीय मेला एसोसिएशन ने इसका विरोध किया। एसोसिएशन के प्रतिनिधियों का कहना था कि यदि पूरा मैदान एक वर्ष के लिए किसी एक बड़े ठेकेदार या कंपनी को दे दिया जाएगा तो वर्षों से अलग-अलग समय पर मेले लगाने वाले छोटे आयोजकों के लिए जगह ही नहीं बचेगी। उनका तर्क था कि करोड़ों रुपये की आरक्षित बोली और भारी धरोहर राशि जैसी शर्तें पारंपरिक आयोजकों की पहुंच से बाहर हैं। विरोध के चलते जोधपुर में भले ही यह नीलामी निरस्त कर दी गई, लेकिन देश भर में यह सिलसिला जारी है।

गुजरात के सिद्धपुर में नीलामी की राशि छह करोड़ रुपये और महाराष्ट्र के औरंगाबाद में सवा करोड़ रुपये तक पहुंच गई। राजस्थान के बांसवाड़ा जैसे छोटे शहर में यह नीलामी एक करोड़ के करीब पहुंचने लगी है। हिमाचल प्रदेश के चम्बा में इस साल ग्राउंड की नीलामी तीन करोड़ रुपये से ज्यादा में छूटी है। झूले लगाने के लिए अलग से नीलामी की गई, जो साठ लाख रुपये में छूटी।

मेला कारोबार में आया बदलाव केवल बढ़ती नीलामी और निवेश तक सीमित नहीं है। अब सरकारी मेलों की निविदाओं में ऐसी शर्तें जोड़ी जा रही हैं जो छोटे और मध्यम आयोजकों को अपने आप बाहर कर देती हैं। उदाहरण के तौर पर, उदयपुर नगर निगम द्वारा 2025 के दीपावली मेले के लिए जारी दूसरी ई-निविदा में एक नई शर्त जोड़ी गई कि बोलीदाता के पास पिछले पांच वर्षों में किसी सरकारी या अर्ध-सरकारी संस्था के लिए कम से कम एक करोड़ रुपये के एक मेला आयोजन का अनुभव होना चाहिए। डूंगरपुर में नगर परिषद ने भी ऐसी ही शर्त जोड़ी।

मेला आयोजकों का कहना है कि इस तरह की शर्तों को पूरा करना अधिकांश पारंपरिक आयोजकों के लिए संभव नहीं है क्योंकि वे वर्षों से छोटे और मध्यम स्तर के मेले आयोजित करते रहे हैं। मेला आयोजक आरोप लगाते हैं कि ऐसी शर्तें प्रतिस्पर्धा को सीमित करती हैं और कुछ बड़ी कंपनियों तथा पैसे वाली फर्मों को ही पात्र बनाती हैं। इससे मेला कारोबार में वही स्थिति पैदा हो रही है जो कई अन्य क्षेत्रों में देखी गई है- धीरे-धीरे छोटे खिलाड़ी बाहर होते जाते हैं और बाजार कुछ बड़े खिलाडिय़ों के हाथों में सिमटने लगता है। इस कारण पारंपरिक आयोजक अब केवल बढ़ती लागत और महंगी नीलामी से ही नहीं, बल्कि बदलती प्रशासनिक और निविदा व्यवस्थाओं से भी अपने अस्तित्व पर संकट महसूस कर रहे हैं।

मेला आयोजकों की सबसे बड़ी शिकायत बढ़ती लागत नहीं है। उनका कहना है कि पिछले एक दशक में इस कारोबार की प्रकृति ही बदल गई है। भारतीय मेला एसोसिएशन के राष्ट्रीय महासचिव जगराम गुर्जर कहते हैं, ‘अब इस क्षेत्र में ऐसे निवेशक भी आने लगे हैं जिनके लिए मेला सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि एक व्यावसायिक अवसर है।‘

