Poverty

Prof. Arun Kumar

पूंजी के राज में मजदूर कैसे बेदखल और अदृश्य हो गया? अर्थशास्त्री प्रो. अरुण कुमार का व्याख्यान

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मौजूदा दुनिया में जब भी मजदूरों की बात होगी, सबसे बुनियादी अंतर्विरोध पूंजी बनाम श्रम से ही बात उठेगी। पिछले सौ साल में कैसे पूंजी की बढ़ती हुई ताकत ने श्रमिकों को संगठित होने से रोका, कमजोर किया, कभी उनके संगठित होने का फायदा उठाया तो कभी उन्‍हें बिखेर दिया, यह न सिर्फ पूंजीवाद बल्कि मजदूर आंदोलन का भी इतिहास है। इसी इतिहास की रोशनी में और भारत के असंगठित मजदूरों के खास संदर्भ में आज की दुनिया और भविष्‍य के खतरों पर अर्थशास्‍त्री प्रो. अरुण कुमार ने दिल्‍ली में 5 जून 2026 को एक लंबा व्‍याख्‍यान दिया। व्‍याख्‍यान जेएनयू में उनके सहपाठी रहे शिक्षाविद अनिल चौधरी की स्‍मृति में था। उस व्‍याख्‍यान का लिप्‍यंतरित, संक्षिप्‍त और संपादित रूप

Kashi

पुस्तक अंश : बनारस की ‘अदृश्य औरतों’ को सुने बगैर इस शहर को क्यों नहीं समझा जा सकता?

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बनारस या काशी पर अतीत से लेकर अब तक जितनी किताबें लिखी गई हैं, भारत में उसका कोई जोड़ नहीं है। तकरीबन हर मशहूर किताब काशी की शाश्‍वत और पवित्र छवि को ही उभारती है। काल प्रवाह में जम चुकी बनारस की इस छवि पर आलोचनात्‍मक शब्‍द कम लिखे गए हैं। फ्रंटपेज प्रकाशन से शीघ्र प्रकाशित होने वाली लेनिन रघुवंशी, चंद्र मिश्रा और श्रुति नागवंशी द्वारा सह-लिखित ‘काशी’ इस मायने में पुरानी लीक को न सिर्फ तोड़ती है, बल्कि बन और बिगड़ रहे बनारस पर एक बार फिर से सोचने को मजबूर करती है। कुल 12 अध्‍यायों में बंटी अंग्रेजी में लिखी यह पुस्‍तक धर्म और मिथक से लेकर सामान्‍य जीवन में छुपे प्रतिरोध के दर्शन, जाति-वर्ग-लिंग से लेकर बाजार तक बंटवारे की राजनीति और उम्‍मीद के संभावित तत्त्वों पर एक जटिल सूत्रीकरण है। प्रकाशक और लेखकों की अनुमति से पुस्‍तक के सातवें अध्‍याय से चुने हुए कुछ अनूदित अंश

Poverty in India

गरीबी खत्म होने के झूठे दावे और हजार करोड़ का एक जश्‍न

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आम चुनाव से ठीक पहले सरकार द्वारा जारी किए गए उपभोग-व्‍यय के आंशिक आंकड़ों के आधार पर सुरजीत भल्‍ला करन भसीन ने जल्‍दबाजी में ब्रूकिंग्‍स इंस्टिट्यूशन की ओर से भारत में अत्‍यधिक गरीबी खत्‍म होने की मुनादी कर दी। नोटबंदी, जीएसटी और अंत में महामारी की मारी अधिकांश आबादी के बीच जहां एक शख्‍स अपने बेटे की प्री-वेडिंग पर हजार करोड़ खर्च करता है, वहां ये सरकारी आंकड़े दुर्गंध फैलाने से ज्‍यादा किसी काम के नहीं। अर्थशास्‍त्री अशोक मोदी की टिप्‍पणी

अच्छा और बुरा अर्थशास्त्र

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सत्तर के दशक के उत्तरार्ध में जब अभिजीत एक अर्थशास्त्री बनने की दिशा में कदम बढ़ा रहे थे उस वक्त सोवियत रूस के प्रति थोड़ा सम्मान बचा हुआ था जबकि भारत उसके जैसा बनने की पूरी कोशिश कर रहा था। वामपंथी अतिवादी चीन को मानते थे, चीनी लोग माओ की पूजा करते थे, रीगन और थैचर ने आधुनिक कल्याणकारी राज्य पर अपने हमले अभी शुरू ही किए थे और दुनिया के करीब 40 फ़ीसदी आबादी भयंकर गरीबी में जी रही थी। तब से लेकर अब तक कितना कुछ बदल चुका है और शायद इसमें काफी कुछ बेहतरी के लिए है।