ओडिशा : साल के जंगलों पर टिके वजूद को बचाने की जंग में आदिवासियों का सच्चा साथी कौन?

Tribal women and Sal trees in Kalahandi
Tribal women and Sal trees in Kalahandi
वेदांता कंपनी को दिसंबर 2025 में सिजीमाली बॉक्‍साइट खनन परियोजना के पहले चरण की (सैद्धांतिक) मंजूरी मिली थी। वनों की कटाई को अब तक अंतिम मंजूरी नहीं मिली है। फिर यहां साल के पेड़ कौन काट रहा है? सरकार, कंपनी या दलाल? आदिवासी इस सवाल से परेशान हैं, लेकिन उनके वजूद का संकट इतना गहरा चुका है वे नहीं जानते कि जल, जंगल और जमीन की रक्षा में उनका सच्‍चा साथी कौन है। इसीलिए एमएमडीआर कानून में संशोधन के खिलाफ संयुक्‍त रैली निकाल चुके इंडिया गठबंधन को थोड़ा आगे बढ़कर सवालों का दायरा बढ़ाने की जरूरत है ताकि आदिवासियों की पुकार को उसमें जगह दी जा सके। रायगड़ा-कालाहांडी से रंजना पाढ़ी का फॉलो-अप

पिछले सात दशक से ओडिशा जबरन जमीन अधिग्रहण और प्राकृतिक संसाधनों के क्षरण के खिलाफ यहां उभरे जन आंदोलनों का गवाह रहा है। आजादी के बाद से यहां जितनी भी सरकारें बनी हैं, चाहे कांग्रेस के नेतृत्‍व वाली या बीजू जनता दल के या फिर आज की तारीख में भारतीय जनता पार्टी की सरकार, सभी की नीतियां जल, जंगल और जमीन को लेकर एक समान रही हैं। आज पूरे राज्‍य में होने वाली जनता की रैलियों में सबसे प्रमुखता के साथ जो नारा लग रहा है वह डबल इंजन वाली सरकार- यानी केंद्र और राज्‍य दोनों में भाजपा की सरकार- को हटाने का नारा है। 

हाल ही में इंडिया गठबंधन के घटक दलों ने 8 अक्‍टूबर को ओडिशा बंद का आह्वान किया था, जो सफल रहा। इस आयोजन में कांग्रेस, भाकपा, माकपा, भाकपा(माले) लिबरेशन, फॉरवर्ड ब्‍लॉक, राकांपा, समाजवादी पार्टी और राजद ने हिस्‍सा लिया था। उस दिन कुछ जिलों में शाम पांच बजे तक बाजार और सार्वजनिक परिवहन पूरी तरह ठप हो गया था। इस बंद की दिलचस्‍प बात यह रही कि भाजपानीत राज्‍य सरकार के खिलाफ समूचा विपक्ष अंधाधुंध खनन के खतरों के खिलाफ एकजुट दिखाई दिया। वास्तव में, 8 अक्‍टूबर के बंद की प्रमुख मांग ही एमएमडीआर संशोधन अधिनियम, 2026 को वापस लेना था। इस मांग के पीछे यह डर है कि कानून में किए जाने वाले संशोधन अपने खनिज संसाधनों के ऊपर राज्‍य के अधिकारों की अनदेखी करेंगे और खनन से आने वाले राज्‍य के राजस्‍व में गिरावट लाएंगे। बंद के पीछे के बाकी दो मसले मुख्‍य चुनाव आयुक्‍त ज्ञानेश कुमार और राज्‍य के शिक्षा मंत्री नित्‍यानंद गोंड के इस्‍तीफे संबंधी मांग रही। राज्‍य के स्‍कूली और शिक्षा मंत्री गोंड के इस्‍तीफे की मांग स्‍‍कूली किताबों में कथित गड़बड़ियों और शिक्षा पर पड़ने वाले उसके व्‍यापक प्रभावों के चलते की जा रही है।

राज्‍य में जारी जन आंदोलनों से सबक लेते हुए इंडिया गठबंधन ने जल, जंगल, जमीन, आदिवासियों के अधिकारों और खदानकर्मियों व स्‍थानीय समुदायों की आजीविकाओं की सुरक्षा के बारे में भी चिंता जताई है। वनाधिकार कानून को बने बीस साल हो गए हैं, लेकिन ओडिशा के अधिकतर जिलों के प्रशासन ने अपने गांवों में इसके क्रियान्‍वयन की दिशा में अब तक ठोस कदम नहीं उठाए हैं। इस लिहाज से विपक्षी दलों में आई यह नई जागरूकता स्‍वागतयोग्‍य मानी जानी चाहिए।   



