Migrant Workers

A saffron clad man crossing College Street in Kolkata

पश्चिम बंगाल : जीत-हार से परे, राजनीति की ऑप्टिक्स को कैसे बदल रहा है प्रवासी ‘हिन्दुस्तानी’ वोटर

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पश्चिम बंगाल में 29 अप्रैल को दूसरे और आखिरी चरण का मतदान होना है। वोटिंग कलकत्ते में भी है, जो उत्तर-भारतीय प्रवासियों का सबसे बड़ा केंद्र है। इसी वोटबैंक के दम पर भारतीय जनता पार्टी पश्चिम बंगाल की सत्ता में आने का दावा कर रही है। चुनाव के सबसे बड़े सवाल हार-जीत से इतर, असल कहानी यह है कि हिंदी बोलने वाले उत्तर भारत के प्रवासी बंगाल की राजनीति को देखने-समझने के तरीकों को कैसे बुनियादी ढंग से बदल रहे हैं। अमन गुप्‍ता पिछले साल भर से बंगाल जाकर वहां की बदलती हुई जमीन का जायजा लेते रहे हैं। अब भी वे कोलकाता में ही हैं। बंगाल में राजनीतिक धारणा-निर्माण और प्रवासियों के बीच रिश्‍ते पर अमन गुप्‍ता के अनुभवों का निचोड़ बताती उनकी ही कहानी

Rajendra Shinde of Jalgaon district of Maharashtra and his wife Sonali, are landless labourers. With their kids and other families, they had come to Delhi due to the drought back home, Courtesy PARI

पलायन का मौसम फिर आ गया, खेतिहर मजदूरों का सवाल किसान आंदोलन में कब आएगा?

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जनवरी खत्‍म होते ही उत्‍तरी महाराष्‍ट्र के गांवों के बस स्‍टैंड दोबारा गुलजार होने लगते हैं। एक ओर दिल्‍ली की सरहद पर किसान एमएसपी की मांग के लिए आमरण अनशन कर रहे हैं तो दूसरी ओर खेतिहर मजदूर अगले पांच महीनों की बेरोजगारी, पलायन और दिहाड़ी के लिए कमर कस रहे हैं। कृषि संकट के समाधानों में एमएसपी केवल एक मसला है, लेकिन सारा आंदोलन इसी के इर्द-गिर्द क्‍यों? जनवरी से जून तक खाली रहने वाले खेतिहर मजदूरों को राजनीति और किसान आंदोलन के विमर्श में कब लाया जाएगा? जलगांव से लौटकर हरेराम मिश्र की रिपोर्ट