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Nobel Peace Prize laureate Navi Pillay visits International Criminal Court, 12 October 2026

Nobel Peace Prize: निरंकुशता के दौर में लगातार सच कहते जाने की सहजता के नाम

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नोबेल पुरस्कारों की अपनी कुछ सीमाएं हैं। उसका इतिहास विवादों से मुक्त नहीं है। पिछले साल हुई शांति पुरस्‍कार की किरकिरी उदाहरण है। वैसे भी, पुरस्कार देना दुनिया में शांति नहीं ला देता, लेकिन कभी-कभार कोई पुरस्कार व्यक्ति से अधिक उस सिद्धांत के सम्‍मान में होता है जिसका वह व्यक्ति महज प्रतिनिधि बन जाता है। इस बार की नोबेल शांति पुरस्‍कार विजेता दक्षिण अफ्रीकी न्‍यायविद् नवि पिल्‍लै के मामले में यह बात सच है। जब पूरी दुनिया में निरंकुश सत्ताएं कानून के राज को खारिज करती जा रही हों, पिल्‍लै को मिला सम्‍मान नूरेम्‍बर्ग से इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट तक चली आई द्वितीय विश्‍वयुद्धोत्तर विरासत को बचाने का महत्त्व रेखांकित करता है, जिसके मूल में कानून की सार्वभौमिकता और मनुष्‍य की गरिमा का सिद्धांत है। शैलेंद्र चौहान की टिप्‍पणी

अच्छा और बुरा अर्थशास्त्र

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सत्तर के दशक के उत्तरार्ध में जब अभिजीत एक अर्थशास्त्री बनने की दिशा में कदम बढ़ा रहे थे उस वक्त सोवियत रूस के प्रति थोड़ा सम्मान बचा हुआ था जबकि भारत उसके जैसा बनने की पूरी कोशिश कर रहा था। वामपंथी अतिवादी चीन को मानते थे, चीनी लोग माओ की पूजा करते थे, रीगन और थैचर ने आधुनिक कल्याणकारी राज्य पर अपने हमले अभी शुरू ही किए थे और दुनिया के करीब 40 फ़ीसदी आबादी भयंकर गरीबी में जी रही थी। तब से लेकर अब तक कितना कुछ बदल चुका है और शायद इसमें काफी कुछ बेहतरी के लिए है।