दूसरी ओर, ओडिशा में खनन के हितों से जुड़ी ताकतें इन आवाजों से अपने कान बंद किए हुए हैं या फिर वे जानती हैं कि किसी भी बदलाव से उनका कुछ नहीं बिगड़ने वाला, इसलिए वे हमेशा की तरह अपने धंधे में व्‍यस्‍त हैं। रायगड़ा और कालाहांडी जिले में फैली सिजीमाली की पहाड़ियों में असंख्‍य पेड़ गिराये जा चुके हैं, जिनमें साल के पेड़ भी हैं। प्रस्‍तावित सिजीमाली बॉक्‍साइट खनन परियोजना के खिलाफ जनप्रतिरोध के प्रमुख केंद्र कंटामाल गांव में पुलिस लगातार डेरा डाले हुए है। उसने गांववालों को आवाजाही की आजादी और स्‍वायत्तता से महरूम कर डाला है। 

सगाबाड़ी गांव की एक प्रमुख आदिवासी कार्यकर्ता नारंगी देई माझी उन जगहों पर होकर आई हैं जहां काटे गए साल के पेड़ों के गट्ठर बनाकर रखा गया है। उनके साथ मां माटी सुरक्षा मंच के सदस्‍य भी वहां गए थे। यही मंच वेदांता कंपनी की सिजीमाली बॉक्‍साइट खनन परियोजना के खिलाफ आंदोलन का नेतृत्‍व फरवरी 2023 में एमओयू होने के बाद से लगातार कर रहा है। यह विवादित परियोजना क्षेत्र रायगड़ा जिले के काशीपुर ब्‍लॉक और कालाहांडी जिले के थुआमल रामपुर ब्‍लॉक दोनों को अपनी जद में लेता है।

विपक्षी दलों के बंद के ठीक बाद 9 अक्‍टूबर को माझी ने इस लेखक से बात की थी। उनका कहना था, ‘कम से कम तीस ट्रैक्‍टर सारगी के पेड़ लादकर निकले हैं। हम लोग नहीं जानते कि यह सरकार के किसी आदेश से हो रहा है या कंपनी के दलाल कर रहे हैं। हम लोग तो अपनी जमीन, मिट्टी, जंगल और झरने बचाने के लिए लड़ रहे हैं। इन्‍हीं जंगलों और पहाड़ों को बचाने के लिए मैंने पिछले साल रायगड़ा की जेल में आठ महीने काटे। अपनी जमीन को बचाना कोई अपराध है? या आदिवासी इलाके में पेड़ काटना अपराध? असली अपराधी कौन है?’’    

साल के पेड़ों को उड़िया में सारगी कहते हैं। आदिवासी लोग इसे पवित्र मानते हैं। इन पेड़ों का सांस्‍कृतिक महत्त्व यहां बहुत है। आर्थिक‍ महत्त्व इसकी लकड़ी का है जिसका इस्‍तेमाल फर्नीचर बनाने और निर्माण कार्य में होता है, लेकिन आदिवासियों के जीवन में इन पेड़ों की अहमियत आर्थिक मूल्‍य से कहीं ज्‍यादा है। उनके पवित्र जंगल उनके देवताओं, पुरखों और रूहों के निवास स्‍थल माने जाते हैं। ये जगहें पवित्र हैं, उनकी सामूहिक स्‍मृति का अंग हैं और वनों की पारिस्थितिकी का एक अनिवार्य तत्त्व हैं जो आदिवासी समुदाय के जीवन, आस्‍था और परंपराओं के साथ नत्‍थी है।

साल के जंगलों का पारिस्थितिकीय महत्त्व भी बहुत ज्‍यादा है। यहां के बायोमास और मिट्टी में भारी मात्रा में कार्बन अवशोषित रहता है। साल के पेड़ धीरे-धीरे बड़े होते हैं, टिकाऊ होते हैं और पानी का इन पर असर नहीं होता जिसके चलते ये बहुत धीरे-धीरे खराब भी होते हैं। इस वजह से लंबे समय तक इनके भीतर कार्बन जमा रहता है। पेड़ से जो पत्ते गिरते हैं वे मिट्टी को और जैविकता प्रदान करते हैं जिससे मिट्टी अपने भीतर नमी को बनाए रखने में सक्षम होती है और पोषक तत्त्वों के पुनर्चक्रण में सहयोग करती है। इसके अलावा, पेड़ों की सघनता यहां के तापमान को सौम्‍य बनाए रखती है जिससे चरम गर्मी में भी जलवायु शीतल बनी रहती है।  


