मौसम की मार, बेपरवाह सरकार और महुए के फूलने का अंतहीन इंतजार…

सूखे के मामले में बीते अगस्त ने पिछले सौ साल का रिकॉर्ड तोड़ दिया। मानसून में बारिश कम होने से सात राज्य संकट में हैं, लेकिन झारखंड के आदिवासियों की तो कमर ही टूट गई है जिनकी जिंदगी जंगल और उसके फल-फूल के भरोसे चलती है। एक तो बिचौलियों के खेल, उस पर से जलवायु के बदलाव और सरकारी योजनाओं का जमीन पर टोटा, तीनों के जाल में वन आश्रित समुदाय पलायन को मजबूर हैं। पुलिट्ज़र सेंटर के सौजन्य से लातेहार और पलामू से लौटकर सुष्मिता की रिपोर्ट

यह मानसून भी आया और चला गया। बीते सौ साल में ऐसा सूखा अगस्‍त किसी ने नहीं देखा था। अपना पेट पालने के लिए जंगल के भरोसे जीने वाले झारखंड के आदिवासी बड़ी उम्‍मीद से थे कि अबकी तो पानी बरसेगा ही- पिछले साल यहां सूखा जो पड़ा था! बिना बरसे ही मौसम ने उनकी उम्‍मीदों पर पानी फेर दिया।

सिर पर घिरते सूखे के बादलों के बीच कोपे गांव की रहने वाली पचास बरस की सुखमनी देवी के पास अब केवल यादें हैं उन दिनों की, जब उनके हरे-भरे जंगलों में में मह-मह महुआ महकता था। बात करते-करते सुखमनी के मुंह से बरबस ही उनकी सादरी भाषा में ये बोल फूट पड़ते हैं “हमनी महुआ बनावा ही, खईबो… हमार लइका भी खाईतो”। महुआ के फूल अब केवल गीतों में बचे हैं।

झारखण्ड सहित सात राज्यों में इस साल मानसून में कम बारिश हुई है। झारखंड में 37 फीसदी कम बरसात दर्ज की गई, लिहाजा लगातार दूसरे साल यहां सूखे की आशंका प्रबल है जबकि राज्य के 256 ब्लॉक पिछले साल से ही सूखाग्रस्‍त घोषित हैं। ऐसा डांवाडोल मौसम खास तौर से यहां के आदिवासियों के लिए बड़ी चिंता का सबब है, जो इस राज्‍य की आबादी का एक तिहाई हैं। चरम मौसमी घटनाओं से सीधे दो-चार होने वाले ये आदिवासी एक तो कुदरती संसाधनों पर अपनी भारी निर्भरता और साथ ही आर्थिक गैर-बराबरी के चलते जलवायु में हो रहे बदलावों के प्रति खुद को बहुत नाजुक स्थिति में पा रहे हैं।

झारखंड का 29 फीसदी इलाका जंगलों से भरा हुआ है। खेती से होने वाली फसलों के अलावा जंगलों में रहने वाली आदिवासी आबादी की कमाई का एक-चौथाई से ज्यादा हिस्‍सा तेंदू पत्ता, लाख, महुआ और इमली जैसे लकड़ी से इतर वन उत्‍पादों को बेचने से आता है। बदलते हुए मौसम ने न सिर्फ वन उत्‍पादों में गिरावट पैदा की है, बल्कि उनकी गुणवत्‍ता पर भी असर डाला है जिसके चलते बाजार में उनका दाम गिरा है और इसका सीधा असर आदिवासियों की आजीविका पर पड़ा है। फसलों का भी हाल इससे कुछ अलग नहीं है।  

रांची विश्वविद्यालय में भूगर्भ विज्ञान के सहायक प्रोफेसर नीतीश प्रियदर्शी कहते हैं, “झारखंड में जंगल कम हो गए हैं, साथ ही उनसे मिलने वाली उपज- महुआ, खुखड़ी, रुगडा (अलग किस्म के मशरूम की प्रजातियां) आदि भी कम हो गए हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण कई बारहमासी नदियां सूख गई हैं जिससे खेती पर असर पड़ा है। धान जैसी फसलों और वन उपज दोनों का उत्पादन गिर गया है। गर्मी के चलते सब्जियां खेतों में ही सड़ जा रही हैं। जलवायु में बढ़ती गर्मी खनन के कारण है, खासकर उन खदानों के चलते जो खुली हुई हैं। लिहाजा बहुत से लोग जो जंगलों में वन उपज के सहारे जिंदा रह सकते थे, कमाई की तलाश में उन्‍हें शहरों का रुख करना पड़ा है।


