प्रतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय सचिव विनीत तिवारी ने पिछले दिनों फ़लस्तीन की यात्रा की। उन्होंने अपना समय फ़लस्तीन के वेस्ट बैंक के शहरों और गांवों में गुजारा। वे बेथलेहम, जेरूसलम, जेरिको, नाबलूस, जबाबदह आदि जगहों पर गए और विद्यार्थियों, किसानों, कामगारों, आंदोलनकारी लोगों और अरबी बंजारे बेदुइनों से मिले। अपनी फ़लस्तीन यात्रा के अनुभव साझा करने के लिए वह लगातार पूरे देश में अलग-अलग शहरों और कस्बों में जा रहे हैं। इसी क्रम में उन्होंने बीते 9 मार्च को दिल्ली में एक आयोजन किया, जिसमें उन्होंने फ़लस्तीनी कलाकारों पर कुछ बात रखी।
फ़लस्तीन की जनता की आवाज को रंग, आकार और अभिव्यक्ति देने में फ़लस्तीनी कलाकारों का योगदान अनुपम है। किसी भी सभ्यता के जीवंत होने का प्रमाण यह नहीं है कि उस सभ्यता ने कितने युद्ध लड़े, कितने मुल्कों को जीता, बल्कि सभ्यता के जीवंत होने का प्रमाण यह है कि वहां की जनता ने अपनी कला और संस्कृति बचाये रखा और वहां के कलाकारों ने अपनी बात बिना डरे कही।
इस संदर्भ में तिवारी ने मलक मत्तार, नबील अनानी और इस्माइल शमूत के चित्र सबके बीच साझा किये। उन्होंने सुप्रसिद्ध फ़लस्तीनी लेखक नसार अब्राहम से अपनी मुलाकात का भी जिक्र किया। नसार अब्राहम की कहानी ‘जूते’ के कथानक पर बात हुई।

गाज़ा की ‘ग्वेर्निका‘
फ़लस्तीन में कलाकार होना खुद के अस्तित्व को खोजने की यात्रा पर निकल जाना है। फ़लस्तीन में कलाकार होना उस परचम को थामे रहना है जो वहां की जनता की उम्मीदों से धड़कता रहता है। फ़लस्तीन में कलाकार होना ध्वंस से कराहती मानवता के विश्वास को बचाये रखना है।
लन्दन में निर्वासित युवा चित्रकार मलक मत्तार की काले सफेद रंगों से बनी पेंटिंग ‘नो वर्ड्स‘ को ‘गाज़ा की ग्वेर्निका’ कहा गया है। अप्रैल 1937 में स्पेन के ग्वेर्निका पर इटली और जर्मनी की बमबारी से ही द्वितीय विश्वयुद्ध के आरम्भ होने का बिगुल बज उठा था। ग्वेर्निका के शहर बास्क पर हुई बमबारी के चलते हजारों लोगों की मौत हुई। पिकासो की बनाई पेंटिंग ‘ग्वेर्निका’ युद्ध की तबाही का प्रतीक बनी।
मलक मत्तार की पेंटिंग ‘नो वर्ड्स’ युद्ध और आतंक की तबाही को फिर से जीती है जिसके चलते गाज़ा और फ़लस्तीन के और हिस्सों में 80,000 से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं। मलक मत्तार कहती हैं, ‘मैं गाज़ा स्ट्रिप में बड़ी हुई हूं। मेरा हमेशा से मानना रहा है कि फ़लस्तीन में भरपूर जीवन है लेकिन त्रासदी यह कि लोग जीने के लिए छटपटा रहे हैं।‘

