दो दिन की पत्रकारिता: जब घेराव, हमले और हिरासत का शिकार बने 37 से ज्यादा मीडियाकर्मी
byबीते दशकों के दौरान 10-11 अक्टूबर के दो दिन देश की पत्रकारिता में हमेशा याद रखे जाने के लिए दर्ज हो गए जब सुप्रीम कोर्ट को सरकार के दिए आश्वासन के बावजूद राजधानी की सड़कों पर महज अपना काम कर रहे पत्रकारों को बेरहमी से मारा गया, घसीटा गया और उठा कर हिरासत में भेज दिया गया। कोविड के बाद लगे लॉकडाउन और उससे पहले नागरिकता विरोधी आंदोलन की कवरेज में भी ऐसे दृश्य देखने को मिले थे, लेकिन इस बार मामला इसलिए गंभीर है क्योंकि पत्रकारों पर हमले में दिल्ली पुलिस और प्रशासन के साथ राज्येतर तत्त्वों की भी भागीदारी थी। कमेटी टु प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स ने एक अंतरिम सूची बनाई है, हालांकि हमलों और हिरासतों की वास्तविक संख्या इससे कहीं ज्यादा है। सीपीजे की सोमी दास की रिपोर्ट