राम घर आ रहे हैं, कौशल्या फुटपाथ पर हैं! पुरुषोत्तम और जगन्नाथ भी…

यह सच है कि अठारह सौ करोड़ की लागत से बन रहा राम मंदिर, तीस हजार करोड़ की लागत से हो रहा अयोध्‍या का विकास और अपेक्षित तीन लाख श्रद्धालुओं के भारी-भरकम आंकड़े से यहां के रेहड़ी-पटरी वालों और दुकानदारों का काम-धंधा बढ़ेगा। यह भी सच है कि राम मंदिर के कारण अपनी रोजी-रोटी कमा पा रहे लोग मंदिर बनने से खुश हैं। इसके बाद तीसरा सच भी कुबूल कर ही लेना चाहिए- कि हजारों लोगों से उनकी दुकानें छिन गई हैं और जब धंधा बढ़ने का मौका आया है ठीक तभी वे फुटपाथ पर डाल दिए गए हैं। अयोध्‍या से नीतू सिंह की फॉलो-अप रिपोर्ट

एक साल पहले की बात है जब 23 नवंबर 2022 को शाम साढ़े सात बजे से सुबह साढ़े चार बजे तक रामजन्मभूमि वापसी मार्ग के निकट अमावा राम मन्दिर के पास गुलैला मार्केट की 32 लोगों दुकानों पर बुलडोजर चलता रहा। रात भर चले कहर ने सब ढहा दिया गया। नष्‍ट की गई कुल 32 में से 16 का सामान रामकथा संग्रहालय में ले जाकर रख दिया गया था।

उस रात पचास साल की कौशल्या के बगल में 34 वर्षीय पुरुषोत्तम भी अपनी दुकान लगाए हुए थे। वे बताते हैं, ‘जब हम अपनी दुकानें बंद करके घर चले गए तब बुलडोजर से हमारी दुकानें तोड़ी गईं। हमें पहले से सूचना नहीं थी। अगर पहले से पता होता तो हम अपनी दुकान का सामान सुरक्षित रख सकते थे। हमारे सामान को उल्टा-सीधा तरीके से राम कथा संग्रहालय में रख दिया गया था। हम 15 दिन बाद अपना सामान उठाने गए थे।



आज हांड़ कंपाती ठंड में लवकुश मन्दिर के पास एक कतार में एक दर्जन से ज्यादा दुकानदार फुटपाथ पर अपनी दुकान इस आशंका में लगाए बैठे हैं कि उन्हें किसी भी वक्‍त वहां से हटाया जा सकता है। इन्‍हीं के बीच मौजूद कौशल्‍या और पुरुषोत्‍तम दोनों को नहीं पता कब उन्‍हें वहां से उजाड़ दिया जाएगा। भगवान राम की प्राण-प्रति‍ष्‍ठा ने कौशल्‍या से लेकर पुरुषोत्‍तम और जगन्‍नाथ तक, किसी को नहीं बख्‍शा है।  

आगामी 22 जनवरी के भव्‍य आयोजन के लिए यहां जो बदलाव किए गए हैं, उसने अयोध्‍या की आबादी को कुछ ऐसे गहरे घाव दे दिए हैं जो सरकारी चकाचौंध में बमुश्किल ही दर्ज हो पा रहे हैं।

रामायण में कौशल्‍या राम की मां थीं। कभी उन्‍हें राम के वनवास से आघात लगा था। आज वे राम के आने पर डरी-सहमी सी हैं। कौशल्‍या कहती हैं, ‘हर सुबह चिंता रहती है कि आज यहां दुकान लगाने को मिलेगा या नहीं। कभी पुलिस तो कभी परिवर्तन दल वाले आकर दुकान हटा देते हैं। जब से हमारी दुकान पर बुलडोजर चला है तब से हम ऐसे ही डर-डर के दुकान लगा रहे हैं। दुकान से ही पूरे घर का खर्चा चलता है। अगर दुकान ही नहीं रहेगी तो खर्चा कैसे चलेगा, यही सोच-सोच कर रात-रात भर नींद नहीं आती है।



