NATO@75 : धारणा के प्रचार-युद्ध में सरकारों, कॉर्पोरेट और CSO का नया मोर्चा

NATO and AI
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एक बार फिर पश्चिम में लोकतंत्र की दुहाई दी जाएगी और लोगों की आजादी को बचाने के नाम पर दुनिया भर में सैन्‍य गठजोड़ किए जाएंगे। फर्क बस इतना है कि अबकी मुद्दा ज्‍यादा महीन है- डिजिटल तकनीक और एआइ के रास्‍ते सूचना और ज्ञान के उत्‍पादन का। मंगलवार से शुरू हो रहा नाटो का शिखर सम्‍मेलन जनता की धारणा और भावना को नियंत्रित करने, उसकी निगरानी करने और उसे अनुकूलित करने के नए युद्ध का औपचारिक सूत्रपात कर सकता है। अमेरिका के राष्‍ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के चीफ ऑफ स्‍टाफ रह चुके इली बैरक्‍तारी खुद पूरी योजना बता रहे हैं। प्रोजेक्‍ट सिंडिकेट के सौजन्‍य से

वॉशिंगटन में इस महीने (9 से 11 जुलाई के बीच) नाटो (नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन) का शिखर सम्‍मेलन उसकी स्‍थापना की 75वीं वर्षगांठ पर और एक बेहद अहम मोड़ पर होने जा रहा है। दुनिया की स्थिरता के समक्ष परंपरागत सैन्‍य दायरे के पार जैसे खतरे विकसित हो रहे हैं, नाटो को अपनी एकता और मूल्‍यों का अवमूल्‍यन करने वाली कु-सूचना (डिसइनफॉर्मेशन) की बाढ़ का सामना करना ही होगा। खास तौर से, इसके सदस्‍य देशों को आक्रामक दुश्‍मन सत्‍ताओं द्वारा प्रौद्योगिकी की मदद से जन-धारणा के खिलाफ छेड़े गए ज्ञान युद्ध से बचाना ही होगा।

इस लिहाज से आगामी सम्‍मेलन से उपयुक्‍त ही उम्‍मीद है कि वह युक्रेन युद्ध और नाटो के सामूहिक प्रतिरक्षा ढांचे पर खुद को फोकस करे ताकि आज की सूचना पारिस्थितिकी की वास्‍तविकताओं के हिसाब से उसे अनुकूलित किया जा सके। ज्ञान युद्ध (Cognitive Warfare) के खतरे की हदों को रूस के छेड़े बर्बर और आक्रामक युद्ध ने सामने ला दिया है, जिसमें वह बड़े पैमाने पर सोशल मीडिया संचालित प्रचार चला रहा है जिसका लक्ष्‍य गलत अफसाने फैलाना, पश्चिम-विरोधी और लोकतंत्र-विरोधी भावनाएं उकसाना और नाटो की सबसे बड़ी ताकत यानी उसकी एकता को कमजोर करना है। 



सूचना युद्ध कोई नई चीज नहीं है। शीत युद्ध के दौरान नाटो ने पश्चिमी लोकतंत्रों को कमजोर करने के लिए सोवियत संघ के चलाये दुष्‍प्रचार और कु-सूचना अभियान को समझा था और उसका जवाब भी दिया था। तब से लेकर आज तक डिजिटल क्रांति और आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस (एआइ) के उभार ने समस्‍या को और गहरा ही किया है, जिसके चलते बुरे तत्‍व एआइ संवर्द्धित कंटेंट, जैसे डीपफेक आदि को अभूतपूर्व गति और बड़े पैमाने पर पैदा करने और फैलाने में समर्थ हो चुके हैं।   

ये नए ताकतवर औजार बेशक अहम आर्थिक फायदे दे सकते हैं, लेकिन ये खतरनाक हथियार भी साबित हो सकते हैं। रूस जैसी दुश्‍मन ताकतें पहले ही सार्वजनिक विमर्श को प्रभावित करने, ध्रुवीकरण बढ़ाने, संस्‍थाओं में भरोसा खत्‍म करने और साझा चुनौतियों को संबोधित करने के सामर्थ्‍य को कमजोर करने के लिए लोकतंत्रों के खिलाफ कु-सूचना का इस्‍तेमाल कर रही हैं। यह साल पूरी दुनिया में चुनावों का साल है जब दुनिया की आधी आबादी वोट दे रही है। ऐसे में नाटो के दुश्‍मनों के लिए एक सुनहरा अवसर पैदा हुआ है जब वे लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का अवमूल्‍यन कर के राजनीतिक अस्थिरता को भड़का सकते हैं।

इसलिए नाटो के सदस्‍य देशों को एआइ संवर्द्धित कु-सूचना का सीधे सामना करना चाहिए। इसके लिए मौजूदा प्रतिक्रिया-आधारित तरीके से आगे बढ़ने की जरूरत है, जो केवल झूठ को बेपर्द करने का काम करता रहा है। नाटो को अब एक समग्र और सामूहिक प्रतिरक्षा सिद्धांत विकसित करना होगा जो लोकतांत्रिक समाजों की सुरक्षा के काम में सूचना पारिस्थितिकी को एक अग्रिम मोर्चा मानकर चल सके।   


