आवारा सर्वहारा

आज जैसे हालात हैं, उनमें कह सकते हैं कि कामगार किसी कमतर ईश्वर के बनाए हुए नहीं हैं बल्कि उनको बनाने वाला ईश्वर ही अब वजूद से बाहर है। हक्सर इस लिहाज से श्रेय की पात्र हैं कि वे कामगारों को बचा ले जाने का एक सार्थक और सृजनात्मक प्रयास करती हैं, जो सामूहिक स्मृतिभ्रंश का त्रासद शिकार हो चुके हैं।

ईश्‍वर ने कहा, ‘’कामगार हो’’, और कामगार तबके का जन्‍म हो गया। ईश्‍वर चूंकि सबको एक आंख से देखता है, तो अपनी इंसाफपसंदगी में उसने फिर कहा, ‘’कामगारों के दुश्‍मन भी हों’’, और इस तरह बनिये, महाजन, कॉरपोरेट और उनके रहनुमा भी पैदा हो गए। तब से लेकर अब तक दोनों पक्षों के बीच हास्‍यास्‍पद रूप से एक गैर-बराबर जंग मची हुई है। गवैयों ने इस पर गीत गाए। कवियों और कथाकारों ने इस पर लिखा। यहां तक कि फिल्‍मकार, जो चित्रकारी, संगीत, रंगकर्म या नृत्‍य के मुकाबले बहुत ताजा पैदाइश हैं, उन्‍होंने भी इस विषय को उठाया- केवल यह दिखाने के लिए कि कैसे समय बीतते जाने के साथ एक कामगार और उसके परिवार की नियति में लोगों की दिलचस्पी घटती जा रही है। इन सब के बावजूद अदद कामगार अपने काम में जुटा रहा, इस बात से बेखबर कि कौन उसके साथ खड़ा उसकी बात कह रहा है और कौन उसके खिलाफ है।

हालिया अतीत की जमीनी घटनाओं को देखें, जैसे देश के अलग-अलग हिस्‍सों में किसानों और मजदूरों के भयंकर प्रदर्शन और पदयात्राएं, तो ऐसा लगता है कि ‘संपन्‍न’ और ‘विपन्‍न’ के बीच की यह जंग अपने अंजाम से अभी बहुत दूर है।

इस संबंध में 2019 का एक अनुभव साझा करने को मन होता है। वह बंगलौर का एक चकमा दमकता, कांच और स्‍टील का विशाल मॉल था, जहां की यह घटना है। वह तजुर्बा जबड़े पर, मतलब मेरे पढ़े-लिखे मध्‍यवर्गीय जबड़े पर, एक जबरदस्‍त घूंसा खाने जैसा अहसास था, जब दो घंटे के एक सिनेमाई सफर पर मैं समाज की उस तलछट से गुजरा जहां जेबकतरों, भिखारियों, बेलदारों, कारखाने में काम करने वाले दिहाड़ी मजदूरों, सड़कछाप गवैयों, ठेले-खोमचे वालों और इन्‍हीं की बेनाम बिरादरी के तमाम दूसरे प्राणियों का वास था। ऐसे आवारा संत, पतित नायक, ठगहरे और तमाम किस्‍म के गर्दनमार पुरानी दिल्‍ली में इफरात के भाव में पाए जाते हैं, जहां कभी बादशाह दरबार लगाते थे और शायर इश्‍क और जुदाई, दोस्‍ती और ज़फ़ा के नगमे गाते थे। वह ऐसा तजुर्बा था गोया अचानक एक झटके में फिल्‍म महोत्‍सव की जूरी होने का उबाऊ काम एक जश्‍न और गर्मजोशी भरी जिम्‍मेदारी में तब्‍दील हो गया था। बंगलौर फिल्‍म फेस्टिवल की जूरी में शामिल मेरे दोस्‍तों ने और मैंने उस फिल्‍म को सबसे बड़े सम्‍मान के लिए चुना था।