फ़लस्तीन की कला उदासी में उतरी कला है। उदासी जितनी गहरी उतनी ही गहरी मुक्त होने की छटपटाहट भी। कभी यह एक खुशनुमा ख्वाब में दिखाई देती है तो कभी एक चीख में। फ़लस्तीन की कला अपने समय का दस्तावेज बनकर हमारे सामने आती है। वह अपने वक्त की बात कहती है और वह ये भी बताती है कि हम ऐसे वक्त को स्वीकार नहीं करते।
मलक मत्तार की एक और पेंटिंग ‘जेल की कोठरी में बच्चे का जन्म’ (Giving Birth in a Prison Cell) का यहां जिक्र किया जा सकता है जिसमें जेल की कोठरी में एक फ़लस्तीनी माँ के गर्भ में पल रहे बच्चे की आँखों में भय और आतंक की छाया दिख रही है। वह दुनिया जिसमें उसे अभी आना है वह कितनी भयावह है यह उस अजन्मे बच्चे को पता है। और वह माँ जो इसे जन्म दे रही है वह खुद भी ग्लानि, भय और दुःख से सिमटी जा रही है।
उम्मीद के दरख्त
1943 में फ़लस्तीन में जन्मे नबील अनानी समकालीन फ़लस्तीनी कला आंदोलन के प्रमुख संस्थापकों में से एक हैं। अनानी फ़लस्तीनी कला और लोककथाओं पर कई पुस्तकों के सह-लेखक भी हैं। उन्हें 1997 में यासर अराफात द्वारा दृश्य कला के लिए पहला फ़लस्तीनी राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान किया गया। वे फ़लस्तीनी कलाकारों के एक प्रमुख संघ के प्रमुख बने और वहां ललित कला की पहली अंतर्राष्ट्रीय अकादमी की स्थापना में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
नबील के चित्र उम्मीद से भरे हैं। उनके उनकी पेंटिंग्स में ख्वाब हैं एक पुरसुकून सुबह के, ख्वाब हैं जैतून के दरख्तों के और ख्वाब हैं अमन और शांति के। उनकी पेंटिंग्स रंगों से भरी हैं। उनकी एक पेंटिंग ‘यूटोपिया की तलाश’ (In Pursuit of Utopia) का जिक्र किया जा सकता है। इस पेंटिंग में दूर क्षितिज तक फैले जैतून के बाग हैं। ऐसा लग रहा है जैसे कलाकार ने खुशियां बिखेर दी हों।
फ़लस्तीन की जनता के लिए जैतून न केवल एक आर्थिक प्रतीक है बल्कि यह उसकी सांस्कृतिक पहचान भी है। जैतून के दरख्त एक हजार साल तक भी जिन्दा रह जाते हैं। फ़लस्तीन की जनता के लिए जैतून उनके बुज़ुर्गों का आशीर्वाद भी है और एक अनवरत परंपरा से जुड़े होने का अहसास भी, कि जैसे जैतून के जड़ें जमीन से जुड़ी हैं वैसे ही हमारा अस्तित्व हमारी जमीन से, अपनी धरती से, अपने लोगों से जुड़ा रहे।

फ़लस्तीन में कला, उम्मीद की कला है। कला, जो नारा बन कर गूंज उठे। रंग भरे कैनवास, सच बोलते रंग, गूंज उठते गीत, नाटक, कविताएं। फ़लस्तीन में कला उस पुरसुकून सुबह के सपने से जुड़ी है जिसे फ़लस्तीन के चित्रकार, रंगकर्मी, लेखक और कवि ना जाने कितने साल से देख रहे हैं। कमाल यह है कि यह ख्वाब पीढ़ी दर पीढ़ी बरकरार है। इतने ध्वंस के बाद भी, सालो-साल चलते दमन में सब कुछ तबाह होने के बाद भी यह सपना बना हुआ है।
इसलिए, तलवार टूटी, अश्व घायल
कोहरे डूबी दिशाएं
कौन दुश्मन, कौन अपने लोग, सब कुछ धुंध धूमिल
किन्तु कायम युद्ध का संकल्प है अपना अभी भी
…क्योंकि सपना है अभी भी!
(धर्मवीर भारती)
नबील अनानी के चित्र आने वाले भविष्य की सकारात्मक तस्वीर हैं जिसकी प्रतीक्षा हर फ़लस्तीनी कर रहा है। नबील अनानी ने चमड़े, मेंहदी, प्राकृतिक रंग, पेपर-मैशे, लकड़ी के मनके और तांबे जैसे स्थानीय माध्यमों का उपयोग कर के कलाकृतियों को रचा है।
निर्वासन का दर्द
मलक कहती हैं, ‘फ़लस्तीन में लोग भूख से जूझ रहे हैं… और उन्हें उन अनजानी जगहों की ओर विस्थापित किया जा रहा है जहां कोई जगह नहीं है।‘
फ़लस्तीन की जनता निर्वासन के दर्द से जूझ रही है। वह अपनी जड़ों से कटने की भयावह त्रासदी से गुजर रही है। वह रोजमर्रा के अपमान और दमन से भी जूझ रही है। गाज़ा में हर दो कदम पर बने लौह दरवाजे और उन पर तैनात सैनिक फ़लस्तीनियों को हर क्षण यह अहसास दिलाते रहते हैं कि उनका घर अब उनका नहीं है। वह अब अपने ही घर में निर्वासित हैं। इस्माइल शम्मौत अपनी कलाकृति से इस विस्थापन को पहचान देते हैं।
इस्माइल शम्मौत का जन्म 1930 में फ़लस्तीन के लिद्दा में हुआ था। 1948 के दौरान उनके शहर पर किए गए हमले के कारण उन्हें और उनके परिवार को अपना घर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। पैदल लंबी यात्रा के बाद वे गाज़ा के खान यूनिस के शरणार्थी शिविरों में बस गए, जहा उन्होंने बेहद कठिन परिस्थितियों में जीवन बिताया।
1950 में वे कला की पढ़ाई के लिए काहिरा गए, जहां से उन्हें बाद में रोम के एकेडेमिया डि बेले आर्ट में ललित कला का अध्ययन किया। अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद वे 1959 में बेरूत चले गए, जहां उन्होंने काहिरा की अपनी सहपाठी, फ़लस्तीनी कलाकार तमीम अल-अखाल से शादी की। दोनों 1983 तक बेरूत में रहे, काम किया, फिर कुवैत, उसके बाद जर्मनी और अंत में 1994 में अम्मान चले गए। शम्मौत का निधन 3 जुलाई 2006 को हुआ।