दुकान कितने साल पुरानी थी? इस पर कौशल्या कहती हैं, “हम 25-30 साल से दुकान किराये पर सिक्युरिटी देकर लिए थे। हमसे कहा गया था कि दुकान के बदले दुकान मिलेगी, तो उनकी शर्तों वाले कागज पर हम दस्तखत कर दिए लेकिन अब उजाड़ दिए तो कह रहे हैं कि अब 20 से 25 लाख में दुकान मिलेगी और उसमें भी दुनिया भर की शर्तें हैं। हम गरीब आदमी कैसे इतनी महंगी दुकान ले पाएंगे?’  

पहले पुरुषोत्तम की दुकान रामलला के अस्थायी मंदिर से सटी हुई थी। इनकी दुकान में पीतल की मूर्तियां और पूजा का सामान मिलता था। अभी जिस जगह इन्हें दुकान आवंटित की गई है वह मुख्य मन्दिर से करीब दो किलोमीटर दूर टेढ़ी बाजार चौराहा के पास एक नए वाणिज्यिक केंद्र में है। पुरषोत्तम बताते हैं कि यहां चार फ्लोर में 214 दुकानें बनाई गई हैं, लेकिन सभी खाली हैं। इनकी कीमत 8 से 25 लाख रुपये के बीच है। इसे पुरुषोत्‍तम जैसे आम दुकानदार नहीं खरीद सकते। इसलिए वर्तमान में इस जगह को यात्री निवास बना दिया गया है।

सरकार की तरफ से आपको क्या मिला, इस पर पुरुषोत्तम कहते हैं, “दुकान छोटी टूटी हो या बड़ी सबको एक से डेढ़ लाख रुपये के बीच ही मुआवजा मिला था। मेरी दुकान 12 फुट चौड़ी और 10 फुट गहरी थी। मुझे भी एक लाख रूपया ही मिला था। हम लोगों से कहा गया था कि दुकान के बदले आपको दुकान मिलेगी, लेकिन तीन महीने बाद एक आवंटन पत्र थमा दिया गया जिसमें दुकान की कीमत 24 लाख रुपये थी। हम छोटे दुकानदार 24 लाख की दुकान कैसे ले सकते थे?



ऐसा नहीं है कि पुरुषोत्तम अयोध्या के विकास से खुश नहीं हैं, लेकिन उन्हें इस बात का बेहद कष्ट है कि उन्हें उजाड़कर विकास किया जा रहा है। सिर्फ उन्हें नहीं, उनके जैसे हजारों दुकानदारों को बीते एक-दो साल में इस विकास के चक्कर में उजाड़ा गया है। राम पथ, भक्ति पथ, जन्मभूमि पथ को बनाने और इसके चौड़ीकरण में 4,000 से ज्यादा दुकानें प्रभावित हुई हैं। वहीं 1600 दुकानदारों को विस्थापित कर दिया गया है।

इन्‍हीं में एक हैं प्रदीप प्रजापति, जो यहां तेजी से हो रहे विकास और लगातार बढ़ रही भीड़ को लेकर कहते हैं, ‘एक समय था कि इस महीने में हम दुकानदार बैठे रहते थे, बिक्री न के बराबर होती थी लेकिन अब भीड़ बढ़ी तो बिक्री बढ़ी। अब अफ़सोस इस बात का है कि हमारे पास अपनी दुकान नहीं बची। जब हम लोगों का कमाने खाने का समय आया तब हमें उजाड़कर फुटपाथ पर कर दिया गया1 दुकान के नाम पर हाथ में 21 लाख रुपये में एक दुकान का आवंटन पत्र थमा दिया गया। क्या एक दुकानदार इतनी महंगी दुकान ले सकता है, आप बताइए?