झारखंड के कोपे गांव की सुखमनी देवी (50) जैसे आदिवासियों का जीवन बदलती हुई जलवायु से प्रभावित हुआ है

यह समस्‍या इसलिए और गहरा गई है क्‍योंकि जंगल में रहने वाले लोगों को स्‍थानीय हाट-बाजार में बिचौलियों के माध्‍यम से अपना माल बेचना पड़ता है। आपूर्ति श्रृंखला और भंडारण का इंतजाम न होने से उन्‍हें अपने उत्‍पादों का सही दाम नहीं मिल पाता। रही सरकार की बात, तो इन उत्‍पादों के उत्‍पादन और मार्केटिंग को प्रोत्‍साहन देने के लिए बीते बरसों में राज्य सरकारों ने बहुत कोशिशें की हैं लेकिन सब अपर्याप्‍त साबित हुई हैं।

ऐसे में कहीं कोई राहत आती नहीं दिखती। अगस्त में झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने केंद्र सरकार पर आरोप लगाया था कि सूखा राहत में वह राज्य को सहयोग नहीं कर रही है। पिछले साल केंद्र ने राष्ट्रीय आपदा राहत कोष से केवल 500 करोड़ रुपये आवंटित किए थे जबकि राज्य सरकार ने सूखे से निपटने के लिए 9,682 करोड़ रुपये की मांग की थी। इस पैसे से केवल 10 लाख किसानों को राहत दी जा सकी। बाकी 23 लाख किसानों को अब भी मदद का इंतजार है। एक रिपोर्ट की मानें, तो इस साल केंद्र ने राहत राशि मंजूर करने से पहले नौ सूखाग्रस्‍त जिलों से रिपोर्ट मंगवाई है।

झारखंड में वन अधिकारों पर काम करने वाले फादर जॉर्ज मोन्निपल्ली कहते हैं, “किसी राज्य या क्षेत्र को सूखाग्रस्त घोषित करने का मतलब होता है कि सरकार को अपने फंड का इस्तेमाल करना होगा, और सरकार ऐसा नहीं करना चाहती।

कुल मिलाकर हालत ये है कि झारखंड के जंगलों में रहने वाले समुदायों को एक साथ तीन चीजों की मार झेलनी पड़ रही है- बदलती हुई जलवायु, भूमि-अधिकारों का न होना और गैर-लकड़ी वनोपज के लिए असंगठित बाजार।

कुम्‍हलाते फूल, मुरझाती जिंदगी  

पचपन साल के जितेंद्र सिंह लातेहार जिले के चेतमा गांव में रहते हैं। मानसून की देरी से उनकी खेती पर भी असर पड़ा है। वे बताते हैं, “मानसून देरी से आया था, इसलिए हम लोग अपनी फसलों की बुवाई भी बहुत देरी से जुलाई में किए।

खेती के लिए मानसून पर निर्भरता का कारण यह है कि झारखंड में सिंचाई की गुंजाइश बहुत कम है। बदलती हुई जलवायु के प्रति इस राज्‍य को नाजुक बनाने वाले कुछ खास कारणों में यहां की असपाट और उथली जमीन है जो अपने भीतर नमी को टिकने नहीं देती; अनुपजाऊ मिट्टी है; बिखरे हुए चक हैं; और अलग-अलग इलाकों में असमान रूप से होने वाली तेज बारिश है। इसी के चलते सिंचाई बहुत कारगर साबित नहीं होती और खेती मुश्किल हो जाती है। जंगलों से मिलने वाली लकड़ी के अलावा बाकी वनोपज यहीं पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और भरपाई के काम आते हैं।