Narangi Dei Majhi, an activist of anti-mining movement
नारंगी देई माझी : जहां काटे गए साल के पेड़ों के गट्ठर बनाकर रखा गया है

नारंगी देई का सवाल वाजिब है, कि पेड़ों को काटे जाने के पीछे आखिर किसका हाथ है, जबकि अब तक वनों की कटाई को अंतिम मंजूरी ही नहीं मिली है। वेदांता लिमिटेड को दिसंबर 2025 में पहले चरण की (सैद्धांतिक) मंजूरी मिली थी। गांववाले चिंतित हैं कि उनके आंदोलन को भड़काने के लिए कहीं कोई तीसरा यहां आकर तो पे़ड़ नहीं काट रहा!

इससे भी बड़ा सवाल यह है कि जमीन और जंगल की रक्षा में यहां के आदिवासियों का सच्‍चा साथी कौन है। यह सवाल पहले से कहीं ज्‍यादा अहम हो गया है क्‍योंकि इस राज्‍य में ताकतवर संस्‍थाएं खनन और औद्योगीकरण के लक्ष्‍य पूरे करने के लिए निजी ताकतों के साथ मिलकर काम कर रही हैं। इसलिए यह सवाल सीधे पूछा जा सकता है, कि भले ही इंडिया ब्‍लॉक आज एमएमडीआर संशोधनों को वापस लेने के लिए रैली कर रहा है लेकिन उसके घटक दल जमीनों, देवताओं और आजीविकाओं की सुरक्षा के लिए लोगों की पुकार को वास्‍तव में सुन पा रहे हैं क्‍या?

अपने वजूद की इस लड़ाई में यहां के लोगों को जिस संकट से गुजरना पड़ रहा है, उसका अंदाजा तलाआमपदर और कंटामाल के नीचे दिए जा रहे दो विस्‍तृत वृत्तान्‍तों से लगाया जा सकता है। कंटामाल में भारी संख्‍या में जुटे लोगों को संबोधित करते हुए माझीगांव के मूर्ति माझी जब प्रासंगिक मुद्दों को उनके समक्ष रखते हैं तो वे अपने के लोगों के सामूहिक विवेक को आवाज दे रहे होते हैं:

हम लोगों ने अपने बचपन में ऐसी कहानियां सुन रखी थीं, लेकिन कभी कल्‍पना नहीं की थी कि राज्‍य की पुलिस सीधे आदिवासी गांवों में घुस आएगी और इतना बर्बर आतंक मचाएगी। बीते तीन से चार दिन के दौरान पुलिसवाले यहां आए, उन्‍होंने अपने शिविर लगाए और हमारी जमीनों पर कब्‍जा कर लिया। उनका दावा है कि वे हमें यहां ‘सुरक्षा’ देने आए हैं। हमारे लोग केरल और आंध्र प्रदेश में मजदूरी करने जाते हैं, अपना खून पसीना बहाते हैं और वहीं चुपचाप मर जाते हैं। महज खाने के एक निवाले के लिए, कपड़े के लिए और आजीविका के लिए हमारे लोग अकल्‍पनीय संकटों को झेलते हुए मर जाते हैं। फिर जब हम इंसाफ की आवाज उठाते हैं तो नेता, मंत्री, कलक्‍टर और मजिस्‍ट्रेट सब कहां गायब हो जाते हैं? ये सब लोग खनिजों की खदानों और कॉरपोरेट की लूट के चक्‍कर में आज आपस में साठगांठ कर बैठे हैं। आदिवासियों, हरिजनों और दलितों के जल, जंगल, जमीन, फलों, जड़ों को नष्‍ट करने के लिए इन्‍होंने बेरहम पुलिसबल को कंटामाल की ‘सुरक्षा’ के नाम पर हमें घेर कर के बंद कर दिया है ताकि ये हमारा शोषण कर सकें! हम लोगों ने मुख्‍यमंत्री मोहन चरण माझी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को क्‍या इसी के लिए वोट दिया था? इसलिए कि वे हमें कुचल सकें? यह अत्‍याचार हम नहीं सहेंगे। हमारी आत्‍मा ही इसे स्‍वीकार नहीं कर सकती। ये लोग पीढ़ी दर पीढ़ी जनता के पैसे को भूखे जानवरों की तरह उड़ाते रहे हैं। केवल इसलिए कि वे सरकारी वर्दी पहनते हैं या लाख रुपये की तनवाह पाते हैं, उन्‍हें लगता है कि वे इतनी आसानी से यहां आकर हमें धमका ले जाएंगे? हम लोग धरतीपुत्र हैं, इसी मिट्टी की पैदाइश हैं। अपनी मां को कैसे छोड़ सकते हैं? हमारी धरती मां मर जाएगी तो उसके साथ हम भी मर जाएंगे। जो मां बच्‍चे को जन्‍म देती है वह भी उसे साल डेढ़ साल या दो साल ही दूध पिलाती है, फिर छोड़ देती है। वह बच्‍चा कहां बड़ा होता है? इसी धरती पर तो! अपनी मां की कोख में तो हम कुछ दिन ही रहते हैं। फिर हमारे मां-बाप बू़ढ़े होते हैं और मर जाते हैं। स्‍वर्ग चले जाते हैं। फिर भी धरती मां बच जाती है। वह हमें गले लगाती है, हमारी रक्षा करती है। हमें पानी देती है, हवा देती है, फल-फूल दती है, पेट भरती है और तन ढंकती है। इसीलिए धरती को हम अपनी सच्‍ची मां मानते हैं! हम अगर खत्‍म भी हो गए, जान चली गई, तब भी हम उन्‍हें अपने को लूटने का मौका नहीं देंगे। इसी तरह तो उन्‍होंने पूरे देश को बेचने की साजिश लगातार की है। अगर हमने अब आंख मूंद ली और कदम पीछे खींच लिया, तो वे लोग हमेशा हमें ऐसे ही डराते रहेंगे। इसलिए डरने की कोई जरूरत नहीं है। मौत आती है तो आने दो, पर हम लोग डर के मारे उसके आगे सिर नहीं झुकाएंगे!

कालाहांडी जिले के थुआमल रामपुर ब्‍लॉक में तलाआमपदर नाम का गांव है। इस साल मार्च की 10 तारीख की रात गांव के कुछ लोगों की एक कंपनी-समर्थक ग्रामीण के साथ कुछ झड़प हुई थी। झगड़ा बहुत ज्‍यादा बढ़ गया, जिसके बाद आधी रात को गांव में भारी पुलिसबल घुस आया।

पुलिस ने 21 आदिवासियों को उठा लिया। उनमें 11 औरतें  भी थीं। ज्‍यादातर औरतों को 44 दिन जेल में बिताना पड़ा जिसके बाद उन्‍हें जमानत मिल गई। फिर 10 जून को 11 पुरुषों को निचली अदालत से जमानत मिली। यह जमानत उन्‍हें अपने आप मिल गई थी क्‍योंकि पुलिस ने 90 दिनों के भीतर चार्जशीट दाखिल नहीं किया था, जो कि अनिवार्य होता है।

गांव के दौरे पर वहां के लोगों ने बताया कि कैसे इन गिरफ्तारियों के कारण उनका दैनिक काम प्रभावित हुआ है। उन्‍हें खेतीबाड़ी में दिक्‍कत आ रही है और दिहाड़ी मजदूरी भी नहीं मिल पा रही। मार्च में आतंक और सघन हुआ। पहली बार इस गांव में बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां हुईं। पहली बार इतनी भारी संख्‍या में यहां पुलिस आई। सिर पर ड्रोन उड़ रहे थे और सुबह नौ बजे से शाम चार बजे तक पूरे गांव को घेरे 20-25 बोलेरो वाहन लाइन से तैनात थे। मजदूरी पर असर पड़ा और लोगों का घर से निकलना बंद हो गया। आज भी लोग यहां सहमे हुए हैं।



एक गांववाले ने बताया कि गांव के दिसारी (पुरोहित) की गिरफ्तारी के बाद अगले तीन महीने तक सब लोग असुरक्षा में रहे। कई बच्‍चे-बूढ़े बीमार पड़ गए। जब स्‍कूलों में दाखिले का समय आया तो कई परिवार अपने बच्‍चों को दोबारा भर्ती नहीं करवा सके।

