Employment

Rally against changes in MNREGA in Sitapur, UP

‘MNREGA में बदलाव बहाना है, मकसद गुलाम बनाना है’! क्यों? कैसे? एक सरल तुलनात्मक विश्लेषण

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संसद में 18 दिसंबर को पारित और तीन दिन के भीतर ही राष्‍ट्रपति द्वारा स्‍वीकृत वीबी-जीरामजी नाम का नया विधेयक मनरेगा के ताबूत में केंद्र सरकार की आखिरी कील साबित होने जा रहा है। पिछले ग्‍यारह साल से ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून को कमजोर करने में लगी सरकार ने अब उसे मांग-आधारित अधिकार से एनजीओछाप आपूर्ति-आधारित मिशन में तब्‍दील कर के उसकी आत्‍मा को खोखला कर दिया है। नतीजतन, देश भर में ग्रामीण मजदूर और खेतिहर आंदोलन पर हैं। मनरेगा और वीबी-जीरामजी का सरल शब्‍दों में अरुण सिंह ने तुलनात्‍मक विश्‍लेषण किया है, जो हर कार्यकर्ता और पत्रकार के लिए एक जरूरी पाठ है

A wall poster of NDS in Bihar

बिहार: युवाओं के ज्वलंत मुद्दे मतदाताओं को बदलाव के लिए एकजुट क्यों नहीं कर सके?

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एक दौर में अपनी छात्र-युवा शक्ति के बल पर इस देश में संपूर्ण क्रांति का नारा देने वाला बिहार बीस साल से एक अदद सरकार तक नहीं बदल पा रहा है जबकि युवाओं की समस्‍याएं दिन-ब-दिन गंभीर होती जा रही हैं। इस बार सभी राजनीतिक दलों ने युवाओं से रोजगार आदि का वादा किया था, लेकिन चुनाव जब जमीन पर उतरा तो सारी कहानी जातिगत ध्रुवीकरण का शिकार हो गई। जो दल जीता, उसने ‘जंगलराज’ का डर दिखाकर वोट खींच लिए। हर बार यही होता है और हर बार बिहार का नौजवान ठगा जाता है। चुनाव नतीजों के बाद विपक्ष के कुछ युवाओं से बातचीत के आधार पर अखिलेश यादव की टिप्‍पणी

पूंजीवाद की मौत करीब है

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पूंजीवादी व्यवस्था का पतन अब बहुत निकट आ चला है। जितना आप और हम सोच रहे हैं उससे कहीं निकट। केवल एक बात है जो हम नहीं जानते। वह है ट्रिगर इवेंट। वह द्विपक्षीय तनाव भी हो सकता है जिसकी पर्याप्त सम्भावनाएं भारत-पाक, भारत-चीन, चीन-अमरीका, अमरीका-रूस के  बीच देखी जा सकती हैं। वह ब्रेगज़िट या कोई अन्य घटना से भी हो सकता है। लेकिन यह निश्चित हो चला है कि‍ अब इसे टाला नहीं जा सकता।