हम लोग आज अनिल चौधरी को याद करने साथ आए हैं। आज वे 75 साल के पूरे हो गए। पिछले साल 14 अप्रैल को वे हमारे बीच से चले गए थे। उनकी पहली बरसी पर हम सब ने उन्हें अपने-अपने दिल में याद किया, लेकिन वादा था कि उनके जन्मदिन पर हम हर साल साथ जुटेंगे। साथ जुटेंगे तो बातें करेंगे इस दुनिया की, देश की, निज़ाम की और उन चिंताओं की जिन्हें वे जाहिर करते रहते थे। अनिलजी हमारे बीच नहीं हैं, उनकी अनुपस्थिति और यह मौका हमारे लिए यह जांचने का बहुत बड़ा इम्तिहान है कि हम उनकी दी हुई वैचारिक लीक पर सोच पा रहे हैं या नहीं। उसके अनुरूप कुछ कर पा रहे हैं या नहीं।
पिछले साल 5 जून को हमने उन्हें याद करने के लिए जो थीम रखा था उसे याद करिए- वो कौन है जो निज़ाम-ए-हस्ती चला रहा है! यह पंक्ति उस नज़्म की है जिसे अनिलजी अंतिम दम तक सुनते और सुनाते रहे थे। दरअसल, इस दुनिया और इसे चलाने वाले निज़ाम के चाल-चलन पर उनकी निगाह बहुत पैनी थी। अपने अंतिम दिनों में इस बारे में उन्होंने जो छिटपुट नोट्स लिखे थे, उन्हीं को संयोजित-संकलित कर के हमने पिछले सम्मिलन का आधारपत्र तैयार किया था। वह आधारपत्र औद्योगिक पूंजीवाद और उसके नए चोले नवउदारवाद की चार दशक की नाकामी के बाद 2021 में उभरी नई दुनिया का विश्लेषण करता था। उस आधारपत्र में हम लोग जहां रुके थे, उस अंश को एक बार याद करना जरूरी है ताकि आगे की समझदारी पर अतीत की कुछ रोशनी पड़ सके।
पिछले साल हुए सम्मिलन के आधारपत्र का निष्कर्ष यह था:
पिछले पचास साल में यहां तक जो प्रक्रिया चली है, वह नवउदारवाद के प्लेग से जूझ रही वैश्विक पूंजीवादी व्यवस्था की जरूरत को पूरा करने के लिए थी। उसका सीधा संकेत यह है कि दुनिया भर में अब उत्पीड़क और निरंकुश राजकाज का एक ऐसा मॉडल उभर चुका है जहां देशों की जनता को नियंत्रित रखने का ठेका उन सनकी और बाहरी ताकतों को सौंप दिया गया है जिनके नियंत्रण में देशों की सीमाएं हैं। इन ताकतों को अब सीधे और पूरी तरह कुछेक विशाल कॉरपोरेशन और वित्त प्रबंधन कंपनियां चलाएंगी। वैश्विक पूंजी और स्थानीय समुदायों का अंतर्विरोध इसीलिए अब पहले से कहीं ज्यादा तीव्र हो गया है।
वैश्विक बनाम स्थानीय के इसी अंतर्विरोध के इर्द-गिर्द हम लोगों ने व्यवस्थागत विकल्प और वैकल्पिक शिक्षण पद्धतियों पर दो सत्रों में बात की थी। यह अंतर्विरोध अब भी बराबर कायम है और विकल्प का सवाल अब भी उतना ही जिंदा है, लेकिन बीते एक साल में दुनिया को चलाने वाली व्यवस्था की सूरत बुनियादी रूप से बदल चुकी है। जिस बदली हुई सूरत में आज हम साथ बैठे हैं, उसे समझना सबसे पहली जरूरत है। हमारा विश्वास है कि अनिलजी यहां होते तो वे भी विकल्प पर बात करने से पहले अतीत की निरंतरता में वर्तमान की ठोस परिस्थितियों का ठोस आकलन करने पर जोर देते।
2025: जब दुनिया बुनियादी रूप से बदल गई
याद करिए, पिछले साल 20 जनवरी को जब अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में डोनाल्ड ट्रम्प का दूसरा कार्यकाल शुरू हुआ, तो उन्होंने दूसरे विश्व युद्ध के बाद से ही इस दुनिया को चला रही अंतरराष्ट्रीय नियम-कानूनों की व्यवस्था को तोड़ने-मरोड़ने की शुरुआत की। उन्होंने ऐसे एकतरफा फैसले लिए और काम किए जिनकी दिशा नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की जगह लेनदेन आधारित पावर पॉलिटिक्स को स्थापित करना थी।