ऐसे वन उत्पादों से पूरे भारत में वन राजस्व का लगभग 40 फीसदी हिस्‍सा आता है और वन-आधारित रोजगार का 55 फीसदी हिस्सा इसमें लगा हुआ है। इन उत्‍पादों के बीच महुआ की अपनी एक खास अहमियत और जगह है। इसके बीज से निकाले गए तेल का औषधीय महत्व तो है ही, इससे मोमबत्‍ती और साबुन भी बनाया जाता है। इसके अलावा, महुआ को सड़ा कर देसी शराब भी बनाई जाती है।

जितेन्द्र सिंह बताते हैं, “धीरे-धीरे महुआ हमारी कमाई के लिए बहुत अहम होता गया है। पहले तो यह हर चीज में काम आता था चूंकि इसका औषधीय फायदा है और यह पोषक भी होता है, लेकिन अब आजीविका के विकल्प कम होते जाने के चलते इसे नकदी फसल की तरह देखा जा रहा है।

आम तौर से गर्मियों में यहां के जंगल महुआ के फूलों की भीनी और तीखी महक से गमक उठते थे, लेकिन इधर बीच कुछ ऐसा हुआ है जिसे नजरअंदाज कर देना कठिन है।   



पलामू में हताई गांव के रहने वाले 40 बरस के उमेश परहिया कहते हैं, “महुआ कम हुआ है। बारिश ही नहीं हुई इस साल, तो फलेगा कैसे?” हताई में परहिया जनजाति की एक बड़ी आबादी रहती है। परहिया “विशेष रूप से अरक्षित जनजातीय समूह” है। उमेश बताते हैं कि पहले महुआ के एक पेड़ से 10 किलो फूल गिरते थे। अब यह मात्रा घटकर 5 किलो रह गई है।

बेमौसम बारिश कैसे महुआ के फूलने पर असर डालती है, इसे वे विस्‍तार से समझाते हैं, ‘’इस साल महुआ खिलने के समय बदल छा गया था। बादल छाने और बिजली से जो उसका ठनका-मनका होता है न, उससे फूल का जो कोंच (फल देने वाला हिस्सा) होता है, खतम हो गया वो, कोंच सूख गया।‘’

उष्णकटिबंधीय जंगलों में आकाशीय बिजली जंगल में आग लगने का एक प्रमुख कारण रही है जिससे पेड़ झुलस जाते हैं। 2021-22 में झारखंड में बिजली गिरने की 440,000 से अधिक घटनाएं दर्ज की गई थीं।

उमेश बताते हैं, “इसी से महुआ कम हुआ है। बारिश हुआ तभी नया पतई दिखा रहा है। पीछे (देर से) उसमें पतई निकल रहा है, मतलब अभी (जुलाई में) पत्‍ती देर से आ रहा है; अब तक आ जाना चाहिए था। हमारे यहां बेमौसम बारिश और कम बारिश का असर ज्‍यादातर जंगली फल-फूल पर पड़ा है।

महुआ में देर से फूल आना ही अकेली चुनौती नहीं है। उमेश बताते हैं, “एक बार जब फूल गिर जाता है और चुन लिया जाता है, तब हम लोग महुआ के बीज से तेल निकालने का काम करते हैं, लेकिन इस बार ये नहीं हो पाया।

उमेश परहिया कहते हैं, “हम लोग बीज इकट्ठा करते हैं, छानते हैं, सुखाते हैं और मानसून खत्म होने से पहले ही उसको बेच देते हैं क्‍योंकि जैसे ही मानसून खत्‍म होता है, तेल सूख जाता है। अगर ठीकठाक महुआ अबकी हुआ होता न, तो हम लोग हर परिवार के लिए कम से कम 10 किलो तेल तो आराम से निकाल लेते।‘’  

अबकी मौसम पटरी से क्‍या उतरा, लोगों की आजीविका ही डगमगा गई है। परहिया कहते हैं, अगर महुआ ठीक से हुआ होता तो हम लोग दो-तीन महीना तो बड़े आराम से गुजारा कर लेते।


पलामू के हताई गांव में खेत जोतता एक किसान: यहां मिट्टी अनुपजाऊ होने के कारण खेती में संभावना कम है

झारखंड से केवल महुआ ही गायब नहीं हुआ है। इस लेखक ने लातेहार और पलामू जिलों के जिन क्षेत्रों का दौरा किया, वहां व्यावसायिक रूप से महत्वपूर्ण उत्पाद जैसे तेंदू के पत्ते भी नदारद थे, जिनका इस्‍तेमाल बीड़ी बनाने के लिए किया जाता है।