जिस दिन राम मंदिर का अदालती फैसला आया था उस दिन उनके जैसे लाखों लोगों में एक तरह का उत्साह और उल्लास था। प्रदीप बताते हैं, ‘जिस दिन राम जन्मभूमि का फैसला आया था मन में बहुत उमंग थी लेकिन आज बहुत तकलीफ में हैं। आज  मेरे दर्द को कोई सुनने समझने वाला नहीं है। सरकार से हमारा निवेदन है कि हमें दुकान की स्थाई व्यवस्था कराई जाए जिससे हम लोग अपने बच्चों का भरण-पोषण कर सकें। अगर स्थाई दुकान नहीं मिली तो हम लोग बेरोजगार हो जाएंगे।” यह कहते हुए प्रदीप भावुक हो गए।

हम जब अयोध्या गए थे उस वक्त चौबीसों घंटे तेज रफ्तार से हजारों की संख्या में मजदूर दिन-रात 22 जनवरी की तैयारियों में जुटे थे। पत्थरों को बड़ी शिद्दत से तराशकर उन्हें दीवारों पर लगाया जा रहा था। बड़ी-बड़ी स्ट्रीट लाइट और होर्डिंगें लगाकर मंदिर के सामने वाले हिस्से को 22 जनवरी के भव्य समारोह के लिए तैयार किया जा रहा था।



बुलडोजर, खुदाई करने वाली मशीनें और ड्रिलिंग मशीनें हर कोने में शोर कर रही थीं। प्रशासन की टीमें जगह-जगह हो रहे कार्यों का मुआयना कर रही थीं। दर्शनार्थी बड़े जोश में जयश्री राम के नारे लगा रहे थे। हर दुकान के शटर के ऊपर हनुमान, धनुष, तीर, गदा जैसी कलाकृतियां उकेरी गई थीं। हर दुकान का रंग और डिजाइन एक जैसी किया गया है ताकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में होने वाले राम मंदिर के ऐतिहासिक प्राण-प्रतिष्ठा समारोह की भव्यता में कहीं कोई कमी न रह जाए।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कह चुके हैं कि केंद्र और राज्य सरकार मिलकर अयोध्या में 30,000 करोड़ से भी ज़्यादा के डेवलपमेंट प्रोजेक्ट शुरू कर चुकी है। इन करोड़ों रुपयों का असर यहां के ढांचागत बदलाव में साफ तौर पर देखा जा सकता है। यहां के हाइवे, उन पर लाइटिंग, रेलवे स्टेशन, अंतरार्ष्ट्रीय हवाई अड्डा, चमचमाते होटल, सब कुछ एक अलग और नए रूप में दिख रहा है। इस विकास से यहां के लोगों को कितना लाभ मिलेगा या इनकी जिंदगी कितनी बदलेगी यह तो आने वाले कुछ साल बाद ही पता चलेगा, लेकिन फिलहाल तो स्थिति सबकी नाजुक है।



विकास के दावों के बीच जगन्‍नाथ भी अपनी दुकान गंवा चुके हैं और मजबूरी में बेटे की दुकान पर बैठे हैं। पचास वर्षीय जगन्नाथ यादव कहते हैं, ‘ये मेरे बेटे की दुकान है। उसके साथ आए दिन झगड़ा होता है। मेरी दुकान पर एक साल पहले बुलडोजर चल गया। अब मजबूरी में बेटे वाली दुकान पर बैठना पड़ रहा है। पहले कहा गया था कि दुकान खाली कर दीजिए, आपको दुकान के बदले नई दुकान बन रही है वो मिल जाएगी। अब उसके लाखों रुपये मांगे जा रहे हैं। आवंटन का जो समय था वह भी निकल गया क्योंकि हम इतना लोन ही पास नहीं करवा पाए।