तीन दशक से अधिक समय से मेला कारोबार में सक्रिय मुंबई के मेला आयोजक वकील अहमद खान का कहना है कि महामारी के बाद मैदानों के बढ़ते किरायों ने पारंपरिक आयोजकों के लिए टिके रहना पहले से कहीं कठिन बना दिया है। खान और हिमाचल प्रदेश के मेला आयोजक जतिन कुमार दोनों गुर्जर की इस बात से लगभग सहमत दिखते हैं कि निवेशकों के लिए मेले अब व्यावसायिक अवसर बनते जा रहे हैं।


  • जगराम गुर्जर, राष्ट्रीय महासचिव, भारतीय मेला एसोसिएशन
Jagram Gurjar, General Secretary, Indian Fair Association

बेशक, यह इस बहस का एक पक्ष है। सरकारों और स्थानीय निकायों का तर्क अलग है। सरकारी अधिकारियों का कहना है कि सार्वजनिक मैदानों की ई-नीलामी पारदर्शिता को बढ़ाती है, प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित करती है और राजस्व सुनिश्चित करती है। फिर, सुरक्षा मानकों को सख्त करना भी आवश्यक है।

इन तर्कों को पूरी तरह से खारिज नहीं किया जा सकता, लेकिन सवाल है कि यदि हर नीति का अंतिम परिणाम यह हो कि दशकों से जुड़े छोटे खिलाड़ी धीरे-धीरे बाहर होते जाएं तो क्या उसकी सामाजिक लागत पर भी विचार नहीं होना चाहिए?

मेले लगाने के लिए जिन मैदानों की दरकार है, उनकी बढ़ती नीलामी का असर आखिर किस पर पड़ता है? यह सवाल सुनने में जितना सरल है, उसका जवाब उतना ही जटिल है।

किसी भी मेले में सबसे ऊपर आयोजक दिखाई देता है। उसके नीचे झूला संचालक होते हैं। फिर दुकानदार। और सबसे नीचे वे अस्थाई मजदूर जो झूले खड़े करते हैं, बिजली की फिटिंग करते हैं, टिकट बेचते हैं, ट्रकों से सामान उतारते हैं, रात भर चौकीदारी करते हैं या मेले के खत्म होने पर पूरा ढांचा समेटते हैं। जब लागत बढ़ती है तो उसका बोझ भी इसी क्रम में नीचे उतरता चला जाता है। मैदान महंगा हुआ तो आयोजक स्टॉल का किराया बढ़ाता है। झूला संचालकों से अधिक हिस्सा लेता है। दुकानदार अपना खर्च घटाने की कोशिश करता है। और अंतत: सबसे ज्यादा दबाव उस मजदूर पर पड़ता है, जिसकी दिहाड़ी पहले ही सीमित है।

यही कारण है कि किसी मेला मैदान की करोड़ों रुपये की नीलामी केवल एक प्रशासनिक फैसला नहीं होती। उसका असर उन हजारों परिवारों तक पहुंचता है जिनके नाम शायद किसी सरकारी सूची में दर्ज भी नहीं हैं।

मूल रूप से इंदौर निवासी और वर्तमान में जयपुर में रह रहे संतोष कुमार शर्मा बताते हैं कि उनका परिवार पीढ़ियों से मेलों से जुड़ा है। उनके पिता मटका कुल्फी की स्टॉल लगाते थे। वह खुद करीब दस साल की उम्र से उनके साथ मेलों में जाने लगे और बाद में फूड स्टॉल का काम संभाल लिया। वह कहते हैं कि महामारी से पहले बड़े फूड स्टॉल के लिए उन्हें लगभग 20 से 30 हजार रुपये किराया देना पड़ता था। अब कई आयोजनों में यही जगह एक लाख रुपये तक में मिलती है।


Santosh Kumar Sharma of Jaipur has been working in fairs since his childhood
संतोष कुमार शर्मा: बचपन से मेलों पर निर्भर जिंदगी

