भ्रमित नैतिकता और खंडित नागरिकता के इस दौर में अरस्तू कैसे प्रासंगिक हैं

Aristotle
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एक अच्‍छे जीवन का मतलब क्‍या होता है, इस पर विचार करते हुए अरस्‍तू ने एक रूपरेखा प्रस्‍तुत की थी। नैतिक्र भ्रम और नागरिक विखंडन के हमारे दौर के लिए वह रूपरेखा बहुत प्रासंगिक है। उन्‍होंने पहले ही देख लिया था कि हमारे बीच उभरने वाले तमाम मतभेदों के मूल में दरअसल उद्देश्‍य, आपसदारी और प्रतिष्‍ठा की एक साझा आस छुपी हुई है। इक्‍कीसवीं सदी के इनसानी, समाजी और सियासी संकट पर अरस्‍तू के यहां से एक वैचारिक और व्‍यावहारिक रास्‍ता बता रही हैं अंतरा हालदर

प्रतिष्ठित खगोलविद् कार्ल सेगन ने 1995 में एक भाषण दिया था जिसमें उन्‍होंने ‘’इक्‍कीसवीं सदी के लिए दृष्टि’’ को रेखांकित किया था। इस वक्‍तव्‍य में उन्‍होंने इस ब्राह्माण्‍ड में हमारी अतिसूक्ष्‍म उपस्थिति का हवाला देते हुए इनसानी सभ्‍यता की नज़ाकत की तरफ सबका ध्‍यान खींचने की कोशिश की थी। उनकी चेतावनी थी कि हमारा भविष्‍य पूरी तरह इस बात पर निर्भर करेगा कि हम एक-दूसरे के साथ कितनी समझदारी और विनम्रता के साथ जीना सीख पाते हैं।

जाहिर है, हमने उनकी चेतावनी अनसुनी कर दी। इस ब्रह्माण्‍ड में एक धुंधले नीले बिंदु की तरह दिखने वाला हमारा गोला आज तीन दशक के बाद जबरदस्‍त भूराजनीतिक उथल-पुथल से चाक पड़ा है। बीसवीं सदी के उत्‍तरार्द्ध में वैश्विक उदारवाद ने अपने उभार की जो उम्‍मीदें जगाई थीं वे सब छीज चुकी हैं। ऐसे विनाशकारी अनिश्‍चयों के सामने खड़े हम सब के पास अब शायद कुछ बुनियादी बातों पर लौटने की रणनीति ही सबसे कारगर हो सकती है। ‘’क्‍या होता है एक अच्‍छा जीवन?” – तमाम सवालों के बीच इस सबसे बड़े और बुनियादी सवाल की पड़ताल करने के लिए हमारे पास अरस्‍तू से बेहतर शिक्षक और कोई नहीं है। अरस्‍तू की रचनाएं पॉलिटिक्‍स और निकोमाकियन एथिक्‍स हमें एक ऐसी रूपरेखा मुहैया कराती हैं जो नैतिक भ्रम और नागरिक विखंडन के इस दौर के लिए आश्‍चर्यजनक रूप से प्रासंगिक हैं।

व्‍यक्ति की स्‍वायत्‍तता को सबसे ऊपर रखने वाली आधुनिक लिबरल परंपरा के उलट, अरस्‍तू बिलकुल अलग प्रस्‍थापना से अपनी शुरुआत करते हैं: मनुष्‍य अपने आप में बंद कोई इकाई नहीं है, बल्कि एक सामाजिक प्राणी है जिसका फलना-फूलना एक राजनीतिक समुदाय के भीतर चारित्रिक गुणों के पोषण पर निर्भर करता है। अच्‍छे से जीने का मतलब केवल अपनी चाहत के हिसाब से कुछ करना नहीं है, बल्कि वह आजीवन शिक्षण और अभ्‍यास के माध्‍यम से चरित्र के पोषण तथा एक साझा नागरिक जीवन में संलग्‍नता की मांग करता है। (यह संयोग नहीं है कि आजकल तमाम राष्‍ट्रवादी और लोकरंजक ताकतें अच्‍छे जीवन की अपील करती दिखती हैं।)   


