लोकप्रियता के दौर में जल, जंगल और जमीन के संघर्ष : संदर्भ केन-बेतवा आंदोलन
byदेश में आजकल आंदोलन का माहौल है- जमीन पर कम (या कम-चर्चित) और इंटरनेट पर ज्यादा। ऐतिहासिक अन्यायों और हकमारी के खिलाफ देश भर में दशकों से लगातार चल रहे सत्ता-विरोधी जमीनी जन आंदोलनों की जगह एक बार फिर आभासी तिकड़मों से छेकने की कोशिश की जा रही है, जैसा 2011 में हुआ था। इस बार भी तमाम आंदोलनकारी भ्रमित हो रहे हैं। ‘जेन-ज़ी’ की पीठ पर जारी इस हो-हल्ले में लगातार बारह दिन तक सत्याग्रह करने वाले केन-बेतवा परियोजना-विरोधी आदिवासी औरतों और बुजुर्गों की आवाज कहीं दब गई है। हालिया केन-बेतवा नदीजोड़ विरोधी आंदोलन को सतीश भारतीय ने विस्तार से कवर किया है। उनके मध्य प्रदेश से भेजे डिस्पैच, बातचीत और अतीत के प्रसंगों के सहारे इस पर्यावरण दिवस पर जल, जंगल, जमीन बचाने वाले जन आंदोलनों की गति और नियति पर यह लंबी कहानी