जगन्नाथ कहते हैं, “बीसों साल दुकान का ही कारोबार रहा, दूसरा कुछ आता नहीं। दुकान नहीं होगी तो खर्चा कैसे चलेगा। ऐसे में आत्महत्या के अलावा दूसरा कोई चारा कहां बच रहा है। मन्दिर बनने से हम सरकार से चार गुना ज्यादा खुश हैं लेकिन जहां व्यापार की बात आती है वहां हम बहुत दुखी हैं।



राम मंदिर बनने से खुश पचास साल की आशा देवी फुटपाथ पर आ चुकी हैं। उनके पति विकलांग हैं। इनकी कुछ साल पहले दुकान उजाड़ दी गई थी। अब ये फुटपाथ पर ही पूजा की सामग्री बेचती हैं। सुनवाई के लिए उनके पास भी कोई नहीं। वे कहती हैं, ‘मन्दिर बनने से कौन खुश नहीं होगा? पर हमें हमारी दुकान मिल जाए तो हमारी खुशी दोगुनी हो जाएगी। वैसे, गरीब आदमी की सुनवाई ही कहां होती है?

यही हाल सुनील कुमार पाण्डेय का है। इनकी दो दुकानें राम मन्दिर पर फैसला आने के कुछ महीने बाद तोड़ दी गई थीं। सुनील कहते हैं, ‘अभी जहां हम दुकान लगाए हैं, वहां हमारे पीछे दुकानें बन रही हैं जो फरवरी में बनकर तैयार हो जाएंगी। जब ये दुकानें बन जाएंगी तो हम इन दुकानों के बाहर फुटपाथ पर कैसे अपनी दुकान लगा पाएंगे? अब हमारी रोजी-रोटी सरकार के हाथ में है। हमें जहां दुकान आवंटित की गई है वह मन्दिर से लगभग 2 किलोमीटर दूर है और उसकी कीमत 24 लाख रुपये है। दुकान के लिए हम 24 लाख का लोन लेंगे तो उसे अदा करने में ही हमारी पुश्तें निकल जाएंगी।” 

अयोध्‍या के मूल व्यवसायी 90 फीसदी किरायेदार हैं। जो 50 साल से ज्यादा समय से रह रहे हैं वे पुराने वैधानिक किरदार हैं। वे बरसों से सिक्योरिटी देकर रहते आए हैं। जब इन दुकानों को उजाड़ने की बात चल रही थी तब प्रशासन ने कहा था कि 40 प्रतिशत किरायेदार और 60 प्रतिशत जमीन मालिक को मिलेगा, लेकिन बाद में जमीन मालिक और मकान मालिक को सारा मुआवजा दे दिया गया। जिन दुकानदारों को उजाड़ा गया उनमें से 90 फीसदी को एक से डेढ़ लाख मुआवजा मिला। मंदिर के पास प्राइम लोकेशन पर स्थित दुकानों में 50 लाख रुपये की सिक्योरिटी मनी मांगी जा रही है।


एक स्थानीय दुकानदार को आवंटित दुकान का नोटिस

अयोध्या में राम जन्मभूमि को जाने वाली तीन मुख्य सड़कों- रामपथ, जन्मभूमि पथ और भक्तिपथ को चौड़ा करने में दुकानदारों को उजाड़े जाने का अयोध्या व्यापार मंडल ने अपने स्‍तर पर विरोध किया है। व्यापार मंडल के अध्यक्ष नंद कुमार गुप्ता बताते हैं, ‘अभी तक जितना विकास हुआ है उसमें 25 प्रतिशत व्यापारी विस्थापित हो चुके हैं। अगर मन्दिर के नाम 2024 का चुनाव वे जीतते हैं तो 50 प्रतिशत और विस्थापित हो जाएंगे। हम दो साल से दुकानदारों के हक में आंदोलन कर रहे हैं। हमारे ऊपर लगातार मुकदमे किए गए, प्रहार किया गया, सैकड़ों बार हाउस अरेस्ट किया गया। इन सब के बावजूद हम दुकानदारों को उनका हक नहीं दिलवा सके।