असमानता और लोकतंत्र के रिश्ते पर 2300 साल पुराने राजनीतिक दर्शन का एक सबक


अरस्‍तू का यह परिप्रेक्ष्‍य पारंपरिक दक्षिणपंथ को लंबे समय तक (बहुत हाल तक) परिभाषित करते रहे स्‍वेच्‍छातंत्रवाद और वामपंथ में मुखर होने वाली अस्मिताओं की राजनीति के एकदम विपरीत खडा है। अरस्‍तू हमें याद दिलाते हैं कि इच्‍छा-स्‍वातंत्र्य का अर्थ केवल बंदिशों का न होना नहीं होता, तथा न्‍याय का अर्थ केवल अधिकारों का निष्‍पक्ष बंटवारा नहीं होता। उनकी नज़र में सच्‍ची स्‍वतंत्रता दूसरों के साथ मिलजुल कर खुद को विवेक और सदाचार के साथ चला ले जाने की क्षमता है; सच्‍चा न्‍याय महज अमूर्त्‍त कानूनों में नहीं, बल्कि उन आचरणों में निहित है जो लोगों को उद्देश्‍यपूर्ण, प्रतिष्‍ठाजनक और उत्‍कृष्‍टता भरा जीवन बिताने में समर्थ बनाते हैं।

यह भाषा हमारी मौजूदा राजनीतिक संस्‍कृति में कहीं गुम हो चुकी है। हम लोग अधिकारों के प्रतिस्‍पर्धी दावों के आधार पर न्‍याय-निर्णय लेते हैं- मेरे बोलने का अधिकार बनाम तुम्‍हारी रक्षा का अधिकार बनाम उनको भी शामिल किए जाने का अधिकार, जैसे मुहावरे में। चूंकि इस निर्णय में हमारे समान उद्देश्‍य की कोई साझा अवधारणा मौजूद नहीं है- जिसे प्राचीन ग्रीक दार्शनिक टेलोस कहते थे- तो कुल मिलाकर नतीजा सिफ़र रह जाता है। हम लोग एक ऐसी जंग में फंसकर रह जाते हैं जहां किसकी व्‍यक्तिगत प्राथमिकता और पहचान को पहले रखा जाए, इस पर फैसला ही नहीं हो पाता। इसी का नतीजा है हाइपर-पॉलिटिक्‍स, यानी नैतिक प्रतिस्‍पर्धाओं का एक अंतहीन सिलसिला जिसकी नैतिक जमीन ही गायब हो।

ऐसे में अरस्‍तू हमें एक साझा शब्‍दावली दे सकते हैं जिसकी हमें जरूरत है। वे राजनीति को महज सत्‍ता देने या पाने की प्रणाली नहीं, बल्कि चारित्रिक गुणों (उत्‍कृष्‍टता) को पोषित करने का एक माध्‍यम मानते थे। उनके अनुसार, एक सुव्‍यवस्थित राजनीति केवल लोगों को नुकसान होने से नहीं बचाती; वह उत्‍तरदायित्‍व, विचार-विमर्श, साहस, संयम और लोकमंगल के लिए सरोकार को पोषित कर के अच्‍छे नागरिक तैयार करती है।

इस विचार को आज की दुनिया के सामने रख कर देखिए। हमारी संस्‍थाएं प्राय: शिकायतों के निपटारे के किसी बाजार की तरह काम करती हैं जहां ध्‍यानाकर्षण, रसूख और आक्रोश वाले खरीदार सबसे ज्‍यादा ताकतवर होते हैं। हमारा मीडिया परिवेश- खासकर ऑनलाइन- इस तरह से डिजाइन किया गया है जो कबीलाई व्‍यवहार को बढ़ावा दे। हमारी शिक्षा व्‍यवस्‍थाएं अब नैतिक संरचना पर बात करने से ज्‍यादा से ज्‍यादा बचती हैं, बेशक राजनीतिकरण का आरोप उन पर लगाया जा सकता है। और हमारे नेता अनुकरणीय सार्वजनिक चरित्र का उदाहरण बनने से दूर अब उसका प्रतिपक्ष हैं।

अमेरिका और ब्रिटेन से लेकर भारत और हंगरी तक सारे लोकतंत्र केवल ध्रुवीकरण से ही संघर्ष नहीं कर रहे, बल्कि कुछ और गहरा रोग उन्‍हें लग गया है: नागरिक विश्‍वास का क्षरण, साझा आख्‍यानों का पतन और लोक उद्देश्‍य की हानि। अरस्‍तू ने एक शब्‍द का प्रयोग किया था यूडाएमोनिया, यानी एक न्‍यायपूर्ण और सुव्‍यवस्थित समुदाय में भागीदारी के रास्‍ते एक व्‍यक्ति का विकास। इस शब्‍द की जगह आज सफलता की एक खोखली अवधारणा ने ले ली है, जिसे धन-दौलत, मीडिया में संक्रामकता या दायित्‍वमुक्‍त निजी ताकत के रूप में बहुत संकीर्ण ढंग से परिभाषित किया जाता है।