करीब एक सदी से जो उदार अंतरराष्ट्रीय तंत्र मौजूद था, उसे उन्होंने पिछले साल अप्रैल में शुरू किए वैश्विक व्यापार-शुल्क युद्ध से छिन्न-भिन्न कर डाला। उसके बाद अमेरिका पेरिस जलवायु समझौते से बाहर निकल गया, उसने बाइडेन के कार्यकाल में शुरू की गई 30 से ज्यादा जलवायु नीतियों को पलट दिया तथा विश्व स्वास्थ्य संगठन और महामारी संधि से भी बाहर आ गया। इस सब का मतलब क्या है, इसे समझने के लिए फिर से पिछले साल वाला परचा याद करें।
उस परचे में हमने बताया था कि 2021 की शुरुआत विश्व आर्थिक फोरम (डब्लूईएफ) के सम्मेलन से हुई, जिसका विषय था ‘’द ग्रेट रीसेट’’। उसमें फोरम के कार्यकारी अध्यक्ष ने गर्व से घोषणा की थी कि ‘’अब ग्रेट रीसेट का वक्त आ चुका है’’। इस पर बहुत तेजी से अमल करते हुए विश्व व्यापार संगठन डब्लूटीओ ने महामारी बचाव, तैयारी और प्रतिक्रिया संधि का मसौदा सामने रख दिया। यह मसौदा संधि ऐसी थी जो किसी महामारी के दौरान देशों की सरकारों की सम्प्रभुता की खुलेआम उपेक्षा करती है और अपनी मर्जी से महामारी घोषित करने के अधिकार विश्व स्वास्थ्य संगठन डब्लूएचओ को देती है। इसी के साथ अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य नियामकों में जो संशोधन किए गए, वे इस बात का सुबूत दे रहे थे कि कोविड के नाम पर दुनिया भर के ताकतवर लोग दरअसल पूरी दुनिया में निरंकुश और तानाशाही राजकाज का ऐसा ढांचा कायम करने की योजना बना रहे थे जिसमें राष्ट्रों की सम्प्रभुता मारी जानी थी।
अब, पिछले साल चूंकि अमेरिका खुद ही डब्लूएचओ और महामारी संधि से बाहर निकल गया, तो स्वाभाविक है कि कहानी के प्लॉट को बदलना ही था। कहानी कैसे बदली? इस पर आने से पहले देखें कि सौ साल से जारी इस दुनिया की कहानी में कहां-कहां बदलाव हुए।
यह बदलाव हम चार मोर्चों पर पाते हैं। पहला मोर्चो व्यापार का है, जहां मुक्त व्यापार और बहुपक्षवाद से कहानी वैश्विक व्यापार-शुल्क युद्ध और पलटकर लगाए जाने वाली रेसीप्रोकल ड्यूटी पर आ गई। दूसरा मोर्चा गठबंधनों यानी अलायंस का है, जहां सामूहिक सुरक्षा की व्यवस्था से कहानी लेनदेन आधारित सशर्त सहयोग पर आ गई, जब अमेरिका ने खुद ही नाटो से बाहर निकल जाने की धमकी दे डाली। नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी संगठन (नाटो) 1949 में बना था, तब से पहली बार वह अपने वजूद का संकट झेल रहा है और ट्रम्प प्रशासन तथा नाटो के यूरोपीय सदस्यों के बीच फांक पड़ चुकी है। बदलाव का तीसरा मोर्चा राजकाज के तरीकों में दिखा। पहले बहुपक्षीय और नियम कानून आधारित राजकाज का तंत्र स्थापित था, अब वह देशों की मनमर्जी और आपसी सौदेबाजी से तय हो रहा है। चौथा और अंतिम मोर्चा टेक्नोलॉजी की भूमिका का है। पहले टेक्नोलॉजी को सक्षमता और पारदर्शिता के औजार की तरह बरतने की बात साझा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर होती थी। अब वे मंच टूट रहे हैं, तो टेक्नोलॉजी लोकतांत्रिक संस्थाओं को धता बताने और नागरिकों के ऊपर सीधा नियंत्रण करने के औजार में तब्दील हो रही है।
डिजिटल जागीरों में बदलते देश
इस बदलाव से पैदा क्या हो रहा है?