एक और प्रमुख उत्पाद जिसे जलवायु परिवर्तन का प्रभाव झेलना पड़ा है, वह लाख है। लाख एक कीड़े की बनाई लाल रंग की राल होती है। लाख का इस्‍तेमाल फर्नीचर चमकाने, चूड़ियां और इत्र बनाने में किया जाता है। पिछले साल एक अध्‍ययन प्रकाशित हुआ था जो झारखंड के 62 गांवों में लकड़ी से इतर वनोपज जुटाने वाले 387 लोगों के साथ किया गया था। अध्‍ययन कहता है कि जलवायु परिवर्तन और खराब गुणवत्ता के कारण पिछले कुछ वर्षों में लाख की कीमत में गिरावट आई है।

उदाहरण के लिए, 2012-13 में “लाख 370 से 250 रुपये किलो पर बेचा जा रहा था जबकि लाख की विभिन्न किस्मों, जैसे रंगीनी, कुसमी के लिए 2019-20 में कीमत लगभग आधी यानी 150 से 100 रुपये किलो तक गिर गई।”

वन उपज से होने वाली कमाई में गिरावट के लिए हालांकि अकेले जलवायु परिवर्तन जिम्मेदार नहीं है।

घाटे का सौदा

जंगलों पर निर्भर आदिवासी अपने माल को छांटने, चुनने और तैयार करने में घंटों बिताते हैं, लेकिन वे जितनी मेहनत करते हैं उसके बदले उन्‍हें मिलने वाली रकम ऊंट के मुंह में जीरे से ज्‍यादा नहीं होती। इसकी एक बुनियादी वजह है संगठित बाजार का न होना, जिसका पूरा फायदा बिचौलिये उठाते हैं।

हताई गांव में रहने वाली शिक्षिका बसंती देवी बताती हैं, ”यहां के लोगों को रेट के बारे में पता ही नहीं चलता है। अभी तो माल कम पैदा हो रहा है इसलिए बिचौलिये दिखाई नहीं दे रहे लेकिन जब उत्पादन अधिक होता है, तो वे एक-एक घर का चक्‍कर लगाते हुए नजर आते हैं और जानने की कोशिश करते हैं कि किसने कितना बटोरा और उसमें से कितना बिक्री के लिए था।

गांव के कुछ लोग यहां अनौपचारिक बाजार के काम करने के तरीकों को हमें समझाते हैं। बिचौलियों को यहां महाजन कहते हैं। वे हर घर से खरीददारी करते हैं। घर-घर से महुआ इकट्ठा करने के बाद बिचौलिये सबसे करीबी बाजार में जाते हैं। वहां वे बारह से पंद्रह रुपये किलो के रेट पर महुए का फूल बेच देते हैं जबकि जंगल से महुआ बीनने-चुनने वालों को शायद ही कभी सही कीमत मिल पाती हो क्‍योंकि वे खुद बाजार में अपना माल नहीं बेच पाते। निकटतम बाजार कम से कम 15-20 किमी दूर होता है और अक्सर सड़क कच्‍ची होती है। इसके अलावा, आदिवासियों के पास महुआ या दूसरी उपज को भंडारित करने की भी सुविधा नहीं होती। नतीजतन, वे अपनी उपज बिचौलियों को बेचने को मजबूर हैं।

दूसरी ओर, सरकार तैयार माल से काफी कमाई करती है। उदाहरण के लिए, बाजार में महुआ 50-100 रुपये लीटर बिकता है, लेकिन महुआ बीनने वालों को एक किलो महुआ के फूल बेचने पर सिर्फ पांच रुपये मिलते हैं।

श्रमिकों, ट्रेड यूनियनों, संगठनों और ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना को लागू करने में सक्रिय लोगों के राष्ट्रीय मंच नरेगा संघर्ष मोर्चा के राज्य संयोजक जेम्स हेरेंज कहते हैं कि राज्य सरकार वन उत्पादों के लिए व्‍यवसायिक रूप से कारगर एक आवश्यक बुनियादी ढांचा प्रदान करने में नाकाम रही है। वे बताते हैं कि जैसे ही उपज एकत्र और संसाधित की जाती है, इसे ठेकेदारों और बिचौलियों को बेच दिया जाता है। इसके दो कारण हैं: एक, अधिकांश वन उत्पादों की शेल्फ लाइफ अपेक्षाकृत कम होती है; और दो, उचित संग्रह तंत्र या भंडारण केंद्रों की उपलब्धता का लगभग अभाव है।