समाजवादी पार्टी से जुड़े गुप्ता का दावा है कि सरकार ने जिस तरह से विकास की रणनीति बनाई है अगर उसका क्रियान्वयन कर दिया गया तो आधे से ज्यादा अयोध्या और फैजाबाद खत्‍म हो जाएगा। वे कहते हैं, ‘अयोध्या एक किनारे पर बसी है और तीनो किनारों पर नदियां हैं। सरयू नदी का नेचर है कि वह आगे की तरफ बढ़ती है। पचास साल पहले जहां सरयू बहती थी उसे डूब क्षेत्र घोषित कर दिया गया है। अगर सरकार इसे क्रियान्वित कर देती है तो अयोध्या और फैजाबाद की आधी आबादी उजड़ जाएगी।



नंदू गुप्ता कहते हैं, ‘आज जहां उत्सव मन रहा है यह 40 हजार की आबादी वाला छोटा सा गांव था। दो साल में 100 से 150 तक मन्दिर तोड़े जा चुके हैं। सैकड़ों की संख्या में मकान, हजारों की संख्या में दुकानें उजाड़ी जा चुकी हैं। 25 से 30 प्रतिशत लोग शहर छोड़कर बाहर जा चुके हैं। सरकारी जमीन तो छोड़िए खुद की जमीन से भी लोगों को हटाया जा रहा है। अयोध्या में त्राहि‍माम मचा हुआ है। यहां अघोषित कर्फ्यू जैसा लगा हुआ है।

नंदू कहते हैं, “यहां के लोगों ने जीवन भर कर्फ्यू और आंदोलन झेले हैं जिस वजह से इनके सारे मेले चौपट हो गए। आज जब कमाने खाने का मौका आया, तो सरकार गुजरात और दिल्ली वालों को लेकर आ गई। अब यहां की दुकानें इतनी बड़ी हो गई हैं कि इसे बड़े-बड़े अदाणी और अम्बानी ही खरीद सकते हैं। आम आदमी की पहुंच से ये बाहर हो गई हैं।

जो सड़कें पहले मात्र बीस फीट चौड़ी हुआ करती थीं अब उन सड़कों को 45 फीट तक चौड़ा किया गया है। इसी वजह से सैकड़ों मकान और दुकानें तोड़ी गई हैं। व्यापार मंडल से जुड़े शक्ति जायसवाल कहते हैं, ‘यहां चिराग तले अंधेरा है। जो चकाचौंध आप देख रहे हैं वो यहां के स्थानीय निवासी और व्यापारी के वजूद को ख़त्म कर के हो रही है। जिन्होंने बरसों राम मन्दिर आंदोलन के लिए संघर्ष किया उनके लिए ऐसा कुछ नहीं किया गया जिससे उनका मन गदगद हो जाता और वो सरकार की जय-जयकार करते।


शांति देवी बरसों से सड़क पर पान बेच रही हैं। दुकान तो बच गई है लेकिन मन में उजड़ने का डर समा गया है

उनकी दुकान सिंघार हाट पर है। यह प्राइम लोकेशन है। इसके लिए 20 से 30 लाख रुपये पगड़ी देनी पड़ती है। उनके मुताबिक जब यहां के दुकनदारों को उजाड़ा गया तब उन्हें मात्र एक लाख रुपये की सहायता राशि दी गई। वह मुआवजा नहीं था।

जायसवाल कहते हैं, ‘किससे कहा जाए? कोई सुनने वाला नहीं है। इस चौड़ीकरण में जो 5,000 लोग उजाड़े गए हैं उन्हें फिर से बसाया जाए। सरकार तानाशही पर उतारू है। अब 2024 का चुनाव राम मन्दिर पर ही लड़ना है इसलिए धर्म और राजनीति का ऐसा कॉकटेल बनाया गया है कि सिर्फ धर्म की बात करिए, जरूरी मुद्दों को भूल जाइए।


रामलला के स्वागत से पहले उनकी अयोध्या उजड़ रही है, उनकी प्रजा उखड़ रही है…


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