बीते एक साल के भीतर सौ साल पुरानी नियम-कानून वाली अंतराष्ट्रीय व्यवस्था का बिखरना यानी बहुपक्षीय राजनीति से सौदेबाजी वाली पावर पॉलिटिक्स की तरफ रुझान दरअसल एक ऐसे राज्य के उदय को संभव बना रहा है जो टेक्नोलॉजी के बल पर चलता हो और खुद को नागरिकों का माई-बाप समझता हो।
जब कोई ग्लोबल कानून ही नहीं रह जाएगा, तो दुनिया के अलग-अलग हिस्सों को या देशों को उनके शासक अपने बाहुबल से, अपने चेहरे की चमक पर और टेक्नोलॉजी के जोर पर चलाएंगे। ऐसे में टेक्नोलॉजी पारंपरिक संस्थाओं की कल्याणकारी भूमिका में बाधा बन जाएगी। फिर, राज्य से मिलने वाले लाभों को बुनियादी हक की जगह शासक से नागरिकों को मिलने वाली इमदाद या तोहफा बताया जाएगा। फिर घरेलू राजकाज भी सौदेबाजी और लेनदेन की तर्ज पर चलेगा- शासक जब टेक्नोलॉजी आधारित लाभ नागरिकों को देगा तो उसके बदले में उनकी वफादारी मांगेगा।
चूंकि अंतरराष्ट्रीय निगरानी और संतुलन की कोई व्यवस्था अब नहीं है, तो शासक अपनी सियासी ताकत को मजबूत करने के लिए लोगों की डिजिटल निगरानी भी करेगा, उनका डेटा जमा करेगा। यानी, पूरा का पूरा राज्य शासक की निजी संपत्ति बनकर रह जाएगा। अंतरराष्ट्रीय कानूनों के बिखरने से कमजोर होती दुनिया में देशों के शासक अपने वोटरों की वफादारी को अपने देश की स्थिरता के रूप में प्रचारित करेंगे और वोटरों की वफादारी खरीदने के लिए लाभ देने के प्रतिस्पर्धी तरीके अपनाएंगे। यानी, किसी देश की सम्प्रभुता अब वैश्विक समुदाय के प्रति उसके रवैये से तय नहीं होगी, बल्कि यह उसके शासक की मर्जी और निजी जरूरत के अधीन होगी।
यानी, देशों की सत्ताओं के सिर के ऊपर जो अंतरराष्ट्रीय नियम-कानूनों का छत्र सौ साल से तना हुआ था, जो सीलिंग थी, वह टूट चुकी है। यही बात ताकतवर शासकों को अपने देश को अपनी निजी डिजिटल जागीर में बदलने की छूट दे रही है। यह संकटग्रस्त पूंजीवाद के दौर में राज्य की वापसी है, लेकिन अबकी बीसवीं सदी वाला सामाजिक-जनतांत्रिक कल्याणकारी राज्य नहीं लौटा है, बल्कि एक नया, कहीं ज्यादा बाहुबली और तकनीक आधारित राज्य का मॉडल पैदा हुआ है जो अपने डिजिटल ढांचे और प्रत्यक्ष डिलीवरी के माध्यम से अपनी ताकत का नागरिकों को अहसास करवाता है। वह उस ताकत को थोपने में सुख भी लेता है।
याद करिए, सन 2000 के शुरुआती दशक तक भी हालत यह थी कि राज्य खुद को अदृश्य रखने की भरसक कोशिश करता था, नहीं तो ज्यादा से ज्यादा एक न्यूट्रल रेफरी या बैकग्राउंड में बैठे मैनेजर जैसा व्यवहार करता था। हम लोग खुद विश्लेषण में कहा करते थे कि राज्य केवल पूंजीपतियों का मैनेजर है। इसीलिए अकसर गैर-बराबरी और नाकामी का ठीकरा मुक्त बाजार के सिर पर फोड़ कर राज्य खुद बरी हो जाता था। 2026 में राज्य का वह मुखौटा सरक चुका है। अब उसे छुपने की जरूरत नहीं रह गई। वह बिलकुल नग्न स्थिति में हमारे ठीक सामने है- देश के भीतर संसद से लेकर सड़क और चुनाव तक, दुनिया भर में ईरान से लेकर गाज़ा, वेनेजुएला और युक्रेन तक।