अनामिका हक्‍सर की घोड़े को जलेबी खिलाने ले जा रिया हूं तिनके-तिनके जोड़ कर बनाए जाने वाले एक गल्‍प-वृत्‍तान्‍त का शानदार उदाहरण है। तमाम शैलियों और विषयों को आपस में पिरोकर यह फिल्‍म मौजूदा दौर के बाजार संचालित समाज की आलोचना करती है और विशेष तौर से कामगार तबके की बदकिस्‍मत स्थितियों को सामने लाकर रखती है। सांस रोक देने वाले विद्रूप से लेकर ठोस यथार्थवाद तक फैली इस फिल्‍म की छवियां इतनी सशक्‍त और दर्दनाक हैं कि कहीं-कहीं असह्य हो जाती हैं; और उनमें ध्‍वनियों का प्रयोग, सांयोगिक हो या संयोजित, छवियों की गति में उतना ही रहस्‍यात्‍मक बन पड़ता है। हक्‍सर एक दुर्लभ किस्‍म की संवेदना को रंगमंच, फिल्‍म, चित्रकला, संगीत, मेलोड्रामा और ऊधम के संयोजन से प्रस्‍तुत करती हैं, जो तकरीबन खुरदुरी छवियों और ध्‍वनियों का एक देसी कॉकटेल बनकर उभरता है।  

इस तरह से वे अंतत: एक ऐसे विरोधाभासी जगत को आकार दे पाती हैं जो यथार्थ और विभ्रम के बीच झूल रहा है। इतनी बेरंग जिंदगियों में इतना सारा रंग! इतनी ठस जिंदगियों में ऐसी बेचैन हरकत! विरोधाभास ही जीवन का सार हैं, और शायद, हक्‍सर की सिनेमाई दृष्टि में आगे बढ़ने का यही एक पक्‍का रास्‍ता भी है।



इतिहास (पढ़ें बाजार) की गति ऐसी रही है कि एक ‘सामान्‍य’ कामगार अब गायब हो चुका है। आज का ‘असामान्‍य’ कामगार वह है जो अपना पेट चलाने के लिए दूसरे की जेब काटने को बाध्‍य है। इतिहास ने ही उसे अपना काम चुनने का हक दिया है। धरती के ऐसे तमाम अभिशप्‍त किसी जमाने के मशहूर शाहजहांनाबाद के सड़ांध भरे अंधेरे सीवरों में चूहों की तरह रहने को मजबूर हैं। इन्‍हीं की कहानी कहने को जुटी है एक टीम, जो बेहद करुणामयी है और जबरदस्‍त कल्‍पनाशीलता से लबरेज़ है। हक्‍सर और उनके सहयोगी (खासकर सौम्‍यानंदा साही, गौतम नायर, परेश कामदार, सौमित्र राणाडे, सिद मीर, लोकेश जैन) पतन की इस तलछट में अतीत के मध्‍यकालीन वैभव से उतरते हैं और इतने हौले से इसे स्‍पर्श करते हैं कि यह कृत्‍य एक साथ अपनी उदात्‍तता और अपने उपहास्‍य में अद्भुत बन उठता है।

अरेबियन नाइट्स की कथाओं से सहज उधार ली गई उड़ने वाली कालीन एक साथ कल्‍पना की उड़ान और प्रतिकूलताओं की सूरत में जिजीविषा की रणनीति का बिम्‍ब बनकर उभरती है। इसी तरह, एक प्रतिबद्ध कॉमरेड की विशाल लाल झण्‍डा थामे उसे लहराते हुए छवि, जो सीधे सोवियत दौर की किसी कलाकृति से उठा ली गई जान पड़ती है, उस गर्वीले अतीत को वापस लाने का एक विडम्‍बनापूर्ण प्रयास लगती है जो कभी न आने के लिए वापस जा चुका है।

