Inequality

Salute to America event in Washington, D.C., 5 July, 2026

ढाई सदी की अमेरिकी आजादी हम सबके लिए एक अफसोस और खतरा क्यों है

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आज से पचास साल पहले अमेरिकी आजादी की दो सदी पूरी होने का वक्‍त ऐसा था जब अमेरिकी समाज में आलोचना के आंतरिक स्‍वर विरोधाभासों को संतुलित करते दिखते थे। उस वक्‍त किताबों, फिल्‍मों और लोकप्रिय संस्‍कृति के उत्‍पादों में लोगों की आत्‍मा का शुद्धिकरण करने की फिर भी एक ताकत शेष थी। आज उसकी कल्‍पना ही संभव नहीं है। आखिर अमेरिकी समाज अपने ढाई सौवें साल में यहां तक कैसे पहुंचा? इसके हमारे लिए क्‍या निहितार्थ हैं? प्रोजेक्‍ट सिंडिकेट के सौजन्‍य से यानिस वारूफाकिस की टिप्‍पणी

Prof. Arun Kumar

पूंजी के राज में मजदूर कैसे बेदखल और अदृश्य हो गया? अर्थशास्त्री प्रो. अरुण कुमार का व्याख्यान

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मौजूदा दुनिया में जब भी मजदूरों की बात होगी, सबसे बुनियादी अंतर्विरोध पूंजी बनाम श्रम से ही बात उठेगी। पिछले सौ साल में कैसे पूंजी की बढ़ती हुई ताकत ने श्रमिकों को संगठित होने से रोका, कमजोर किया, कभी उनके संगठित होने का फायदा उठाया तो कभी उन्‍हें बिखेर दिया, यह न सिर्फ पूंजीवाद बल्कि मजदूर आंदोलन का भी इतिहास है। इसी इतिहास की रोशनी में और भारत के असंगठित मजदूरों के खास संदर्भ में आज की दुनिया और भविष्‍य के खतरों पर अर्थशास्‍त्री प्रो. अरुण कुमार ने दिल्‍ली में 5 जून 2026 को एक लंबा व्‍याख्‍यान दिया। व्‍याख्‍यान जेएनयू में उनके सहपाठी रहे शिक्षाविद अनिल चौधरी की स्‍मृति में था। उस व्‍याख्‍यान का लिप्‍यंतरित, संक्षिप्‍त और संपादित रूप

Women fetching water in Barmer, Rajasthan

पानी केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, अब वह न्याय का प्रश्न बन चुका है! पी. साईनाथ का व्याख्यान

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गुरुत्‍वाकर्षण के हिसाब से पानी ऊपर से नीचे की ओर बहता है, लेकिन हजारों साल से जाति, वर्ग और लैंगिक भेदों के मारे भारतीय समाज में यह नियम उलट जाता है। यहां पानी नीचे से ऊपर प्रवाहित होता है। यानी, निचले तबके पानी के लिए श्रम करते हैं और ऊंचे तबके उनका पानी हड़प लेते हैं। यह उलटा प्रवाह जब पानी के निजीकरण के साथ मिलता है तो भयावह असमानता का बायस बन जाता है। फिर पानी महज कुदरती संसाधन नहीं, न्‍याय का सवाल बन जाता है। वरिष्‍ठ पत्रकार पी. साईनाथ का व्‍याख्‍यान ‘पानी का रंग: खत्‍म होता एक प्राकृतिक संसाधन और बढ़ती असमानता’

Pope Francis

अर्थशास्त्र की रोगग्रस्त आत्मा के ‘पापमोचन’ का आह्वान करने वाला एक धर्माचार्य

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कैथोलिक चर्च के सबसे बड़े धमार्चार्य पोप फ्रांसिस का बीते 21 अप्रैल को निधन हो गया। उनके 12 साल लंबे कार्यकाल का एक कम उजागर पक्ष उनके बदलावकारी आर्थिक विचारों में जाहिर होता है, जहां वे मौजूदा दुनिया को चलाने वाले आर्थिक विचार को गरीबों का हत्‍यारा करार देते हैं और अर्थशास्त्रियों से लोकमंगल के लिए काम करने का आह्वान करते हैं। पर्यावरण संकट से लेकर सामाजिक असमानता तक सबकी जड़ अर्थशास्‍त्र में देखने वाले फ्रांसिस की आर्थिक आलोचना पर अंतरा हालदर की टिप्‍पणी

भारत में धनकुबेरों का फैलता राज और बढ़ती गैर-बराबरी: पिछले दस साल का हिसाब

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प्रतिष्ठित अर्थशास्‍त्री थॉमस पिकेटी ने भारत में गैर-बराबरी और अरबपतियों के फैलते राज पर एक रिपोर्ट जारी की है। वर्ल्‍ड इनीक्वालिटी लैब से जारी इस रिपोर्ट को पिकेटी के साथ नितिन कुमार भारती, लुकास चैन्सल और अनमोल सोमंची ने मिलकर लिखा है। पिछले दस वर्षों के दौरान किस तरह भारत धनकुबेरों के तंत्र में तब्‍दील होता गया है और यहां का मध्‍यवर्ग लगभग लापता होने के कगार पर आ चुका है, उसकी एक संक्षिप्‍त तथ्‍यात्‍मक तस्‍वीर फॉलो-अप स्‍टोरीज अपने पाठकों के लिए चुन कर प्रस्‍तुत कर रहा है