तो जो सवाल पिछले साल अनिलजी आधारपत्र में पूछ रहे थे कि ‘’वो कौन है जो निज़ाम-ए-हस्ती चला रहा है’’, उसका जवाब उनके जाने के बाद पूरी दुनिया में कुछ-कुछ अपने आप ही दिखने लगा है। इसलिए, उसी नज़्म की एक और पंक्ति को हमने इस बार के सम्मिलन का थीम वाक्य बनाया है- ‘’हर आईने में वो अक्स अपना दिखा रहा है…’’।

हम भले निजाम को अभी परिभाषित न कर पाएं, लेकिन उसकी छवियां हर जगह देख पा रहे हैं। उसने खुद को ही जाहिर कर दिया है क्योंकि इसके अलावा उसके पास कोई चारा नहीं है। पूंजीवाद के लगातार संकटग्रस्त होने और होते जाने की स्थिति में राज्य लगातार अपना चोला बदलता है। सौ साल तक उसने चोले बदले, अबकी वह निर्वस्त्र हमारे सामने खड़ा है और कह रहा है- मैं चाहूं तो तुम्हें यहीं खारिज कर सकता हूं। यह वैश्विक पूंजीवाद की तीसरी करवट का परिणाम है।
पहली अवस्था औद्योगिक थी, फिर उसने नवउदारवाद का ढोंग रचा जो चालीस साल में नाकाम हो गया, तो अब वह खुलकर सामने आ गया है। अनिलजी इस स्टेज को काफी पहले पहचान चुके थे। वे कहते भी थे- ये लोग फ्री मार्केट और पूंजीवाद को ही तमीज से चला लें तो कोई दिक्कत नहीं, समस्या यह है कि ये अपना बनाया नियम कायदा भी नहीं मानते। यूरोप में कुछ जानकार इस स्थिति की तुलना तकनीक-सक्षम राज्य की सामंतवाद के दौर में वापसी से भी कर रहे हैं। इसके लिए अंग्रेजी में दो शब्द आजकल खूब चले हैं- टेक्नो-फ्यूडल स्टेट और टेक्नो-पैट्रिमोनियल स्टेट।
कुल मिलाकर लब्बोलुआब ये है कि पूंजीवाद और उसका पैदा किया आधुनिक राज्य जिस स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व और न्याय के वादे कर के आया था, उसने उन्हीं मूल्यों से मुकम्मल वादाखिलाफी कर दी है। अब हम कानूनी या संवैधानिक दावा जता पाने वाले नागरिक नहीं रह गए हैं, बस मालिक के तोहफे का इंतजार कर रहे लाभार्थीगण हैं। यह मालिक तकनीक के सहारे हमारे कहे और किए को लगातार देख रहा है और तय कर रहा है कि हम उसके इमदाद के योग्य हैं या नहीं। वह हमसे हमारी जरूरत नहीं पूछ रहा, हमें बता रहा है कि हमें कैसे जीना है, कहां काम करना है, कैसे काम करना है। उसके ऊपर बड़े मालिक यानी अमेरिका के साथ किए सौदे का भयंकर दबाव है। उसने दुनिया के मालिक से सशर्त वादा किया है कि कम टैरिफ बनाए रखने के लिए वह अपने यहां लागत को कम रखेगा और उत्पादन को बढ़ाएगा, इसीलिए उसने हमारी गरदन पकड़ रखी है। हम कारखाने में हों, बाजार में या मतदान बूथ में, उसका हाथ लगातार हमारी गरदन पर है।
यानी, पिछले सम्मिलन में हमने जो लड़ाई स्थानीय बनाम वैश्विक संसाधनों की समझी थी, वह अचानक बीते एक वर्ष में दोहरी हो गई है। अब दूसरी लड़ाई राज्य के नए अवतार में नागरिक और मतदाता बने रहने की है।
