Crony Capitalism

Collective rites of 13 tribals killed in Kalinganagar in January 2006

कलिंगनगर हत्याकांड: बीस साल बाद भी जिंदा संघर्षों में धधक रही हैं 13 आदिवासियों की चिताएं

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जो लोग यूं ही मर जाते हैं, जिंदा लोग उनको स्‍मृतियों में संजोते हैं। जो लोग लड़ते हुए मारे जाते हैं उन्‍हें संजोना नहीं पड़ता। उलटे, वे भविष्‍य के संघर्षों को जिंदा रखने का काम करते हैं। ओडिशा का कलिंगनगर इसका गवाह है जहां के आदिवासी बीस साल पहले पुलिस के हाथों शहीद हुए अपने पुरखों की लड़ाई को सब कुछ गंवाकर आज भी कायम रखे हुए हैं। उनके पैर के नीचे से जमीन जा चुकी है और सिर से आकाश, लेकिन जिंदगी की उम्‍मीदें हर रोज धरनों, सभाओं और कंपनी राज के दमन में हरी हैं। लंबे समय से ओडिशा के जनसंघर्षों को दर्ज कर रहीं रंजना पाढ़ी की कलिंगनगर नरसंहार की बीसवीं बरसी पर लंबी कहानी

Green Capitalism, Painting by Kartik Tripathi

धरती को बचाने के नाम पर सियासत और पूंजी का हरा-भरा गठजोड़

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पूंजीवाद के इस दौर में सार्वजनिक समस्‍याओं के समाधानों की विडम्‍बना यह है कि जिसने बीमारी पैदा की है दवा भी वही दे रहा है। वह बीमारी से भी पैसा कमा रहा है और दवा से भी। पूंजीवाद के फैलाये प्रदूषण से नष्‍ट हो रही धरती के लिए पूंजीपतियों द्वारा पैदा किया गया हरित पूंजीवाद का नुस्‍खा ऐसा ही टोटका है, जो जलवायु परिवर्तन के अपराधबोध से नागरिकों को भर के उन्‍हीं की जेब लूटता है। सरल शब्‍दों में आलोक राजपूत का विश्‍लेषण