Behmai police check post that was established post massacre in 1981

बेहमई : इंसाफ या 43 साल के शोक का हास्‍यास्‍पद अंत?

पचहत्‍तर साल के लोकतंत्र में तैंतालीस साल पुराने एक मुकदमे में एक फैसला आया है। मुकदमे में दोनों पक्ष के ज्‍यादातर लोग सिधार चुके हैं। कानपुर के पास बेहमई गांव में बीस लोगों की सामूहिक हत्‍या के आरोप में जिस इकलौते शख्‍स को सजा हुई, वह अस्‍सी साल का है। तीन पीढ़ियां जब अपने पितरों का शोक मनाते गुजर चुकी हैं, तो न्‍याय ऐसा मिला है जिसके जोर से एक पतंग भी न उड़ पाए। कोर्ट ऑर्डर की प्रति भी यहां पहुंचेगी कि नहीं, शक है क्‍योंकि इस गांव में एक अदद सड़क नहीं है। बेहमई से लौटकर नीतू सिंह की फॉलो-अप रिपोर्ट

राम घर आ रहे हैं, कौशल्या फुटपाथ पर हैं! पुरुषोत्तम और जगन्नाथ भी…

यह सच है कि अठारह सौ करोड़ की लागत से बन रहा राम मंदिर, तीस हजार करोड़ की लागत से हो रहा अयोध्‍या का विकास और अपेक्षित तीन लाख श्रद्धालुओं के भारी-भरकम आंकड़े से यहां के रेहड़ी-पटरी वालों और दुकानदारों का काम-धंधा बढ़ेगा। यह भी सच है कि राम मंदिर के कारण अपनी रोजी-रोटी कमा पा रहे लोग मंदिर बनने से खुश हैं। इसके बाद तीसरा सच भी कुबूल कर ही लेना चाहिए- कि हजारों लोगों से उनकी दुकानें छिन गई हैं और जब धंधा बढ़ने का मौका आया है ठीक तभी वे फुटपाथ पर डाल दिए गए हैं। अयोध्‍या से नीतू सिंह की फॉलो-अप रिपोर्ट

तीन साल बाद भूलगढ़ी: हाथरस की वह घटना, जिसने लोकतंत्र को नाकाम कर दिया

आज हाथरस गैंगरेप कांड को तीन साल हो गए। तकनीकी रूप से साबित किया जा चुका है कि यह रेप कांड नहीं था। हत्‍या की मंशा भी नहीं थी। केवल एक आदमी जेल में है, तीन बाहर। परिवार कहीं ज्‍यादा सघन कैद में, जिसका घर सीआरपीएफ की छावनी बन चुका है। गांव से बाहर निकलने की छटपटाहट अदालतों में नाकाम हो चुकी है, हाथरस से शुरू हुई बंटवारे की राजनीति कामयाब। एक जीता-जागता गांव कैसे तीन साल में मरघट बन गया, बता रही हैं गौरव गुलमोहर के साथ भूलगढ़ी से लौटकर नीतू सिंह इस फॉलो-अप स्‍टोरी में