पुष्‍पा माझी इसी गांव की हैं जिन्‍हें गिरफ्तार किया गया था। अब वे जमानत पर बाहर हैं। उन्‍होंने बताया, ‘केवल हमारे परिवार को ही नहीं भुगतना पड़ा। पूरा गांव गहरे सदमे में था। हमारे पास जमीन है, फिर भी हमें रोज मजदूरी कर के अपने परिवारों का पेट भरना पड़ता है। उस समय घर के बाहर निकलने में ही इतना डर था क्‍योंकि एफआइआर में ‘’50 अन्‍य’’ दर्ज किया गया था। अब भवानीपटना की अदालत में सुनवाई चालू हो चुकी है लेकिन हम लोग वहां जा नहीं पा रहे। जाने को एक गाड़ी भाड़े पर लेंगे तो उसका तीन से चार हजार रुपया खर्चा आएगा। पहले तो हर परिवार गांव के कोष में सहयोग करता था, लेकिन आज किसी के पास अपना ही घर चलाने को पैसा नहीं है।‘

एक प्रवासी मजदूर हैं जिनकी पत्‍नी को गिरफ्तार किया गया था। वे बताते हैं, ‘आज हमारे लोग अदालत नहीं जा पा रहे और अपने परिवारों का पेट भी नहीं भर पा रहे। इस बीच आदमी लोग तो बहुत सदमे में रहे हैं। कुछ लोग केरल चले गए हैं दिहाड़ी करने ताकि परिवार का पेट पाल सकें। अदालत में हाजिर नहीं होने पर गिरफ्तारी का जोखिम उठाते हुए उन्‍होंने ऐसा किया। पर हमने कौन सा जुर्म किया है कि अदालत जाने के लिए हमें पैसा चुकाना पड़े? ये कानून और अदालत सब अमीर लोगों के लिए है। वे लोग हमें डरा धमका कर चुप कराने के लिए ऐसा कर रहे हैं। हम लोग अपना ही नहीं कमा पा रहे, तो अदालत का खर्चा कहां से निकलेगा?’

वे कहते हैं, ‘पुलिस किसी भी वक्‍त यहां आ जाती है क्‍योंकि कुछ परिवार ऐसे हैं जो कंपनी के साथ हैं। हो सकता है उन्‍हें पैसा मिला हो। हम नहीं जानते। हमें बस इतना पता है कि हम लोग आदिवासी हैं और हमें अपनी जमीन के लिए लड़ना है। वो तो जब दलाल और एजेंट लोग कुछ गांववालों को अपने पाले में कर लेते हैं तभी पुलिस की हिम्‍मत गांव में घुसने की होती है।‘

जो समुदाय अपना पेट भरने भर के लिए स्‍वावलंबी हो, उसके लिए अदालती खर्चा और अदालत जाने तक का खर्चा उठा पाना बहुत बड़ी बात होती है। अब पुलिस वापस कंटामाल गांव में जाकर डेरा डाल चुकी है, तो लोगों की काम संबंधी योजनाओं पर फिर से असर पड़ने लगा है। मार्च की गिरफ्तारियों और मुकदमों के सदमे से ही वे अभी उबर नहीं पाए हैं।

तलाआमपदर के ग्रामीणों को अपनी जमीन और जंगल जाने का अहसास बड़े डरावने रूप में हुआ है। इसीलिए उन्होंने 24 जुलाई को ग्रामसभा आयोजित की थी, जो वनाधिकार कानून के तहत एक अनिवार्य प्रक्रिया है। उस ग्रामसभा में गांववालों ने एक वनाधिकार कमेटी का गठन किया। यह कमेटी लोगों के निजी वनाधिकार दावों, सामुदायिक वनाधिकार दावों और सामुदायिक वन संसाधन दावों को दाखिल कराने की प्रक्रिया शुरू करेगी। ग्रामसभा में एक स्‍वर से यह संकल्‍प लिया गया कि सिजीमाली पहाड़ में प्रस्‍तावित खनन गांवों के लिए घातक साबित होगा, इसलिए ग्रामसभा ने गांव की चिंताओं को जिला प्रशासन व राज्‍य प्रशासन तक पहुंचाने के लिए प्रतिनिधि नियुक्‍त किए। ये प्रतिनिधि गांववालों की ओर से याचिकाएं दायर करेंगे और सिजीमाली को खनन से बचाने के लए कानूनी कार्रवाई करेंगे।