क्योंकि राजा नंगा हो चुका है…
इन दोनों लड़ाइयों के मोर्चे कहां-कहां और कैसे सजे हुए हैं, आइए इसकी झलक भी देख लें ताकि ऊपर कही बातें उदाहरण सहित साफ हो जाएं।
बीते एक वर्ष में वैश्विक स्तर पर देखें तो अमेरिका द्वारा वेनेजुएला के राष्ट्रपति का अपहरण, ईरान के साथ युद्ध, क्यूबा और ग्रीनलैंड को कब्जा करने की धमकी, और इन घटनाओं के बीच दुनिया के देशों की चुप्पी, लूट में हिस्सा बंटाने की चाल सबसे ज्यादा भयावह घटनाओं में है। इससे भी भयावह मुख्यधारा की मीडिया और सोशल मीडिया द्वारा लोगों में युद्ध उन्माद पैदा करना है। किसी देश के राष्ट्राध्यक्ष का अपहरण, उस देश की स्वायत्तता और संप्रभुता को पैरों तले रौंदना, दुनिया में इसका कोई प्रतिकार न होना, मीडिया में इसके खिलाफ जनमत तैयार करने की जगह मौन समर्थन, यह राजतंत्र की याद दिलाता है जब राजा की इच्छा ही कानून होती थी; जब ताकत और तलवार के बल पर किसी देश को गुलाम बना लिया जाता था।
अमेरिका-ईरान युद्ध में हुए जनसंहार का किसी मीडिया में कहीं जिक्र तक नहीं है। जिक्र इस बात का है कि किसने मिसाइल दागे, ड्रोन से हमला किया, कितना संसाधन नष्ट किया, कौन किस दिन जीत रहा है, कौन हार रहा है, किसने युद्धक विमान मार गिराए, किसने कितने बम बरसाए, किसका हथियार का जखीरा बढ़ रहा है, किसका घट रहा है, कौन युद्ध मैदान से भागना चाहता है, कौन डटे रहना चाहता है। यही समाचारों की सुर्खियां थीं। कितने आम जन मारे गए, कितने घायल हुए, कितने अपंग हुए, कितने बेघर हुए, कितनों ने अपनों को खोया, उनको दवा, भोजन, रहने की सुरक्षित जगह मिल रही है या वह दवा, भोजन के अभाव में मर रहे हैं, कितने लोगों ने पलायन किया, युद्ध का बच्चों और महिलाओं पर क्या असर पड़ रहा है, वह किस दशा में है, यह समाचारों से गायब है।
पूरी वैश्विक आर्थिक व्यवस्था एक ऐसे संकट में फंसी हुई है जिसका किसी के पास कोई हल नहीं है। यह लोगों को रोजगार देने और उत्पादन का विस्तार करने में पूरी तरह से असमर्थ है। उत्पादन का विस्तार नहीं होने से उसका मुनाफा घट रहा है। मुनाफा बरकरार रखने की होड़, दूसरे देशों के संसाधन पर कब्जा करने और मुनाफा कमाने की प्रतिस्पर्धा ने दुनिया को युद्ध की विभीषिका में झोंक दिया है। युद्ध के नाम पर सभी देशों में लूट अपने चरम पर है। मुनाफे की मशीन फिर से चालू हो गई है। मुनाफा कौन कमा रहा है और यह मुनाफा किस से कमाया जा रहा है? एक ओर अमेरिकी लोग बढ़ती गैस की कीमत तथा उच्च मुद्रास्फीति के खतरे से जूझ रहे हैं, दूसरी ओर रक्षा ठेकेदार और तेल कंपनियां खूब पैसे कमा रही हैं। ट्रम्प ने ईरान में युद्ध के कारण पूरे अमेरिका में गैस की कीमत पर पड़ रहे आर्थिक प्रभाव को नजरअंदाज करते हुए सोशल मीडिया पर खुलेआम लिखा कि “जब तेल की कीमत बढ़ती है तो हम बहुत पैसा कमाते हैं”। यानी, मुखौटा एकदम से गिर चुका है।
