Dictatorship

The Battle of Chile

बीत चुकी दुनिया और उसके लोगों की एक फिल्म, जो उम्मीद की स्मृतियां बहाल करती है!

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डॉक्‍युमेंटरी निर्माताओं में बहुत कम लोग ऐसे हैं जिनका समूचा काम एक ही विषय के इर्द-गिर्द अलग-अलग पहलुओं को समेटता हुआ अपने समय के कालानुक्रमिक दस्‍तावेज जैसा हो। चिली की तानाशाही और लोकजीवन के प्रसंग में पात्रीसियो गुज्‍़मान ने आजीवन जो काम किया, वही काम बीते पचास साल से आनंद पटवर्धन भारत में साम्‍प्रदायिकता की विभिन्‍न छायाओं के साथ कर रहे हैं। स्‍वाभाविक है कि गुज्‍़मान के काम का पटवर्धन पर गहरा असर रहा होगा। खुद आनंद पटवर्धन के शब्‍दों में, गुज्‍़मान की ऐतिहासिक फिल्‍म ‘द बैटल आफ चिली’ पर कुछ शब्‍द

Patricio Guzmán

मैं, पात्रीसियो गुज्‍़मान… संघर्षरत जनता के महान फिल्मकार की कहानी उन्हीं की जुबानी

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दुनिया भर में आम लोगों की जिंदगी को दर्ज करने वालों का अगर कोई पितामह कहा जा सकता है, तो वे फिल्‍मकार पात्रीसियो गुज्‍़मान हैं। नवउदारवाद की पहली प्रायोगिक धरती चिली में पैदा हुए गुज्‍़मान ने तानाशाह फ्रांको के स्‍पेन में सिनेमा सीखा और आयेंदे की क्रांति के वक्‍त लौटकर अपने देश आए। इसके बाद का उनका पूरा जीवन सैन्‍य तख्‍तापलट, जनरल पीनोशे के अत्‍याचारों और आम लोगों के संघर्षों को रिकॉर्ड करते हुए बीता। इसकी उन्‍हें कीमत भी चुकानी पड़ी। गुज्‍़मान बीते 15 सितंबर को गुजर गए। वे क्‍या थे, कौन थे, उनकी प्रेरणाएं क्‍या थीं, सब कुछ खुद उन्‍हीं की जुबानी

Ken Saro-Viva

तानाशाही सत्ताओं से कैसे न पेश आएं? केन सारो-वीवा की शहादत के तीसवें साल में एक जिंदा सबक

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एक लेखक अपने लोगों और अपने जल, जंगल, जमीन को बचाने के लिए फांसी पर झूल गया था, यह बात आभासी दुनिया के बाशिंदों को शायद मिथकीय जान पड़े। महज तीन दशक पहले दस नवंबर, 1995 को केन सारो-वीवा एक तानाशाह के हाथों शहीद हुए थे। बिलकुल उसी दिन, जब दशकों बाद जेल से आजाद हुए नेल्‍सन मंडेला बतौर राष्‍ट्रपति अपने पहले अंतरराष्‍ट्रीय सम्‍मेलन में भाग ले रहे थे। मुक्तिकामी संघर्षों की धरती अफ्रीका के इतिहास का यह अहम प्रसंग हमारी आज की दुनिया के लिए क्‍यों प्रासंगिक है? केन सारो-वीवा की हत्‍या के एक दशक बाद उनके गांव-शहर होकर आए वरिष्‍ठ पत्रकार आनंद स्‍वरूप वर्मा ने इसे अपनी पुस्‍तक में दर्ज किया है। आज केन सारो-वीवा को याद करते हुए उन्‍हीं की कलम से यह कहानी

निरंकुशता के विरुद्ध : तख्तापलट के पचास बरस और चिली का प्रतिरोधी सिनेमा

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चिली में अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआइए की शह पर किए गए तख्‍तापलट को पचास साल पूरे हो गए। इतने ही बरस राष्‍ट्रपति सल्‍वादोर अलेन्‍दे की हत्‍या और उसके बारह दिन बाद महान कवि पाब्‍लो नेरूदा के निधन को भी हो रहे हैं। 11 सितंबर, 1973 से लेकर 1990 के बीच सत्रह साल की जिस तानाशाही और निरंकुशता ने देश में इनसानियत के सूरज को उगने से रोके रखा, उसकी भयावह स्‍मृतियों को दर्ज करने और संजोने का काम चिली के सिनेमाकारों ने किया। चिली के तख्‍तापलट पर केंद्रित सिनेमा की परंपरा पर सिने आलोचक विद्यार्थी चटर्जी की यह लंबी कहानी, अनुवाद अभिषेक श्रीवास्‍तव ने किया है