ऐसे आवाहन, चाहे इसे मिथकीय कहें या ऐतिहासिक, शायद यह बताने के लिए इस्‍तेमाल किए गए हैं कि चूंकि क्रांति कभी आई थी और भारतीय उपमहाद्वीप को कायदे से छुए बगैर ही निकल गई, तो उससे प्रेरित होते रहने का इकलौता तरीका यही बचा है कि अपनी स्‍मृतियों में बार-बार परिकथाओं या विफल इतिहासों की ओर लौट आया जाए, बशर्ते वे बच रहे हों।    

अपने झूल रहे वर्तमान को कसने के लिए अतीत के आवाहन का सूक्ष्‍म लेकिन साहसिक प्रयास दरअसल फिल्‍म के शीर्षक में मौजूद लेकिन परदे पर अदृश्‍य घोड़े को हलवाई के यहां ले जाकर जलेबी खिलाने जैसी एक कवायद है। जिस तरह हलवाई घोड़े को खुश करने के लिए अपनी मिठाइयों का सौदा करने से इनकार करता है, ठीक वैसे ही पुरानी दिल्‍ली के गालीबाज पत्‍थरदिल सेठ अपने मेहनतकश कामगारों को दो पैसा ज्‍यादा दिहाड़ी देने या थोड़ी सी प्रतिष्‍ठा देने में कंजूसी बरतते हैं।

अब सोचता हूं कि जहां मैंने यह फिल्‍म देखी थी, उस विशाल मॉल और उसके इर्द-गिर्द फैले विलासी वातावरण के बीच समाज के सबसे पतित प्राणियों के साहस, दिहाड़ी और प्रतिष्‍ठा के लिए उनके संघर्ष के संकल्‍प तथा तमाम उलट स्थितियों के बीच उनके संक्रामक हास्‍यबोध का ऐसा खुला और पुरखुलूस जश्‍न कितना स्‍वप्निल और अवास्‍तविक तजुर्बा था। यह विपर्यय इसलिए भी था क्‍योंकि किसी दूसरे महानगर से अलग, बंगलौर ही वह शहर है जो अपने तंत्र के भीतर किसी भी मामूली कामगार को अपनी जरूरत के हिसाब से सोख लेता है और फिर जब चाहे उसे निचोड़ कर बाहर उगल देता है। ऐसा करने में यह शहर खुद पर गर्व भी करता है।

निम्‍नवर्गीय हास्‍यबोध के तमाम संस्‍करणों के साथ अपनी लगावट के बावजूद हक्‍सर का यह सिनेमा काफी गंभीर है। पसलियों को चुभने वाली गालियां और मौलिक लतीफे एक किस्‍म से इस बात की सूक्ष्‍म आलोचना हैं कि श्रमिक राजनीति कितने नैतिक पतन का शिकार हो चुकी है, खासकर उदारीकरण के इन तीस वर्षों के दौरान, लेकिन जितना पतन इधर बीच हुआ उतना कभी नहीं था। फिल्‍म में एक संक्षिप्‍त सीक्‍वेंस है जिसमें नियोक्‍ता ‘’यूनियनें’’ बनाने के अपने ‘’अधिकार’’ की बात कर रहे हैं और कामगारों को अपनी ‘’मांगें’’ स्‍वीकार करने को बाध्‍य कर रहे हैं, यदि वे नौकरी करते रहना चाहते हैं- जबकि हाल-हाल तक इसका ठीक उलट हुआ करता था। यह दृश्‍य ट्रेड यूनियन आंदोलन के इस दौर में हाशिये पर चले जाने के ऊपर एक तीखी टिप्‍पणी है। एक अर्थ में यह फिल्‍म उन चीजों को दिखाती है जिसे मध्‍यवर्ग और उच्‍चवर्ग का एक बड़ा तबका भूल जाना चाहता है या जिधर निगाह नहीं करना चाहता है- कारखानों, व्‍यापारिक प्रतिष्‍ठानों, गोदामों और बड़ी-छोटी दुकानों के इर्द-गिर्द काम करने के हालात।