हथियार बनाने वाली अमेरिकी कंपनियां और तेल कंपनियां कितना मुनाफा कमा रही हैं इसकी कुछ जानकारियां ग्लोबल विटनेस की रिपोर्ट में हैं। ग्लोबल विटनेस की अप्रैल 2026 की रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिका-ईरान युद्ध के पहले महीने में दुनिया की शीर्ष 100 तेल कंपनियों ने हर घंटे 30 मिलियन डॉलर (लगभग 250 करोड़ रुपए) से अधिक का अतिरिक्त मुनाफा कमाया। इस संघर्ष के कारण अमेरिकी तेल कंपनियों को 60 बिलियन डॉलर (लगभग 5 लाख करोड़ रुपए) से अधिक का अतिरिक्त मुनाफा होने का अनुमान लगाया गया था। यदि तेल की कीमतें इसी तरह ऊंची दर पर बनी रहती है, तो 2026 के अंत तक तेल कंपनियों का मुनाफा 234 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है। अमेरिकी तेल कंपनी एग्जॉन मोबिल को 11 बिलियन डॉलर और शेवरान को 9.2 बिलियन डॉलर का मुनाफा होने का अनुमान है।
हथियार कंपनियां भी चांदी काट रही हैं। लॉकहीड मार्टिन, नॉर्थरॉप जर्मन, बोइंग, आरटीएक्स (Raytheon) आदि हथियार बनाने वाली कंपनियों ने युद्ध के दौरान इजराइल, कुवैत, कतर, यूएई को 8.6 बिलियन डॉलर का हथियार बेचा। आरटीएक्स ने 2026 की तिमाही में ही 22.1 बिलियन डॉलर की बिक्री की और 1.5 बिलियन डॉलर का लाभ कमाया, जो पिछले साल से 21 प्रतिशत अधिक है। लॉकहीड मार्टिन कंपनी के शेयरों में युद्ध के शुरुआत में ही 40 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इन अमेरिकी शीर्ष कंपनियों को अरबों डॉलर के ऑर्डर भी मिले हैं। व्हाइट हाउस ने इन शीर्ष हथियार कंपनियों के साथ एक समझौता किया है जिसके तहत हथियारों के उत्पादन को चार गुना बढ़ाने पर सहमति हो गई है। ग्लोबल विटनेस और अन्य निगरानी समूहों ने इसे कॉर्पोरेट कल्याण का नाम दिया है जहां सार्वजनिक धन का बड़ा हिस्सा जनहित में खर्च न करके, युद्ध के नाम पर निजी हथियार कंपनियों की जेब भरी जा रही है।
भारत के संदर्भ में देखा जाए तो इस समय देश में असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के स्वतः स्फूर्त आंदोलन ने उद्योगपतियों द्वारा किए जा रहे उनके शोषण की भयावह तस्वीर को पेश किया है। मजदूरों को 10000 रुपये की न्यूनतम मजदूरी में 12-12 घंटे हाड़तोड़ मेहनत करनी पड़ रही है। काम के दौरान मजदूरों को न्यूनतम सुरक्षा के उपकरण और सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं कराए जाते हैं। रोजगार की कोई गारंटी नहीं है। ठेकेदारी व्यवस्था ने उनके जीवन को असुरक्षित बना दिया है। कम मजदूरी मिलने के कारण मजदूर अपनी मूलभूत जरूरत को भी पूरा नहीं कर पा रहे हैं। नए श्रम कानून इसी साल लागू