हेरेंज के अनुसार झारखंड के मुकाबले ओडिशा जैसे अन्य राज्यों में इन्‍हीं उत्‍पादों की बिक्री से लोगों की आय छह-सात गुना ज्‍यादा होती है और राज्य को अधिक राजस्व भी मिलता है। उनके मुताबिक समस्या का समाधान तब तक नहीं हो सकता जब तक सहकारी समितियां स्थापित न की जाएं।

वन उपज पर राज्य सरकारों और वन विभागों के एकाधिकार को तोड़ने के लिए 2013-14 में संयुक्‍त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार ने लघु वन उपज (एमएफपी) के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की एक योजना शुरू की थी। इसका उद्देश्य मूल्‍य श्रृंखला में शामिल विभिन्न प्रक्रियाओं- प्रशिक्षण, टिकाऊ संग्रह, खरीद, बुनियादी ढांचा, विपणन, आदि को संस्थागत बनाकर आदिवासी समुदायों की मदद करना था। 2014 में नरेंद्र मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद इस योजना कई झटकों का शिकार हो गई। एक तो कई लघु वन उत्पादों की कीमतें कम कर दी गईं। इसके अलावा, 2017 में दिशानिर्देश जारी किए गए जिसके तहत वनवासियों को व्यापक सर्वेक्षणों में भाग लेने की आवश्यकता थी, जिससे मामले और भी जटिल हो गए। इसके अलावा, मूल्‍य श्रृंखला स्थापित करने के लिए फंड में भी लगातार उतार-चढ़ाव देखने को मिलता रहा है।

एक अन्य योजना,जिसे प्रधानमंत्री वन धन योजना कहा जाता है, उसके तहत वन धन विकास केंद्रों का गठन शामिल है। ये सामुदायिक स्वामित्व वाले केंद्र हैं जो वन उपज के एकत्रीकरण, प्रसंस्‍करण और पैकेजिंग के लिए जिम्मेदार हैं।

यह सब कुछ सुनने में बहुत अच्छा लगता है, लेकिन सवाल है कि जमीन पर चीजें कैसी चल रही हैं?

झारखंड सरकार की वेबसाइट बताती है कि राज्‍य में ऐसे 39 केंद्र हैं। जिन जिलों में लेखक ने दौरा किया (लातेहार और पलामू) वहां हरेक में ऐसे दो केंद्र बताए गए हैं, हालांकि लेखक ने जिन लोगों से बात की उनमें से किसी को भी इन केंद्रों के बारे में पता नहीं था।



वन अधिकारों पर काम करने वाली संस्था झारखंड वन अधिकार मंच के समन्वयक सुधीर पाल कहते हैं, “वन धन केंद्रों का प्रभाव अज्ञात है, होगा भी तो बहुत ही मामूली। ये केंद्र पैसे की कमी की मार झेल रहे हैं।

इस संबंध में हमने वन धन योजना का कार्यान्वयन करने वाली नोडल एजेंसी ट्राइफेड के क्षेत्रीय कार्यालय और झारखंड राज्य आजीविका संवर्धन सोसायटी (राज्य सरकार की एक शाखा) से बात करने की कोशिश की, लेकिन साक्षात्कार के अनुरोधों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली।

मोन्निपल्‍ली कहते हैं, “कई राहत योजनाओं के बावजूद उत्पादों की व्यवस्थित मार्केटिंग अब भी टेढ़ी खीर बनी हुई है। इनमें से जो बड़े पैमाने पर उपलब्ध हैं उन उत्पादों को बढ़ावा देने में सरकार की कोई खास दिलचस्‍पी नहीं दिखती है।”

वन उपज इकट्ठा करने वालों की मदद करने के उद्देश्य से बनी अधिकांश योजनाएं और कानून वास्‍तव में इसलिए कारगर नहीं होते क्‍योंकि उनका कार्यान्वयन सही ढंग से नहीं किया जाता। ऐसे ही कानूनों में एक है वन अधिकार कानून।

