Emperor's mask has fallen, representative image made by AI

मुखौटा गिर चुका है: शासक की निजी डिजिटल जागीर बनते जा रहे देश और नागरिक के सवाल पर

दुनिया की राजनीति और आर्थिकी आपस में मिलकर कैसे आधुनिक राज्‍य के चरित्र को बदल रही है; सम्‍प्रभु लोकतांत्रिक राष्‍ट्रों के भीतर चुनी हुई सरकार और नागरिक के बीच का रिश्‍ता कैसे विकृत हो रहा है; और अपनी अंतर्वस्‍तु व स्‍वरूप में हर लोकशाही कैसे राजशाही की ओर बढ़ रही है; इन विषयों पर दुनिया भर में कोरोना के बाद से बहुत चर्चा हुई है। भारत अपवाद है। यहां राज्‍य-सम्‍बंधी विमर्श नदारद दिखता है जबकि पांचसाला चुनाव ही विमर्शों के केंद्र में रहता है। फॉलो-अप स्‍टोरीज़ के संरक्षक रहे दिवंगत शिक्षाविद् अनिल चौधरी राज्‍य, सरकार, कानून और समाज की जटिल गुत्‍थी पर लगातार बोलते थे। उनके 76वें जन्‍मदिवस पर दिल्‍ली में आयोजित सम्मिलन इसी विषय पर परिचर्चा का बायस बना। सम्मिलन में प्रस्‍तुत अरुण सिंह का लिखा यह आधारपत्र बदलती हुई दुनिया पर कुछ रोशनी डालता है

Rally against changes in MNREGA in Sitapur, UP

‘MNREGA में बदलाव बहाना है, मकसद गुलाम बनाना है’! क्यों? कैसे? एक सरल तुलनात्मक विश्लेषण

संसद में 18 दिसंबर को पारित और तीन दिन के भीतर ही राष्‍ट्रपति द्वारा स्‍वीकृत वीबी-जीरामजी नाम का नया विधेयक मनरेगा के ताबूत में केंद्र सरकार की आखिरी कील साबित होने जा रहा है। पिछले ग्‍यारह साल से ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून को कमजोर करने में लगी सरकार ने अब उसे मांग-आधारित अधिकार से एनजीओछाप आपूर्ति-आधारित मिशन में तब्‍दील कर के उसकी आत्‍मा को खोखला कर दिया है। नतीजतन, देश भर में ग्रामीण मजदूर और खेतिहर आंदोलन पर हैं। मनरेगा और वीबी-जीरामजी का सरल शब्‍दों में अरुण सिंह ने तुलनात्‍मक विश्‍लेषण किया है, जो हर कार्यकर्ता और पत्रकार के लिए एक जरूरी पाठ है

उत्तराखंड की सुरंग से लीबिया की डूबी नाव तक मरते मजदूर सरकारों के लिए मायने क्यों नहीं रखते!

देश भर में सीवर में घुट कर मरते सफाईकर्मी हों, मेडिटेरेनियन सागर में नाव डूबने से मरते प्रवासी श्रमिक हों या फिर उत्‍तराखंड की चारधाम परियोजना के चलते सुरंग में दो हफ्ते से फंसे 41 मजदूर, ये सभी घटनाएं एक ही बात की ओर इशारा करती हैं कि सरकारों और कारोबारियों के मुनाफे की राह में कामगारों की जान का कोई अर्थ नहीं है। मजदूर किसी की प्राथमिकता में कहीं नहीं हैं। मजदूरों की सुरक्षा की उपेक्षा पर अरुण सिंह

नोटबंदी 2.0 : काला धन वापस आएगा, लेकिन सफेद हो कर!

बैंकों की हालत फिर खस्ता हो चुकी है। इसको बचाने के लिए सरकार द्वारा बैंकों का आपसी विलय करना भी काम नहीं आया क्योंकि उद्योगपतियों ने नोटबंदी के बाद लिए गए कर्ज की वापसी की ही नहीं, जो कि उनकी फितरत है

आर्थिक बदलाव कैसे धार्मिक-जातीय दंगे में बदल जाते हैं?

ऊपरी तौर से देखने पर भले लगे कि समाज में होने वाली हिंसा, टकरावों, संघर्षों, आंदोलनों और दंगों के पीछे राजनीतिक पार्टियों की सत्तालोलुपता और धार्मिक कट्टरपंथियों की महत्वाकांक्षा की भूमिका है, लेकिन मामला कुछ और ही होता है। डेढ़ सौ साल का आधुनिक इतिहास इसकी गवाही देता है। हिंसा और दंगे के आर्थिक इतिहास को खंगाल रहे हैं अरुण सिंह