कर दिए गए हैं जिसमें मजदूरों को पहले से मिले सभी अधिकारों को संकुचित कर दिया गया है। इस नए कानून से 300 तक कर्मचारी वाली कंपनियों को बंद करने या मजदूरों की छंटनी करने के लिए फैक्ट्री मालिक को सरकार से अनुमति लेने की जरूरत नहीं है। पहले यह सीमा 100 तक थी। हड़ताल के लिए पहले सूचना देना अनिवार्य कर दिया गया है। इसके साथ सामाजिक सुरक्षा को संकुचित करना, काम के घंटे को 8 से बढ़ाकर 12 घंटे करना, स्थायी की जगह ठेका मजदूर रखने की छूट, महिलाओं को रात में काम करने का प्रावधान, आदि किया गया है।
इसका सीधा रिश्ता भारत-अमेरिका व्यापार समझौते से है, जो फरवरी 2026 में किया गया। उसके बाद नए श्रम कानून बीते 1 अप्रैल को लागू कर दिए गए। इस समझौते के अंतर्गत भारत को अमेरिका से आगामी पांच वर्षों में 500 अरब डॉलर (लगभग 47.15 लाख करोड़) का सामान आयात करना है। जो वस्तुएं अमेरिका से आयात की जाएंगी उसमें कच्चा तेल, कोयला, प्राकृतिक गैस, तकनीकी उत्पाद, नागरिक विमान और उसके पार्ट, ताजा और प्रसंस्करित फल, मेवा, सोयाबीन तेल, वाइन, स्पिरिट, पशु आहार, डेयरी उत्पाद, और अनाज आदि हैं। इन वस्तुओं के आयात करने पर भारत टैरिफ को कम ही नहीं करेगा बल्कि शून्य प्रतिशत करेगा। यही समझौते की शर्त है। भारत-अमेरिका समझौते को विकास और आर्थिक प्रगति के रूप में पेश किया गया, उसके पीछे असंगठित मजदूरों के ऊपर हमले की जो सच्चाई है उसे बड़ी सफाई से छुपाने का असफल प्रयास किया गया, लेकिन दिल्ली एनसीआर के मजदूरों ने उसका परदाफाश कर दिया। वास्तविकता यह है कि यह समझौता पूंजी द्वारा सस्ते श्रम और बाजार की बेरोकटोक लूट का समझौता है। इस समझौते का सबसे आसान शिकार भारत के असंगठित क्षेत्र के मजदूर (ठेका मजदूर, छोटे कारखाने में काम कर रहे मजदूर, दिहाड़ी मजदूर और खेत मजदूर हैं) हैं जिनका जीवन पहले से ही खस्ताहाल है। यह समझौता इन्हें और गरीब तथा असुरक्षित बना देगा। इसीलिए वे विद्रोह पर उतर गए हैं।
कृषि और डेयरी क्षेत्र में इस समझौते से सस्ते दर पर कृषि और दूध उत्पादों का आयात होने से भारतीय किसान और दूध उत्पादक संकट में फंस जाएंगे। अमेरिका अपने किसानों और दूध उत्पादकों को भारी मात्रा में सब्सिडी मुहैया कराता है जबकि भारत में किसानों को जो सब्सिडी दी जाती है वह अमेरिकी किसानों की तुलना में नगण्य है और दूध उत्पादकों को तो कोई सब्सिडी मिलती ही नहीं, जिसके कारण भारत के किसान और दूध उत्पादकों को बर्बाद हो जाने का खतरा पैदा हो गया है।
