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Tribal women and Sal trees in Kalahandi

ओडिशा : साल के जंगलों पर टिके वजूद को बचाने की जंग में आदिवासियों का सच्चा साथी कौन?

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वेदांता कंपनी को दिसंबर 2025 में सिजीमाली बॉक्‍साइट खनन परियोजना के पहले चरण की (सैद्धांतिक) मंजूरी मिली थी। वनों की कटाई को अब तक अंतिम मंजूरी नहीं मिली है। फिर यहां साल के पेड़ कौन काट रहा है? सरकार, कंपनी या दलाल? आदिवासी इस सवाल से परेशान हैं, लेकिन उनके वजूद का संकट इतना गहरा चुका है वे नहीं जानते कि जल, जंगल और जमीन की रक्षा में उनका सच्‍चा साथी कौन है। इसीलिए एमएमडीआर कानून में संशोधन के खिलाफ संयुक्‍त रैली निकाल चुके इंडिया गठबंधन को थोड़ा आगे बढ़कर सवालों का दायरा बढ़ाने की जरूरत है ताकि आदिवासियों की पुकार को उसमें जगह दी जा सके। रायगड़ा-कालाहांडी से रंजना पाढ़ी का फॉलो-अप

मौसम की मार, बेपरवाह सरकार और महुए के फूलने का अंतहीन इंतजार…

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सूखे के मामले में बीते अगस्त ने पिछले सौ साल का रिकॉर्ड तोड़ दिया। मानसून में बारिश कम होने से सात राज्य संकट में हैं, लेकिन झारखंड के आदिवासियों की तो कमर ही टूट गई है जिनकी जिंदगी जंगल और उसके फल-फूल के भरोसे चलती है। एक तो बिचौलियों के खेल, उस पर से जलवायु के बदलाव और सरकारी योजनाओं का जमीन पर टोटा, तीनों के जाल में वन आश्रित समुदाय पलायन को मजबूर हैं। पुलिट्ज़र सेंटर के सौजन्य से लातेहार और पलामू से लौटकर सुष्मिता की रिपोर्ट

देश के सबसे कम शिक्षित जिले में अपने जंगलों को कैसे बचाए हुए हैं भील आदिवासी

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आजादी के पचहत्‍तर साल में वन अधिकार पर अब जाकर कुछ बातें हो रही हैं और परंपरागत वनवासियों को कहीं-कहीं पट्टे दिए भी जा रहे हैं, लेकिन कुछ आदिवासी इलाके ऐसे हैं जहां जंगल को बचाने का विवेक और तकनीक बरसों से कायम है। मध्‍य प्रदेश का अलीराजपुर ऐसा ही एक जिला है, जिसे सबसे पिछड़ा माना जाता है। बावजूद इसके यहां के लोग अपने अधिकारों को लेकर सबसे जागरूक दिखाई देते हैं। अलीराजपुर के ककराना से आदित्‍य सिंह की रिपोर्ट