अपनी खास विजुअल भाषा के माध्‍यम से हक्‍सर शायद अपनी इस मान्‍यता को जाहिर करना चाह रही हैं कि उत्‍पादन, उत्‍पादकता और मुनाफा हासिल करने के लिए आपको पूंजी (सरकारी या सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से जो नियमित उधार ली जाती है और उतने ही नियमित ढंग से लौटायी नहीं जाती), मशीनरी या प्रबंधकों से भी ज्‍यादा कुछ चाहिए होता है। उनकी यह भाषा हमें उकसाती है तो राहत भी देती है, मनोरंजन करती है तो आक्रोशित भी करती है। वे कहना चाह रही हैं कि किसी औद्योगिक या वाणिज्यिक गतिविधि को कामयाब बनाने में कामगारों की भूमिका को राज्‍य, कॉरपोरेट और समाज बड़ी आसानी से भुला देता है। आज जैसे हालात हैं, उनमें कह सकते हैं कि कामगार किसी कमतर ईश्‍वर के बनाए हुए नहीं हैं बल्कि उनको बनाने वाला ईश्‍वर ही अब वजूद से बाहर है। हक्‍सर इस लिहाज से श्रेय की पात्र हैं कि वे कामगारों को बचा ले जाने का एक सार्थक और सृजनात्‍मक प्रयास करती हैं, जो सामूहिक स्‍मृतिभ्रंश का त्रासद शिकार हो चुके हैं। ध्‍वनियों और छवियों में एकल व सामूहिक अतिरंजना और सूक्ष्‍मता के दोहरे प्रयोग से वे कामगारों के प्रति व्‍यापक उदासीनता और उपेक्षा को मात देने की कोशिश करती हैं और उसकी जगह सम्‍मानजनक ढंग से ‘’पूरी दिहाड़ी’’ को स्‍थापित करती हैं।

पागल कर देने की हद तक सनक से भरी इस फिल्‍म के भीतर अभिनय करने वाला जेबकतरा पतरू (रवींद्र साहू), बेलदार लालबिहारी (के. गोपालन), रेहड़ी वाला छदामी (रघुवीर यादव), अनाम गाइड (लोकेश जैन) और सड़क पर विचरने वाले ऐसे 350 पात्र जितने वास्‍तविक हैं उतने ही काल्‍पनिक लगते हैं। वे बिना आपके दिमाग को कोई चुनौती दिए आपके दिल के साथ खेलते हैं। देखने वाला भावनाओं और कल्‍पनाओं के वश में आ जाता है, गोया वे प्रेमी जोड़े हों जो एक दूसरे के कान में प्रतिशोध की किसी योजना को फूंक रहे हों, लेकिन सबके मन में बेहतर भविष्‍य की आस भी हो। जाहिर है सपने अगर मरते होंगे, तो सबसे अंत में।