छह माह पहले कंटामाल गांव के ऊपर पुलिस का जबरदस्‍त और बर्बर दमन हुआ था। कंटामाल रायगड़ा जिले के काशीपुर ब्‍लॉक में है। यहां भारी संख्‍या में पुलिसबल और सादे कपड़े में आए लोगों ने आधी रात को आदिवासियों के ऊपर आंसू गैस के गोले दागे, डंडों और चाकू से हमला किया और भोर में निकलने से पहले उन पर गोली चलाई।

यह घटना जैसे ही सुर्खियों में आई, लोगों ने विरोध प्रदर्शन, बयानों और पदयात्राओं के माध्‍यम से अप्रत्‍याशित एकजुटता दर्शायी और सिजीमाली की यात्रा की। इससे घटना को मीडिया में बहुत कवरेज मिली। मुख्‍यधारा के राजनीतिक दल जैसे कांग्रेस, बीजद और यहां तक कि भाजपा को भी इलाके का दौरा करना पड़ा। नेशनल यूथ कांग्रेस ने मई में हफ्ते भर की पदयात्रा निकाली। आज भी हालांकि गांव में बहुत गहरी अशांति कायम है क्‍योंकि पुलिस गांव में लौट आई है और यहां उसने अपने कैम्‍प लगा लिए हैं।

दमन के दो महीनों के भीतर ही गांववालों ने 8 जुलाई को ग्रामसभा का आयोजन किया। उन्होंने कंटामाल के लिए वनाधिकार कमेटी बना ली। सभी मौजूद सदस्‍यों की मंजूरी से संकल्‍प लिया गया कि यह कमेटी निजी वनाधिकार, सामुदायिक वनाधिकार और वन संसाधनों पर अधिकार के सभी दावों को निपटाने का काम करेगी। बैठक में कंपनी और प्रशासन के कृत्‍यों की निंदा की गई जिन्‍होंने गांववालों के अंगूठे के फर्जी निशान और फर्जी दस्‍तखत के माध्‍यम से दिसंबर 2023 में फर्जी ग्रामसभा की रिपोर्ट तैयार की थी। गांववालों ने पुलिस के दबाव में करवायी गई फर्जी ग्रामसभाओं को अवैधानिक करार दिया।

मां माटी सुरक्षा मंच की अग्रणी सदस्‍य रूपा माझी ने कहा, ‘हमारी ग्रामसभा की बैठक ने साफ कर दिया है कि गांववालों और हमारे समुदाय के अधिकार क्‍या हैं और हमारी जमीनों, जानवरों, झरनों, पवित्र जंगलों और हमारे देवता तीज राजा के पवित्रस्‍थल पर हमारा अधिकार है। हम अब बस अपने दावे दाखिल करना चाहते हैं, इसी वजह से पुलिस को यहां दोबारा भेज दिया गया है। वे हमारी सहमति के बगैर कुटुम्‍ब घर (सामुदायिक भवन) में रह रहे हैं।‘


तेरह साल बाद नियमगिरि: अनिल अग्रवाल का नया ‘भरोसा’ बनाम आदिवासियों की प्राचीन आस्था


यहां के आदिवासियों और दलितों की दैनंदिन कार्रवाइयां 10 सितंबर के बाद और मुश्किल में पड़ गई हैं, जब नियमगिरि सुरक्षा समि‍ति के नेता लद सिकाका को गिरफ्तार किया गया। उनकी गिरफ्तारी के कुछ घंटे बाद ही पुलिस कंटामाल में घुस आई। गांव के ऊपरी हिस्‍से में स्थित सामुदायिक भवन पर उन्‍होंने महीने भर से ज्‍यादा वक्‍त से कब्‍जा कर रखा है।

पुलिस दो औरतों को सुरक्षा मुहैया करवाने के नाम पर इस गांव में घुसी थी। इन दो औरतों ने पुलिस में एफआइआर दर्ज करवायी थी कि गांव में उनकी जान और आजादी को खतरा है। इनमें से एक औरत बहुत हाल तक आंदोलन का अग्रणी चेहरा रही थी, उसने एक स्‍थानीय समाचार चैनल पर कहा है कि उसे गांव में रहने से डर लगता है। उसने जैसे ही कंपनी के हक में पाला बदला, उसका बहाना लेकर पुलिस गांव में घुस गई।

