Climate Change

Time Cover, Dec 29, 2025

TIME का वार्षिकांक कवर: गरमाती धरती और AI की ख़ब्‍त के बीच हवा में फिर भोज

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प्रसिद्ध समाचार पत्रिका टाइम ने महामंदी के दौर की 1932 की एक तस्‍वीर को चेहरे बदलकर 2025 का अपना अंतिम कवर बनाया है। बेचेहरा मजदूरों की जगह उसने दुनिया में AI के सरताज कारोबारियों को चिपका कर सामूहिक रूप से ‘पर्सन ऑफ द ईयर’ घोषित किया है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की भयंकर तेजी, लगातार गरमाती और मनुष्‍ता के लिए खतरा पैदा करती धरती, तथा संस्‍थागत व नैतिक मानदंडों के साथ बेमेल होते प्रौद्योगिकीय ढांचे पर साल के अंत में अंतरा हालदर की जरूरी टिप्‍पणी, प्रोजेक्‍ट सिंडिकेट के सौजन्‍य से

Women fetching water in Barmer, Rajasthan

पानी केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, अब वह न्याय का प्रश्न बन चुका है! पी. साईनाथ का व्याख्यान

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गुरुत्‍वाकर्षण के हिसाब से पानी ऊपर से नीचे की ओर बहता है, लेकिन हजारों साल से जाति, वर्ग और लैंगिक भेदों के मारे भारतीय समाज में यह नियम उलट जाता है। यहां पानी नीचे से ऊपर प्रवाहित होता है। यानी, निचले तबके पानी के लिए श्रम करते हैं और ऊंचे तबके उनका पानी हड़प लेते हैं। यह उलटा प्रवाह जब पानी के निजीकरण के साथ मिलता है तो भयावह असमानता का बायस बन जाता है। फिर पानी महज कुदरती संसाधन नहीं, न्‍याय का सवाल बन जाता है। वरिष्‍ठ पत्रकार पी. साईनाथ का व्‍याख्‍यान ‘पानी का रंग: खत्‍म होता एक प्राकृतिक संसाधन और बढ़ती असमानता’

Green Capitalism, Painting by Kartik Tripathi

धरती को बचाने के नाम पर सियासत और पूंजी का हरा-भरा गठजोड़

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पूंजीवाद के इस दौर में सार्वजनिक समस्‍याओं के समाधानों की विडम्‍बना यह है कि जिसने बीमारी पैदा की है दवा भी वही दे रहा है। वह बीमारी से भी पैसा कमा रहा है और दवा से भी। पूंजीवाद के फैलाये प्रदूषण से नष्‍ट हो रही धरती के लिए पूंजीपतियों द्वारा पैदा किया गया हरित पूंजीवाद का नुस्‍खा ऐसा ही टोटका है, जो जलवायु परिवर्तन के अपराधबोध से नागरिकों को भर के उन्‍हीं की जेब लूटता है। सरल शब्‍दों में आलोक राजपूत का विश्‍लेषण

मौसम की मार, बेपरवाह सरकार और महुए के फूलने का अंतहीन इंतजार…

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सूखे के मामले में बीते अगस्त ने पिछले सौ साल का रिकॉर्ड तोड़ दिया। मानसून में बारिश कम होने से सात राज्य संकट में हैं, लेकिन झारखंड के आदिवासियों की तो कमर ही टूट गई है जिनकी जिंदगी जंगल और उसके फल-फूल के भरोसे चलती है। एक तो बिचौलियों के खेल, उस पर से जलवायु के बदलाव और सरकारी योजनाओं का जमीन पर टोटा, तीनों के जाल में वन आश्रित समुदाय पलायन को मजबूर हैं। पुलिट्ज़र सेंटर के सौजन्य से लातेहार और पलामू से लौटकर सुष्मिता की रिपोर्ट