अपनी इस पहली फिल्‍म के बारे में अनामिका हक्‍सर कहती हैं, ‘’यह फिल्‍म पुरानी दिल्‍ली की सड़कों पर लोगों की जिंदगी को सात साल तक रिकॉर्ड करने से निकली है। यह एक सीधी दिशा में नहीं चलती। मिनट दर मिनट यह बेघर प्रवासी की तरह चलती है और हर घटना के साथ अपना स्‍पेस और अपनी संरचना को बदलती जाती है। कोई एक कथा नहीं है, कई कहानियां हैं इसमें। हमारे पास संतुष्‍ट और स्थिर जिंदगियों जैसी कोई सुविधाजनक संरचना मौजूद नहीं है। हमने उन लोगों के साथ चलने की कोशिश की है जिन्‍हे नहीं पता कि अगले पल क्‍या घटने वाला है। फिल्‍म में प्रशिक्षित कलाकारों के साथ आम लोगों को भी लिया गया है। बड़ी घटनाओं की जगह छोटी-छोटी बातें ही यहां जश्‍न का सबब हैं। चूंकि हमारे पास अलग-अलग पृष्‍ठभूमि, जैसे थिएटर, पेंटिंग, ऐनिमेशन, सिनेमा और स्‍पेशल एफेक्‍ट्स से आने वाले लोगों की समृद्ध टीम है, तो हमारी फिल्‍म वास्‍तविक परिदृश्‍यों से फोटोग्राफ और रंगमंचीय पलों से रंगीन लैंडस्‍केप और विशुद्ध सिनेमा तक आती-जाती रहती है। यह हम सब के लिए एक उत्‍साहजनक सफर था। फिल्‍म के संगीत में ‘’औद्योगिक ध्‍वनियां’’ हैं। संगीत समकालीन से परंपरागत की दिशा में सफर करता है। फिल्‍म नवयथार्थवाद से भारतीय लोक और यहां तक कि अभिव्‍यंजनावाद तक जाती है, जहां सपनों की बात आती है। इसके कलाकार लोक और समकालीन रंगमंच की परंपराओं में सिद्धहस्‍त हैं। जॉनर के मामले में कहें तो यह फिल्‍म हलके फुलके व्‍यंग्‍य से ब्‍लैक ह्यूमर तक का वितान तय करती है।‘’           

भारतीय कामगार वर्ग के असंगठित और बिखरे हुए विशाल तबके से चुनकर आए जो कुछेक कायदे के नुमाइंदे हैं, घोड़े को जलेबी… उनकी छरहरी गरदन को सुसज्जित करने के लायक फिल्‍म है। ये लोग आए दिन अपनी प्राचीन और सड़ी-गली धारणाओं के चक्‍कर में जिस किस्‍म की मूर्खताएं करते हैं, और कभी-कभार तो भूखे पेट सो रहे कामगारों की कीमत पर, संभव है कि परंपरागत सिनेमा के महन्‍तों को वह निराश करने वाली हों लेकिन दिवंगत चार्ली चै‍पलिन और उनके चाहने वालों को उस पर आनंद ही आता। इस फिल्‍म में जितने किस्‍म के आवारा सर्वहारा दिखाए गए हैं, वे अपने उत्‍पीड़कों के प्रति अवमानना का भाव रखते हुए उसके बरअक्‍स उम्‍मीद और कॉमरेडशिप की एक संस्‍कृति निर्मित करते हैं और चैपलिन की प्रसिद्ध उक्ति की याद दिलाते हैं कि, ‘’इस धूर्त जगत में कुछ भी स्‍थायी नहीं है- हमारे कष्‍ट भी नहीं!”

इस लगातार नाउम्‍मीद होती जाती दुनिया में उम्‍मीद, और बस उम्‍मीद ही एक कामगार की घड़ी को टिकटिक करते हुए चलने की प्रेरणा दे सकती है। दो घंटे की फिल्‍म के दौरान इसकी निर्देशक एक के बाद एक हमें असंभव, काल्‍पनिक, विद्रूप, वास्‍तविक और जीवन को आश्‍वस्‍त करने वाली कथाएं सुनाती जाती हैं, शायद इस विश्‍वास के साथ कि हमने यदि ऐसी कहानियों को खोजना या गढ़ना बंद कर दिया तो हम भी नहीं बचेंगे।

कहने की इजाजत चाहता हूं, कि घोड़े को जलेबी… बदहज़मी के मारे किसी उच्‍चवर्गीय शुद्धतावादी दर्शक के लिए नहीं है। यह एक ऐसे सर्वहारा आवारा का लंगर है जिसकी कश्‍ती दृश्‍य और अदृश्‍य तूफानों के बीच फंसी हुई है।         


(लेखक कोलकाता स्थित पुरस्‍कार प्राप्‍त फिल्‍म समालोचक हैं)


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