इस महिला ने 9 अक्‍टूबर को इस लेखक के साथ एक साक्षात्‍कार में कहा कि उसके बाद से उसकी स्थिति कमजोर है। उसने जो भी किया वह पुलिस के दबाव में था और उसे एक और महिला कार्यकर्ता ने उसके लिए राजी किया था जो कंपनी के पाले में चली गई थी। इस घटना से ऐसा लगता है कि इतने बरसों तक आपसी सौहार्द और एकजुटता के साथ रह रहे लोगों को तोड़ना और उनमें संदेह के आधार पर फूट डालना कंपनी की रणनीति का हिस्‍सा बन चुका है। मार्च में तलाआमपदर में जो घटना हुई थी और बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां हुई थीं, उसके पीछे एक कंपनी-समर्थक ग्रामीण द्वारा करवायी गई एफआइआर ही थी।

कुटुम्‍ब घर पर पुलिस का कब्‍जा पांचवीं अनुसूची के क्षेत्र में रहने वाले लोगों की स्‍वायत्तता और स्‍वशासन के विधायी अधिकारों को मिली सुरक्षा का खुल्‍लमखुल्‍ला उल्‍लंघन है। पांचवीं अनुसूची के किसी क्षेत्र में पेसा कानून, 1996 लागू होता है जो आदिवासियों को उनके स्‍वशासन का अधिकार देता है, जबकि भारतीय संविधान का अनुच्‍छेद 244(1) वहां के राजकाज से ताल्‍लुक रखता है। ये संवैधानिक और वैधानिक प्रावधान आदिवासियों की प्रथाओं, सांस्‍कृतिक पहचान, सामुदायिक संसाधनों और निर्णय-सम्‍बंधी परंपरागत आचार को सुरक्षित करने की अहमियत को मान्‍यता देते हैं। समुदाय को संविधान के तहत मूलभूत अधिकार भी मिले हुए हैं, खासकर अनुच्‍छेद 19, जो शांतिपूर्ण ढंग से एकत्रित होकर सभा करने, संघ बनाने और मुक्‍त आवाजाही करने से संबंधित है और जिसके ऊपर कुछ तार्किक बंदिशें हैं। साथ ही अनुच्‍छेद 21 भी यहां लागू होता है तो जीवन और निजी स्‍वतंत्रता के अधिकार का संरक्षण करता है, जिसके दायरे में गरिमामय जीवन और निजता का संरक्षण शामिल है।

कुटुम्‍ब घर समुदाय का अपना संसाधन है जिसका उपयोग परंपरागत धांगरा बास के लिए किया जाता है जब किशोर और अविवाहित युवा वहां देर शाम और रातें बिताते हैं। जन्‍म, विवाह और मरनी के मौकों पर दिन में उसका उपयोग होता है जब अनुष्‍ठान के दौरान वहां खाना पकाया जाता है। गांव में रहने वाले कोंध और डोम समुदाय के जीवन से जुड़े कर्मकांडों को वहीं निपटाया जाता है। इसी सामुदायिक भवन का इस्‍तेमाल बच्‍चों की पढ़ाई, औरतों के स्‍व-सहायता समूह की बैठकों और बुजुर्गों व सामुदायिक नेतृत्‍व द्वारा विवाद निपटारों में किया जाता है। स्‍पष्‍ट है कि कुटुम्‍ब घर के ऊपर पुलिस का कब्‍जा सीधे तौर पर कंटामाल गांव के आदिवासी और मूलनिवासी समुदायों की प्रथाओं, परंपराओं, कर्मकांडों और अनुष्‍ठानों में दखल है।

इन्‍हीं अधिकारों के संबंध में एक चिट्ठी 12 सितंबर 2026 को वहां तैनात पुलिसकर्मियों को शांतिपूर्ण ढंग से दी गई। समुदाय का मानना है कि जिला प्रशासन की शह पर वहां थोपी गई पुलिस की तैनाती उनकी आजादी को बाधित कर रही है और असहमति के लोकतांत्रिक अधिकारों का इस्‍तेमाल करने से उन्‍हें रोक रही है जिससे वे अपने पुरखों के स्‍थल पर कब्‍जे का विरोध नहीं कर पा रहे हैं। वह जमीन उनके लिए पवित्र है और उनकी सामूहिक पहचान व अस्तित्‍व का अभिन्‍न अंग है।


Villagers gather to protest
गाँव की चौपाल पर इकट्ठा ग्रामीण
Poster of Maa Mati Mali Suraksha Manch
गिरफ्तार आंदोलन के नेताओं पर माँ माटी माली सुरक्षा मंच का पोस्टर