चुनौती केवल स्टॉल के किराये तक सीमित नहीं है। एलपीजी सिलेंडर भी बहुत महंगे हो गए हैं। पहले कमर्शियल सिलेंडर करीब 1800 रुपये में मिल जाता था। अब इसकी कीमत 3200 रुपये तक पहुंच गई। वे बताते हैं कि बीच में तीन महीने तो सिलेंडर ही नहीं मिले, इसलिए काम बंद रखना पड़ा। संतोष के स्टॉल पर सात कर्मचारी काम करते हैं। स्टॉल का किराया, गैस, कच्चा माल और कर्मचारियों के वेतन की बढ़ती लागत ने कारोबार का पूरा गणित बदल दिया है।

भट्ट बताते हैं कि जब किसी गांव या शहर में मेला लगता है तो सबसे ज्यादा दिखाई देते हैं झूले और दुकानें, लेकिन उनके पीछे एक और दुनिया काम करती है। बिजली मिस्त्री, ट्रक चालक, सफाई कर्मचारी, टिकट बेचने वाले, चौकीदार, खाना बनाने वाले और स्थानीय मजदूर। इनमें से अधिकांश लोगों का कहीं कोई रिकॉर्ड नहीं मिलता, लेकिन हर मेला इन्हीं के श्रम पर खड़ा होता है। जब कोई मेला छोटा हो जाता है या नहीं लगता तो उसके असर की लहरें इस पूरी श्रम श्रृंखला में फैल जाती हैं। इसीलिए मेला केवल मनोरंजन उद्योग नहीं है। यह हजारों परिवारों को प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से रोजगार देने वाली एक अनौपचारिक और असंगठित अर्थव्यवस्था है।

जगराम गुर्जर मानते हैं कि इस क्षेत्र की बड़ी कमजोरी इसका असंगठित होना है। उनके अनुसार लंबे समय तक इस क्षेत्र से जुड़े लोग बिखरे रहे। जब नई चुनौतियां सामने आईं तब उन्हें महसूस हुआ कि साझा मंच के बिना सरकार और प्रशासन तक अपनी बात पहुंचाना मुश्किल है। इसी सोच के साथ बीते वर्ष पहले राजस्थान स्तर पर और बाद में राष्ट्रीय स्तर पर संगठन बनाने की पहल हुई।

गुर्जर कुछ और महत्वपूर्ण सवाल उठाते हैं। वह पूछते हैं कि देश में आखिर कितने परिवार सीधे या परोक्ष रूप से मेला अर्थव्यवस्था पर निर्भर हैं? कितने झूला संचालक हैं? घूम-घूमकर दुकान लगाने वाले कितने व्यापारी हैं? कितने अस्थाई मजदूर हैं? इसका कोई समेकित सरकारी आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। जब किसी क्षेत्र की सही गिनती ही नहीं होती तो उसकी समस्याएं भी अक्सर नीतियों में दिखाई नहीं देतीं। 

राजस्थान आर्थिक परिषद के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष प्रो. संतोष राजपुरोहित मानते हैं कि मेलों की अर्थव्यवस्था देश के असंगठित क्षेत्र का महत्वपूर्ण भाग है। अगर नीतिगत बदलावों या बढ़ती लागत के कारण मेले कम होते हैं तो उसका प्रभाव पूरी स्थानीय अर्थव्यवस्था और रोजगार श्रृंखला पर पड़ता है। राजपुरोहित कहते हैं कि मेलों के दृष्टिगत ऐसी नीति बननी चाहिए जो छोटे संचालकों के लिए भी व्यवहारिक और आर्थिक रूप से संभव हो।

मई 2024 में गुजरात के राजकोट गेमिंग जोन आग लग गई थी, जिसमें 32 लोगों की जान चली गई थी। उसके बाद से कई राज्यों ने सुरक्षा मानकों को लेकर सख्ती बढ़ा दी थी। उसके बाद से गुजरात में हालात ऐसे हैं कि कई जगह मेले लगने ही बंद हो गए हैं और दूसरे राज्यों में भी नए नियमों को लेकर असुरक्षा का माहौल है।