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इसके लिए कई जरूरी बदलाव करने की जरूरत है। जैसे, नाटो को रियलटाइम में कु-सूचना की निगरानी और विश्‍लेषण की क्षमता विकसित करनी होगी। इसके लिए ओपेन-सोर्स इंटेलिजेंस (OSINT) के औजारों में निवेश और टेक कंपनियों के साथ गठजोड़ अहम है ताकि प्रचारात्‍मक अभियानों को पहचान कर, उन्‍हें पलटकर बदनाम करने की जरूरी तकनीकी दक्षता विकसित की जा सके। विशेष रूप से, नाटो को कंटेंट की विश्‍वसनीयता और जवाबदेही के औजारों में निवेश करना होगा- जैसे लार्ज लैंग्‍वेज मॉडल्‍स (LLMs), एआइ क्‍लासिफायर्स और भावनाओं के विश्‍लेषण के लिए नैचुरल लैंग्‍वेज प्रोसेसिंग- जो एआइ से पैदा हुए या बदले गए कंटेंट की पहचान कर सकें।  

दूसरे, कु-सूचना से लड़ना तेज, आक्रामक और दूर तक मार करने वाली रणनीतिक संचार प्रणाली की मांग करता है। इस स्‍तर पर नाटो को अपने हितों और मिशन को सक्रियतापूर्वक प्रसारित करना होगा, एकाधिकारी सत्‍ताओं की नाकामियों को उजागर करना होगा और अपनी तरफ से एक सकारात्‍मक नैरेटिव पेश करना होगा।

ऐसा कारगर ढंग से करने के लिए नाटो को अपना यह युद्ध दुश्‍मन के सूचना तंत्र तक भी ले जाना होगा। तानाशाही सत्‍ताओं की कुप्रचार गतिविधियों को उनके अपने मंचों पर ही सक्रियता से उजागर कर के नाटो एक तानाशाह के गढ़े अफसानों और हरकतों का परदाफाश कर सकता है। ठीक उसी वक्‍त इस दायरे में मौजूद स्‍वतंत्र आवाजों को भी अगर बढ़ावा दे दिया जाय तो इसका जबरदस्‍त गुणात्‍मक असर हो सकता है, जो प्रोपगंडा और कु-सूचना के खिलाफ प्रतिरोध को और मजबूत कर सकेगा।

तीसरे, चूंकि दुष्‍प्रचार अभियान राष्‍ट्रीय सीमाओं में नहीं बंधे हैं, तो इनसे लड़ने के लिए जरूरत यह है कि नाटो दूसरी सरकारों, निजी कंपनियों और सिविल सोसायटी के संगठनों के साथ एक गठबंधन वाला रिश्‍ता कायम करे। इस साझेदारी को साझा मानक, पूर्व-चेतावनी प्रणालियों, व्‍यापक कु-सूचना अभियानों के खिलाफ समन्वित प्रतिक्रियाओं और ऐसी हरकतों की पहचान व निवारण की एक प्रणाली विकसित करने पर फोकस होना चाहिए ताकि एकाधिक संप्रभु सूचना-तंत्रों के भीतर इसे एक साथ अंजाम दिया जा सके। जैसा कि युक्रेन के बारे में रूसी कुप्रचार पर समन्वित प्रयास से जाहिर है, निरंतर ऐसा गठजोड़ बहुत अहम होगा।



अंत में, कुप्रचार के खिलाफ सर्वश्रेष्‍ठ रक्षा इस बात में निहित है कि आबादियों के बीच सही सूचना दी जाए और उनके भीतर आलोचनात्‍मक सोच पैदा की जाए। जैसा कि फिनलैंड में किया जा रहा है, वैसे ही मीडिया और डिजिटल साक्षरता का प्रसार करने वाले कार्यक्रमों को अन्‍यत्र सहयोग देकर नाटो वहां के मतदाताओं को भरमाने और प्रोपगंडा के खिलाफ एक सामाजिक प्रतिरोध खड़ा करने में मदद दे सकता है।

इस रणनीति को लागू करने के लिए नाटो को नए सांगठनिक ढांचों की भी जरूरत पड़ेगी। शुरुआत के लिए नाटो को एक डिसइनफॉर्मेशन यूनिट की स्‍थापना करनी चाहिए जो खुफिया सूचनाओं को समन्वित करने, प्रतिसंदेश (काउंटर मैसेजिंग) अभियानों का नेतृत्‍व करने और रणनीतिक साझेदारियां कायम करने के लिए जिम्‍मेदार हो। ऐसी यूनिट यूरोपीय संघ की कानून अनुपालक एजेंसी यूरोपोल के काम सहित फाइव आईज़ इंटेलिजेंस अलायंस (अमेरिका, यूके, ऑस्‍ट्रेलिया, न्‍यूजीलैंड और कनाडा) का दोहन कर के अपने सूचना साझा करने वाले तंत्र को प्रसारित और सशक्‍त कर सकता है। 

चीन, रूस, ईरान और उत्‍तरी कोरिया से बनी शैतानी धुरी के पैदा किए खतरे के मद्देनजर नाटो को अपनी सैन्‍य ताकत तथा ज्ञान युद्ध से अपने सदस्‍य देशों के सूचना तंत्र को बचाने वाली उतनी ही आधुनिक प्रणालियों को साथ मिलाना होगा। इसलिए नाटो के सदस्‍य देशों को आगामी वॉशिंगटन सम्‍मेलन में इस मुद्दे को शीर्ष प्राथमिकता में रखना होगा। कुप्रचार और कु-सूचना से लड़ाई महज सार्वजनिक विमर्श की अखंडता को बचाने के लिए नहीं है, बल्कि यह स्‍वतंत्रता और सुरक्षा की बुनियाद को महफूज करने के लिए भी उतनी ही अहम है। यह एक ऐसा अवसर है जिसे गंवाना हम गवारा नहीं कर सकते क्‍योंकि यह एक ऐसी जंग है जिसे हारा नहीं जा सकता।


Copyright: Project Syndicate, 2024.
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