कर भला, हो बुरा

पलामू के वन अधिकारी प्रजेश जेना कहते हैं कि आदिवासी और वन आश्रित समुदायों को जलवायु परिवर्तन और घटते वन उपज के प्रभाव से बचाने के लिए सबसे महत्वपूर्ण कानून वन अधिकार अधिनियम, 2006 है क्योंकि यह वन भूमि पर उनके अधिकारों को मान्यता देता है। इस कानून का कार्यान्वयन हालांकि काफी निराशाजनक है।

बेंगलुरू स्थित अलाभकारी संस्था अशोका ट्रस्ट फॉर रिसर्च इन इकोलॉजी एंड द एनवायरनमेंट की मानें तो झारखंड के 12,516 गांव कुल 21,175 वर्ग किलोमीटर जमीन पर कम्युनिटी फारेस्ट रिसोर्स का दावा कर सकते हैं। सामुदायिक वन संसाधन का मतलब है स्थायी उपयोग के लिए पारंपरिक रूप से संरक्षित सामान्य वन भूमि। इस दावे में हालांकि कुछ अड़चनें हैं।

मोन्निपल्ली कहते हैं, “अव्‍वल तो, जो लोग पीढ़ियों से जंगल की भूमि पर रह रहे और उसका उपयोग कर रहे हैं उन्‍हें अधिकार ही नहीं मिल सके हैं। अधिकार दे भी दिए जाते हैं, तो लोगों को वन उपज पर उपयोग का अधिकार नहीं मिलता, या फिर आर्थिक रूप से लाभकारी वस्तुओं को सूचीबद्ध नहीं किया जाता है।

अगर लोगों का अपनी जमीन पर अधिकार ही नहीं है, तो वे जलवायु परिवर्तन को संबोधित कैसे करेंगे?” यह सवाल उठाते हुए ओडिशा के एक स्वतंत्र शोधकर्ता तुषार दास कहते हैं,  “[जलवायु परिवर्तन पर प्रतिक्रिया देने के लिए] जो नीतियां और योजनाएं हैं, सब के सब स्‍वामित्‍व अधिकारों से ही पैदा होती हैं।

वन अधिकार अधिनियम गैर-लकड़ी वन उपज पर स्वामित्व अधिकार देता है, जिसमें ऐसे उत्पादों तक पहुंच, संग्रह, उपयोग, मूल्‍य संवर्द्धन और प्रसंस्‍करण शामिल है। इसके अलावा, ग्राम सभाओं-ग्राम परिषदों के पास ऐसी उपज बेचने और उन्हें बिक्री के लिए जंगल से बाहर ले जाने के लिए एक आवागमन परमिट जारी करने का अधिकार है।

दास कहते हैं, “वास्तविक कार्यान्वयन में, गैर-लकड़ी वन उपज से जुड़े अधिकारों को पूरी तरह से मान्यता ही नहीं दी गई है। लोगों को मिलने वाले वन पट्टे या स्‍वामित्‍व में केवल कुछ ही उत्पादों का उल्लेख होता है जबकि बांस और तेंदू पत्‍ता जैसे अहम उत्पादों को छोड़ दिया जाता है।” वे बताते हैं कि जहां कहीं लोगों को ये अधिकार प्राप्त हैं भी, वहां राज्य अपना एकाधिकार कायम रखते हुए वन उपज तक लोगों की पहुंच को सीमित कर देता है।

टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज द्वारा झारखंड में किया गया एक अध्ययन भी अधिनियम के कार्यान्वयन के साथ कई अन्‍य मुद्दों को उठाता है:

“दावेदारों को लिखित स्पष्टीकरण दिए बगैर हजारों से अधिक दावों को मनमाने ढंग से खारिज कर दिया जाना”, “दावों पर कार्रवाई के लिए किसी खास साक्ष्य को जमा करने पर जोर देना”, “लंबित दावों के बीच वन भूमि का दूसरे उद्देश्‍यों के लिए डायवर्जन या वन भूमि का अन्‍यथा उपयोग”, और ‘’दावे व मान्यता प्राप्त क्षेत्र में अंतर’’।

इस संबंध में राज्य के वन, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव एल खियांग्ते के साथ बातचीत की कोशिश की गई लेकिन अनुरोध का कोई जवाब नहीं मिला।