गुर्जर मानते हैं कि राजकोट की घटना बेहद दुखद थी और सुरक्षा से कोई समझौता नहीं होना चाहिए, लेकिन उस हादसे के बाद जो नियम बनाए गए उनमें बंद गेमिंग जोन और खुले मैदानों में लगने वाले पारंपरिक मेलों के बीच पर्याप्त अंतर नहीं बरता गया। छोटे झूला संचालकों पर महंगे इंजीनियरिंग प्रमाणपत्र, भारी बीमा, जटिल लाइसेंस और निरीक्षण जैसी शर्तों का बोझ डाल दिया गया। पहले से कर्ज लेकर काम करने वाले छोटे व्यवसायियों के लिए इन शर्तों को पूरा करना बेहद मुश्किल हो गया है।

सुरक्षा मानकों के नाम पर मेलों में सरकारी दखल बढ़ा तो मेला लगाने वालों की दुश्‍वारियां भी बढ़ीं, लेकिन सुरक्षा व्‍यवस्‍था की स्थिति में कोई खास फर्क नहीं आया। जनवरी 2025 में संगम किनारे लगा महाकुम्‍भ इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। महाकुम्‍भ भारत का सबसे बड़ा मेला है। इसके जिक्र के बगैर मेलों की कोई भी कहानी अधूरी है। इतने अहम मेले में पिछले साल हुए दोहरे-तिहरे हादसे बताते हैं कि सरकारी सुरक्षा नीतियां और मानक अंतत: कैसे निजी कंपनियों के हक में काम आते हैं।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार 29 जनवरी 2025 को मौनी अमावस्‍या के स्‍नान के लिए भोर में हुई भगदड़ में 30 लोगों की जान चली गई थी और 60 से ज्‍यादा लोग घायल हुए थे, हालांकि गैर-सरकारी आंकड़े इससे बहुत ज्‍यादा हैं। ऐसा तब हुआ जब कुम्‍भ मेले का पूरा आयोजन उत्तर प्रदेश राज्‍य सरकार के अंतर्गत प्रयागराज मेला प्राधिकरण के हाथों में था। इसका एक तथ्‍य हालांकि सार्वजनिक नजरों से छुपा रहा। वो यह कि राज्‍य सरकार ने मेले के लिए मेगा सिटी बनाने, उसके नियोजन, डिजिटल व्‍यवस्‍थाओं तथा बुनियादी ढांचे का ठेका दुनिया की पांच सबसे बड़ी परामर्शदाता कंपनियों में से एक अर्नस्‍ट ऐंड यंग (ईऐंडवाइ) को दिया था।


E&Y instagram post that tells about its digitalisation job in Mahakumbh fair, 2025
इस पोस्ट में दिया E&Y की वेबसाइट का लिंक अब निष्क्रिय है, लेकिन इंस्टाग्राम पर आज भी यह पोस्ट मौजूद है

पिछले महाकुम्‍भ के आयोजन के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने महीनों पहले एक महाकुम्भ को एक ’प्रोजेक्‍ट’ बताकर बोलीदाताओं के सामने पेश किया था। टीसीएस, केपीएमजी, ईऐंडवाइ आदि बड़ी कंपनियों की होड़ में कुम्‍भ का ठेका अर्नस्‍ट ऐंड यंग (ईऐंडवाइ) को चला गया क्‍योंकि उसे दसेक साल से अर्धकुम्‍भ के प्रबंधन का अनुभव है। यानी, देश के सबसे बड़े मेले का कॉरपोरेट द्वारा प्रबंधन कोई एक दशक से जारी था, लेकिन 2025 से पहले इसे कोई नहीं जानता था जब तक कि हादसों में लोगों की जान नहीं चली गई। मेला क्षेत्र में ईऐंडवाइ के 200 कर्मचारियों की फौज कमान और कंट्रोल सेंटर में बैठी हुई थी। कमान और कंट्रोल का मतलब ताकत और ताकत का मतलब पैसा।      

अब सुरक्षा के नाम पर निजीकरण और पूंजीकरण की यही स्थिति छोटे मेलों में भी देखी जा रही है। छोटे मेलों के आयोजक तो खुद मानते हैं कि सुरक्षा से कोई समझौता नहीं होना चाहिए, लेकिन उनका कहना है कि खुले मैदानों में कुछ दिनों के लिए लगने वाले पारंपरिक मेलों और स्थायी मनोरंजन परिसरों के लिए गुजरात समेत कई जगह लगभग एक जैसी प्रक्रियाएं लागू होने लगी हैं। इससे छोटे आयोजकों की लागत और बढ़ गई है।