इस्माइल शम्मौत की कलाकृतियों को यूरोप और मध्य-पूर्व के प्रसिद्ध संग्रहालयों और कला प्रदर्शनी स्थलों सहित दुनिया भर के विभिन्न स्थानों पर प्रदर्शित किया गया है। उनकी पहली प्रदर्शनी 1953 में गाज़ा में आयोजित हुई थी, जहां उन्होंने अपनी प्रतिष्ठित कृति ‘वेयर टू?’ (Where to?) प्रदर्शित की थी। वेयर टू? में एक व्याकुल पिता को दिखाया गया है, जो 1948 के दौरान शम्मौत के जन्मस्थल लिद्दा से जबरन निकाले जाने की उस लंबी पदयात्रा में अपने बाएं कंधे पर सोये हुए बच्चे को उठाए हुए है। उसके दाहिने हाथ को एक छोटी बच्ची थामे हुए है, जो थकान से चूर होकर उसकी ओर देख रही है, और तीसरा बच्चा पीछे-पीछे चल रहा है।
यह पेंटिंग उस खोये हुए घर-बार और निस्सहायता को दर्ज करती है जो उस वर्ष लगभग आठ लाख फ़लस्तीनियों पर थोपी गई थी, और जिसे आगे चलकर ‘अल नक़बा‘ के नाम से जाना गया। इस्माइल शम्मौत की यह कालजयी कृति फ़लस्तीनी संस्कृति की पहचान बन चुकी है और पहचान बन चुकी है पूरी दुनिया के विस्थापितों की भी, जिन्हें धकियाकर, डरा कर और रौंद कर उनके मूल निवास से खदेड़ा जा रहा है।
और इंतजार…
इनके अलावा अबेद आब्दी, समाह शिहादी, फात्मा शानान, फातिमा अबू रूमी, जैसे अनेक चित्रकारों की एक लम्बी फेहरिस्त है जो फ़लस्तीन की जनता की आवाज बने हुए हैं, उनके हक़ के लिए लड़ रहे हैं और उनके सपनों में रंग भी भर रहे हैं।
जब सारे हथियार खत्म हो जाएंगे, जब मनुष्य के अंदर का जानवर हार जाएगा और जब सुबह का सूरज आंगन में लगे जैतून के दरख्त के पीछे धीरे से सिर उठाएगा, कलाकार स्मित भाव से मुस्कुराएगा। उसकी खोज पूरी हो चुकी होगी। थका-हारा पथिक घर आ चुका होगा उन चाबियों के साथ, जिनको सीने से लगाए न जाने कितनी निर्वासित पीढ़ियां गुजर गईं।

फ़लस्तीन की कला पर, जो ध्वंस से उपजी कला है, बहुत कुछ लिखा जाना चाहिए। फ़लस्तीन पर बातों का कोई अंत नहीं क्योंकि उनके दुःखों का अंत नहीं, लेकिन अपनी कविता से अपनी बात खत्म कर रहा हूं, इस उम्मीद के साथ कि हर बुरे दौर का अंत होना चाहिए।
जड़ें,
सिर्फ दरख़्त की नहीं होती,
आदमी की भी होती हैं।
चाहे
कोई धकियाये,
डराये, रौंद भी दे,
कर दे निर्वासित,
जड़ें,
कहीं नहीं जातीं,
वहीं धंसी रह जाती हैं।
कितने भी मुश्किल
हालात हों,
जड़ें,
उम्मीद नहीं खोतीं,
इंतजार करती रहती हैं
लौट आने का।