उधर, ग्रामीण क्षेत्रों में अकुशल मजदूरों को एक वित्त वर्ष में कम से कम 100 दिन काम देने की गारंटी का कानून मनरेगा जो 2005 में बनाया गया था, उसे पिछले साल समाप्त कर दिया गया। मनरेगा में मांग के आधार पर काम पाने का अधिकार, काम नहीं मिलने पर बेरोजगारी भत्ता पाने का अधिकार, पांच किलोमीटर के दायरे में काम नहीं मिलने पर यात्रा भत्ता पाने का अधिकार, आदि शामिल था। अब सब खत्म है। उसकी जगह “विकसित भारत गारंटी रोजगार और आजीविका मिशन ग्रामीण” योजना वीबी-जीरामजी लागू की गई है। इस योजना में ग्रामीण क्षेत्र के मजदूरों को दिए गए सभी अधिकार छीन लिए गए हैं।
खेती-किसानी और मजदूरी के मोर्चे से सामान्य कामकाजी आबादी पर आएं, तो हम पाते हैं कि शीर्ष 1 प्रतिशत लोगों के पास देश की 40 प्रतिशत संपत्ति जमा हो गई है। देश के 21 अरबपतियों के पास 70 करोड लोगों (40 प्रतिशत आबादी) के बराबर धन है। देश के 50 प्रतिशत गरीब और मध्यम वर्ग 64 प्रतिशत जीएसटी जमा करते हैं जबकि शीर्ष 10 प्रतिशत अमीर उसमें 3 प्रतिशत योगदान करते हैं- यह एक ऐसी उल्टी संरचना है जिसमें गरीब लोग ज्यादा टैक्स देते हैं और अमीर लोग सबसे कम। विश्व असमानता की वार्षिक रिपोर्ट 2026 के अनुसार शीर्ष 10 प्रतिशत लोग देश की आय का 58 प्रतिशत कमाते हैं जबकि निचले 50 प्रतिशत लोग केवल 15 प्रतिशत आय कर पाते हैं।
लोकतांत्रिक कर्मकांड की अंतिम बेला
ऐसी स्थिति में इस देश के लोग अगर हर पांच साल पर होने वाले चुनाव में सरकार के खिलाफ अपना वोट देकर उसे बदलने के बारे में सोचें भी, तो उसकी गुंजाइश खत्म की जा रही है।
लोकतंत्र में नागरिकों को दिए गए मतदान के न्यूनतम अधिकार को भी अब सत्ता बर्दाश्त नहीं कर पा रही है। अनिलजी कहते थे कि लोकतंत्र अध्यात्म है, संविधान धर्म और चुनाव पांचसाला कर्मकांड। लोकतंत्र और संविधान को तो राज्य ने काफी पहले ही तिलांजलि दे दी थी, लेकिन जिस तरह से इस बार पश्चिम बंगाल का चुनाव करवाया गया है वह दिखाता है कि अब पांच-पांच साल पर होने वाले कर्मकांड को भी पूरी तरह से नियंत्रित करने की कोशिश की जाएगी, भले उसके लिए नागरिकों से वोट का अधिकार छीनना पड़ जाए और सड़क पर सेना उतारनी पड़ जाए। हाल में हमने देखा कि कैसे वोटर लिस्ट के एसआइआर (विशेष गहन पुनरीक्षण) के नाम पर लाखों मतदाताओं से मतदान के अधिकार को छीन लिया है। चुनाव सेना की संगीनों के साये में हो रहा है।
यानी, नागरिकता तो पहले से ही खतरे में थी। अब आप वोटर रह जाएंगे कि नहीं, इसका भी भरोसा नहीं है। विडंबना यह है कि इस देश की अधिसंख्या जनता को आखिरी उम्मीद जिस सर्वोच्च न्यायालय से थी, वह भी बंगाल के एसआइआर के मामले में कह चुका है कि लोग अगर वोट नहीं दे पाए तो क्या हो जाएगा।
[यह परचा फॉलो-अप स्टोरीज़ के संरक्षक रहे दिवंगत अनिल चौधरी के 76वें जन्मदिवस पर दिल्ली में हुए स्मृति सम्मिलन में पढ़े गए आधारपत्र का संपादित संस्करण है। इस आधारपत्र का पहला ड्राफ्ट सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता अरुण सिंह ने लिखा था, जिसे बाद में संपादित कर के अंतिम रूप दिया गया।]