राजपुरोहित कहते हैं, ‘किसी भी नीति का मूल्यांकन केवल सुरक्षा या राजस्व के आधार पर नहीं होना चाहिए। यह भी देखना अपरिहार्य है कि उसका प्रभाव असंगठित रोजगार, स्थानीय बाजार और सांस्कृतिक विरासत पर किस प्रकार पड़ रहा है। यदि नीति का अनुपालन छोटे संचालकों के लिए असंभव हो जाए तो धीरे-धीरे पूरा पारंपरिक तंत्र खत्म होने लगता है।‘

जगराम गुर्जर कहते हैं, ‘हम सुरक्षा नियमों के विरोध में नहीं हैं। हमारी मांग सिर्फ इतनी है कि बड़े मैकेनिकल राइड्स और पारंपरिक झूलों के लिए अलग-अलग मानक बनाए जाएं। सरकार श्रेणीकरण की व्यवस्था करे, समूह बीमा और कम लागत वाली निरीक्षण प्रणाली लागू करे तथा लाइसेंस प्रक्रिया को सरल बनाए। सबसे जरूरी यह है कि नए नियम लागू करने से पहले दो-तीन साल का ग्रेस पीरियड दिया जाए ताकि छोटे संचालक भी धीरे-धीरे आवश्यक मानकों को पूरा कर सकें।‘

परेश भट्ट कहते हैं कि असल प्रश्न सुरक्षा बनाम कारोबार का नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या ऐसी व्यवस्था बनाई जा सकती है जिसमें सुरक्षा भी सुनिश्चित रहे और पारंपरिक आजीविका भी अनावश्यक दबाव में न आए। आजीविका का सवाल इसलिए अहम है क्‍योंकि उसका संबंध मेलों के सामाजिक-सांस्‍कृतिक आयाम के साथ बहुत गहरा है।

चूंकि मेलों की अर्थव्‍यवस्‍था परंपरागत रूप से अनौपचारिक और असंगठित रही है, इसलिए कोरोना के बाद से ऐसा कोई केंद्रित अध्‍ययन नहीं हुआ है जो बता सके कि देश भर में कितने मेलों पर बंदी का असर पड़ा है और कितने परिवारों की आजीविका प्रभावित हुई है।

इसके बावजूद, कुछ बातें पहली बार देखने में आईं। मसलन, 34 साल में पहली बार दिल्‍ली की सीमा पर लगने वाला फरीदाबाद का सूरजकुंड मेला 2021 में नहीं लगा। उसी साल हरिद्वार के कुम्‍भ को घटाकर महीने भर में समेट दिया गया। ये दोनों देश के सबसे बड़े मेलों में आते हैं। बनारस के मशहूर कटहरिया और लोटा-भंटा मेले में कोरोना के बाद सुरक्षा के नाम पर प्रशासन ने झूलों पर ही रोक लगा दी।

सबसे बड़ा असर उत्तर प्रदेश में पांच सौ साल पुराने गाजी मियां के मेले पर देखने में आया। इसे सरकार ने पूरी तरह से बंद करवा दिया है। बहराइच स्थित सैयद सालार मसूद गाजी की दरगाह पर हर साल जेठ के महीने में एक महीने लंबा ऐतिहासिक मेला लगता था। पिछले वर्षों में स्‍थानीय खुफिया विभाग की सुरक्षा रिपोर्ट और अन्य क्षेत्रीय विवादों का हवाला देते हुए जिला प्रशासन ने इस मेले के आयोजन की अनुमति देने से साफ इनकार कर दिया। इतिहास में लगभग 500 साल बाद ऐसा हुआ कि यह मेला आयोजित नहीं हो सका।