एक और चिंता राज्य में पौधारोपण की पहल है, जो फायदे से ज्यादा नुकसान पहुंचाती दिख रही है। राज्य सरकार ने बिरसा हरित ग्राम योजना के तहत पौधारोपण अभियान शुरू किया है। ऐसे अभियान सवालों के घेरे में हैं लेकिन राज्‍य सरकार इसे जलवायु परिवर्तन के समाधान के रूप में प्रचारित कर रही है।

झारखंड के विभिन्न जिलों में काम कर चुके मोन्निपल्ली कहते हैं कि “इन क्षेत्रों में पौधारोपण विनाशकारी रहा है। प्राकृतिक वनस्पति को साफ कर के पौधारोपण किया जाता है। अंत में अधिकांश पौधे बचते नहीं हैं।

दास उनसे सहमति जताते हैं, “फल-फूल, पर्यावास और उत्‍पाद-संपन्‍न वन परिदृश्‍य से हम लोग अब एकरंगे रोपण परिदृश्‍य की ओर बढ़ रहे हैं“, जो जंगलों और उसमें रहने वालों के बीच के रिश्‍ते को ही बुनियादी रूप से बदल रहा है।

बदलते हुए रिश्‍तों और परिदृश्‍य के बीच झारखंड के मूलनिवासी फिलहाल तो सूखे के मंडराते खतरे से राहत की बाट जोह रहे हैं। अफसोस की बात यह है कि उन्हें किसी का भी सहारा नहीं दिख रहा।



बिरजिया समुदाय के दाड़ीछापर गांव में रहने वाले निर्मल तेलरा कहते हैं, “अगर यहां सूखा राहत योजना की घोषणा की गई होती, तो हम लोग इसके लिए आवेदन किए होते। इस साल तो घोषणा ही नहीं हुई है।” बिरजिया “विशेष रूप से अरक्षित आदिवासी समूह” की श्रेणी में आता है। इस गांव में रहने वाले कुल 35 परिवार इसी जनजाति से आते हैं।

सूखा राहत की घोषणा हो भी जाती तो खास फर्क नहीं पड़ता। सबसे दयनीय बात यह है कि योजना की घोषणा होने के बाद भी किसानों को राहत मिलने में बहुत दिक्‍कत उठानी पड़ती है।

पिछले साल राज्य सरकार ने सूखा प्रभावित हर किसान को 3500 रुपये का मुआवजा देने का वादा किया था। निर्मल बताते हैं, “दुनिया भर का कागजी कार्रवाई- ऑनलाइन और ऑफलाइन- सब कुछ कर देने के बावजूद हमें एक कौड़ी नहीं मिला। ये सब कागजात जमा करना इतना आसान नहीं होता है। पहले तो खचड़ा बस में या शेयर टैम्‍पू से वहां जाने में साठ सत्‍तर रुपया खर्चा करना पड़ता है, फिर सरकारी दफ्तर में भी पैसा लगता है।

उन्होंने बताया कि उनके गांव से पंद्रह-बीस परिवारों ने सूखा राहत के लिए अर्जी दी थी। किसी को कुछ नहीं मिला।

अब यहां जीना मुश्किल हो गया है। निर्मल बताते हैं कि बहुत से लोग बेहतर कमाई के लिए केरल, तेलंगाना, कर्नाटक और दूसरे राज्यों की ओर निकल लिए हैं, “उनको हम लोग रोक भी तो नहीं सकते। कैसे कहें कि गांव छोड़कर न जाओ? गांव में कोई काम ही नहीं है।

जो पीछे बच गए हैं, उनके लिए बेशक उड़द, बोदी, मड़ुआ जैसा मोटा अनाज जीने का सहारा है। इन सब का स्‍वाद जबरदस्‍त है, लेकिन महुआ एक ऐसी खलिश है जो सुखमनी के गाये गीत में उभर ही आती है, ‘’महुआ जिंदगी है, महुआ के बिना कुछ नहीं है।‘’


पुलिट्ज़र सेंटर के सहयोग से लिखी गई यह कहानी The Morning Context की सहमति से यहां साभार प्रकाशित है। अनुवाद अंकुर जायसवाल ने किया है।


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