पुरानी दुनिया और नए युग के वैचारिक जगत को जोड़ने वाला अंतिम सिरा


राजनीति और अच्‍छे जीवन की अरस्‍तू की अवधारणा को अपनाने का मतलब समय में पीछे जाना नहीं है, न ही आधुनिक लिबरल लोकतंत्र के फलों की उपेक्षा करना है। तानाशाही के खिलाफ अधिकार, बहुलता और संरक्षण का मोल तो हम बिलकुल ठीक-ठीक समझते हैं, लेकिन अरस्‍तू हमें याद दिलाते हैं कि कोई भी राजनीतिक व्‍यवस्‍था उस नैतिक उद्देश्‍य के बगैर फल-फूल नहीं सकती जो इन बुनियादी सवालों को संबोधित करता है: हम लोग कैसा बनना चाहते हैं? हमारी संस्‍थाओं का चरित्र कैसा होना चाहिए? हम ऐसे नागरिक कैसे बनाएं जो अबाध लाइसेंस के बजाय सच्‍ची स्‍वतंत्रता को बरतने में सक्षम हों?       

अरस्‍तू के यहां शिक्षा का मतलब केवल ज्ञान या कौशल अर्जित कर लेना नहीं है। इसका संबंध चरित्र-निर्माण से भी है जो आदर्श लोगों को जानने, सदाचार पर सोचने-समझने और नागरिक जीवन में सक्रिय सहभागिता करने से जुड़ा है। राजनीतिक विमर्श महज हितों का टकराव नहीं है, बल्कि हम मिलजुल कर साथ में अच्‍छे से कैसे रह सकते हैं इसके व्‍यवहारिक विवेक का साझा उपक्रम भी है। यहां नेतृत्‍व को उसके प्रदर्शन से नहीं तौला जाता, बल्कि उसे एक ख्रिदमतगार के रूप में देखा जाता है जिसका काम दूसरों को साझी भलाई की ओर प्रवृत्‍त करना है।

ऐसी राजनीति निराशावादी के इस दौर में भोली लग सकती है, लेकिन हमारा निराशावाद शायद अपने पूर्वग्रहों और पूर्वापेक्षाओं को पुष्‍ट करने के अलावा किसी काम नहीं आ रहा। असली भोलापन तो यह मानने में है कि हम लोकतंत्र को नैतिक और नागरिक गुणों के बगैर बचा ले जाएंगे। अरस्‍तू उस बात को समझते थे जिसे तमाम आधुनिक सिद्धांतकार भुला चुके हैं: किसी समाज की सेहत केवल उसके कानूनों या उसकी अर्थव्‍यवस्‍था पर निर्भर नहीं करती, बल्कि उसके लोगों के चरित्र पर टिकी होती है।

हमारे समय का एक पारिभाषिक लक्षण यह है कि तमाम लोगों को इस तरह से शिक्षित किया गया है कि वे खुद को और दूसरों को होमो इकोनॉमिकस समझते हैं- यानी एक-दूसरे से अलगाव में देखते हैं, जिनका काम केवल चीजों को चुनना रह गया है। ये तमाम लोग खुद को कमजोर, जड़विहीन महसूस करते हैं और मायनों के भूखे हैं। ऐसे संकट में कुछ लोग अस्मितावादी या राष्‍ट्रवादी परियोजनाओं में पनाह ढूंढते हैं, तो कुछ अन्‍य लोग बाजार में कामयाबी खोजते फिरते हैं। इन दोनों अलहदा राहों के तल में दरअसल एक उद्देश्‍य, आपसदारी और प्रतिष्‍ठा की साझा आस छुपी है। अरस्‍तू इसी आस को सीधे संबोधित करते हैं, और इसके उपचार के लिए कोई तकनीकी नुस्‍खा या एकतरफा नारा नहीं देते, बल्कि राजनीति की एक नैतिक दृष्टि देते हैं। यह नैतिक दृष्टि राजनीतिक में ऐसी जगह बनाती है जहां इनसान फल-फूल सकता है।

एक जापानी कला होती है किंत्‍सुगी, जिसमें टूटे हुए पात्रों की दरारों में सोना भरकर उसे दुरुस्‍त किया जाता है। उसी तर्ज पर अरस्‍तू की शिक्षा इक्‍कीसवीं सदी के दरक चुके राजनीतिक प्रतिष्‍ठानों की मरम्‍मत कर के उन्‍हें मुकम्‍मल बनाने की संभावना को साकार करती है। हमें करना बस इतना है कि दरारों को छुपाना-मिटाना नहीं, बल्कि उनमें सदाचार, उद्देश्‍य और लोकमंगल के साझा विचारों को भर देना है।


Copyright: Project Syndicate, 2025.


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