दरगाह मेला प्रबंध समिति ने इस रोक के खिलाफ इलाहाबाद हाइकोर्ट (लखनऊ बेंच) का दरवाजा खटखटाया था। हाइकोर्ट ने भी मेला लगाने, दुकानें सजाने और सांस्कृतिक कार्यक्रम करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया, हालांकि उसने स्पष्ट किया कि ज़ायरीन सामान्य रूप से दरगाह पर जि़यारत और धार्मिक रस्में पूरी करने आ सकते हैं, लेकिन भीड़ लगाने या रुकने की अनुमति उन्‍हें नहीं होगी।

बहराइच के साथ-साथ उत्तर प्रदेश के अन्य जिलों में भी गाजी मियां के नाम पर लगने वाले स्थानीय आयोजनों को बंद कर दिया गया है। जैसे, संभल के नेजा मेला पर प्रशासन ने पूरी तरह रोक लगा दी। जिस स्थान पर पारंपरिक रूप से झंडा (नेजा) गाड़ा जाता था, सुरक्षा और कानून-व्यवस्था का हवाला देते हुए उस गड्ढे को प्रशासन ने सीमेंट से भरवा कर ब्लॉक कर दिया। प्रयागराज व मुरादाबाद में भी स्थानीय स्तर पर लगने वाले छोटे गाजी मेलों के व्यावसायिक स्वरूप और दुकानों पर पाबंदियां लगा दी गई हैं।

अन्‍य राज्‍यों में बिहार का सोनपुर मेला अपने परंपरागत रूप में पूरी तरह खत्‍म हो चुका है। यह एशिया का सबसे बड़ा पशुओं का मेला होता था। बंगाल में रबींद्रनाथ टैगोर द्वारा शुरू किया गया शांतिनिकेतन का ऐतिहासिक पौष मेला 2020 के बाद कई बार अंतिम समय पर रद्द किया गया। मेरठ का नौचंदी मेला, महोबा का कजरी मेला, बांका का सुइया मेला, कुछ ऐसे मेले हैं जो अब परंपरागत रूप में देखने को नहीं मिलते। ये केवल प्रदर्शनी भर बनकर रह गए हैं।



मेले बनाए ही इसलिए गए थे कि लोग मिलें-जुलें। जब मेले टूटते हैं तो समाज में लोगों का मेलजोल टूटता है। फिर जीवन का उत्‍सव पूंजी का आयोजन बनकर रह जाता है और आदमी अकेला पड़ जाता है, जैसे डूंगरपुर के छुट्टन खान, जो हर सुबह दुकान की शटर खोलते हैं और शाम को गिरा देते हैं।

उनकी जिंदगी बेशक पहले के मुकाबले अब ज्‍यादा ठहरी हुई है, लेकिन मेलों की बात आते ही उनके चेहरे पर एक अलग-सी मुस्कान तैर जाती है, ‘भले ही वह खानाबदोशों सी जिंदगी थी, लेकिन उसका एक अलग मजा था। वहां दोस्त थे। सफर था। वह ऐसी दुनिया थी जो शहर-दर-शहर बदलती थी।‘

हो सकता है कि आने वाले समय में भी मेले लगते रहें, बचे-खुचे झूले घूमते रहें। दुकानें भी सजती रहें, बच्चे भी पहले की तरह खिलौनों के लिए जिद करते रहें, लेकिन जो खतरा सामने दिख रहा है वो यह है कि मेलों के पीछे मौजूद पुराने चेहरे बदल जाएंगे। उनकी जगह नए निवेशक, नई कंपनियां और नया कारोबारी ढांचा ले चुका होगा। फिर सवाल यह नहीं होगा कि मेले बचे या नहीं। नया सवाल यह होगा कि बिना किसी बड़े संस्थागत सहारे के सदियों से लाखों परिवारों को काम, पहचान और सांस्‍कृतिक जीवन देने वाली वह आत्मा कहां गुम हो गई जो मेलों के सहारे इस समाज को जिंदा रखती थी।


(आवरण चित्र: अभिषेक श्रीवास्तव; शेष सभी चित्र: अमरपाल सिंह वर्मा)


More from अमरपाल सिंह वर्मा