Fatima Nafees, mother of disappeared JNU student Najeeb Ahmad

गुमशुदा बच्चों के नाम: माल्विनास की बर्बरताएं, मार्केज़ के विवरण और माँओं की बददुआएं

जेएनयू के छात्र नजीब को गायब हुए अगले महीने दस साल पूरे हो जाएंगे। उसकी सरकारी फाइल बंद की जा चुकी है, लेकिन माँ फातिमा ने हार नहीं मानी है। उनकी कानूनी लड़ाई जारी है- बिलकुल अर्जेंटीना की एस्तेला कार्लोतो की तरह, जिन्‍होंने अपनी आधे से ज्‍यादा जिंदगी अपनी बेटी और नाती को खोजने में लगा दी। जिस देश में हर साल चार से पांच लाख लोग ‘गुमशुदा’ दर्ज किए जाते हैं, वहां उनकी कहानियां कहने पर लगी अघोषित पाबंदी मार्केज़ की याद दिलाती है, जिन्‍होंने सबसे पहले माल्विनास में अर्जेंटीना के गुमशुदा बेटों की नियति को उजागर किया था। मार्केज़ अब सौ साल के हो रहे हैं। विद्यार्थी चटर्जी का यह लेख मार्केज़ की जन्‍मशती, नजीब की गुमशुदगी और दुखियारी माँओं के नाम

Jan Gustaf Troell

Jan Troell : रूपहले परदे पर वंचितों के सपनों को पिरोने वाला एक फिल्मकार

कामगार तबके की कहानियां परदे पर उतारने वाले स्‍वीडिश फिल्‍मकार यान गुस्‍ताफ़ त्रोएल 23 जुलाई, 2026 को 95 साल के पूरे हो गए। आधुनिक यूरोपीय सिनेमा में उनके जोड़ के उम्‍दा फिल्‍मकार बमुश्किल कुछ ही हैं। उस पर भी जीवित फिल्‍मकारों में एकाध ही। तकरीबन एक सदी तक मजदूरों, वंचितों और मेहनतकशों के प्रति अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता और कलात्‍मक संजीगदी को लेकर जी जाना इतना आसान नहीं होता। भारत में उम्‍दा सिनेमा के प्रेमियों को त्रोएल के काम के बारे में जरूर जानना चाहिए, विद्यार्थी चटर्जी की कलम से

Portrait of Satyajit Ray by Rishiraj Sahoo in 1997

…जिनके दामन पर ऑस्कर से आसक्ति एक धब्बे की तरह चिपक गई!

भारत के कुछ फिल्‍मकारों और सिनेमा-दर्शकों के एक वर्ग को अगर किसी एक व्‍यक्ति ने ऑस्‍कर पुरस्‍कारों के बारे में भ्रमित किया कि इस पुरस्‍कार को पाना पुनर्जन्‍म होने के जैसा है, तो वह सत्‍यजित राय थे। ऑस्‍कर से उनकी आसक्ति ऐसी रही कि अपने देश में मिले ढेर सारे प्‍यार, सराहना और सम्‍मानों के बारे में कहने को उनके पास कभी खास शब्‍द नहीं थे। विद्यार्थी चटर्जी की टिप्‍पणी

निरंकुशता के विरुद्ध : तख्तापलट के पचास बरस और चिली का प्रतिरोधी सिनेमा

चिली में अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआइए की शह पर किए गए तख्‍तापलट को पचास साल पूरे हो गए। इतने ही बरस राष्‍ट्रपति सल्‍वादोर अलेन्‍दे की हत्‍या और उसके बारह दिन बाद महान कवि पाब्‍लो नेरूदा के निधन को भी हो रहे हैं। 11 सितंबर, 1973 से लेकर 1990 के बीच सत्रह साल की जिस तानाशाही और निरंकुशता ने देश में इनसानियत के सूरज को उगने से रोके रखा, उसकी भयावह स्‍मृतियों को दर्ज करने और संजोने का काम चिली के सिनेमाकारों ने किया। चिली के तख्‍तापलट पर केंद्रित सिनेमा की परंपरा पर सिने आलोचक विद्यार्थी चटर्जी की यह लंबी कहानी, अनुवाद अभिषेक श्रीवास्‍तव ने किया है

मिलान कुंदेरा के बहाने: प्राग और मॉस्को के दो विरोधी ध्रुव

अपनी रचनाओं में कम्‍युनिस्‍ट सर्वसत्‍तावाद की आलोचना करने वाले चेक-फ्रेंच लेखक मिलान कुन्‍देरा 11 जुलाई को चल बसे। कभी वे कम्‍युनिस्‍ट पार्टी के सदस्‍य हुआ करते थे। उन्‍हें पार्टी से निकाला गया था। वे 1975 में पेरिस चले आए और वहीं के नागरिक हो गए। उनके पीछे जो रह गए, जिन्‍होंने कम्‍युनिस्‍ट आतंक के साये तले देश नहीं छोड़ा बल्कि वे लड़े और सब सहे, उनकी कहानियां कम ज्ञात हैं

आवारा सर्वहारा

आज जैसे हालात हैं, उनमें कह सकते हैं कि कामगार किसी कमतर ईश्वर के बनाए हुए नहीं हैं बल्कि उनको बनाने वाला ईश्वर ही अब वजूद से बाहर है। हक्सर इस लिहाज से श्रेय की पात्र हैं कि वे कामगारों को बचा ले जाने का एक सार्थक और सृजनात्मक प्रयास करती हैं, जो सामूहिक स्मृतिभ्रंश का त्रासद शिकार हो चुके हैं।