उस दिन 600 से ज्‍यादा ग्रामीण इकट्ठा हुए थे। उन्‍होंने पुलिसवालों से अपील की कि वे उनका गांव छोड़कर चले जाएं। अपील लिखित में सौंपी गई थी। उसमें लिखा था:

हमारा कंटामाल गांव पिछले तीन से आपके पुलिसबल के कब्‍जे में है। सभी गांववालों के बीच, खासकर औरतों, बुजुर्गों और बच्‍चों में डर और आतंक का वातावरण है। गिरफ्तारी के डर से बच्‍चों ने स्‍कूल जाना छोड़ दिया है। अगर कोई अचानक बीमार पड़ जाए तो हम लोग बाहर दवाई लेने नहीं जा सकते। गांववाले खेतीबाड़ी के काम से या मवेशियों को चराने के लिए बाहर नहीं जा सकते। औरतें और लड़कियां नित्‍यकर्म और नहाने-धोने के लिए बाहर निकलने से डर रही हैं। हमारे बच्‍चों के भविष्‍य और गांव में होने वाली किसी भी मौत के लिए पुलिस ही जिम्‍मेदार होगी।

पुलिस ने उन्‍हें बताया कि वे ऊपर से मिले आदेशों के कारण वहां पर हैं और वे तभी गांव खाली कर के जाएंगे जब उन्‍हें ऐसा करने का आदेश ऊपर से आएगा। उसके बाद से लोगों ने गांव के बीचोबीच स्थित गुड़ी घर में लंबी-लंबी बैठकें करना शुरू कर दी हैं। गुड़ी गांव की चौपाल जैसी है जिसे पवित्र स्‍थल माना जाता है। गांव के लोग यहीं बैठकें करते हैं। इन बैठकों में आसपास के गांवों के लोग भी आ रहे हैं और वे सिजीमाली को, अपने पुरखों की जमीनों और पवित्र देवताओं को बचाने की कसमें खा रहे हैं।

गुड़ी में 12 सितंबर को हुई बैठक में संगाबाड़ी की नारंगी देई ने ये बातें कहीं थीं:

हम लोग यहां पर क्‍यों इकट्ठा हुए हैं? यह ऐसी बात है जो सबको जानना और समझना चाहिए। पुलिस प्रशासन हमारे कंटामाल गांव में आकर क्‍यों जम गया है? हमारे मां बाप आतंक के साये में जी रहे हैं। वे लोग निवृत्त होने के लिए भी बाहर नहीं जा सकते, नहा नहीं सकते, लकड़ी या पत्ते जुटाने के लिए भी घर से बाहर कदम नहीं रख सकते। आखिर किसके आदेश पर पुलिसवाले हमारी जमीनों पर कब्‍जा कर के यहां तीन दिनों से डेरा डाले हुए हैं? हमें वे लोग कोई आधिकारिक कागजात या सुबूत दिखाने से इनकार क्‍यों कर रहे हैं? हम लोगों ने तो उनसे विनती कर के जवाब मांगा था, फिर भी वे नहीं दिखा रहे। इस अत्‍याचार के चलते वे मां बाप बहुत बेचैन हैं जो अपने बच्‍चों को अपने से दूर नहीं जाने दे रहे। भीषण बारिश और जमाने वाली नमी में घने जंगलों में वे दिन रात रहने को मजबूर हैं। खुद अपने घर के भीतर रहने में भी उन्‍हें डर लग रहा है। आगे आकर हमें जवाब दो! हमारे सवालों के जवाब दो, अपनी मां-बहनों से आंख मिलाकर सामने खड़े हो और बोलो!

यहां के लोग अच्‍छे से जानते हैं कि इनका भविष्‍य यहां की धरती और मिट्टी के साथ अभिन्‍न रूप से जुड़ा हुआ है। ये बस इंतजार कर रहे हैं कि सभी को इस बात का अहसास हो जाए, और खासकर विपक्षी दलों को, कि जंगल और पानी में रहने वाले सभी जीव-जन्‍तु, चाहे इंसान हों या गैर, आपस में जुड़े हुए हैं। इसीलिए कानून में संशोधन के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों को अपना दायरा बढ़ाना होगा ताकि और गहरी चर्चाओं को जगह दी जा सके; ताकि ओडिशा के सभी लोगों, जमीन और पारिस्थितिकी की बेहतरी के प्रति सच्‍ची दीर्घकालीन प्रतिबद्धता दिखलायी जा सके।



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