बाग़ी बादशाह ट्रम्प : वही क़ातिल वही मुंसिफ़ अदालत उसकी वो शाहिद…

God and Rebel
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पूरी दुनिया के शासक आज की तारीख में राज्‍येतर गिरोहों के सहारे अपना राज कायम किए हुए हैं ताकि वे सुविधाजनक ढंग से अपनी कार्रवाइयों से इनकार कर सकें, लेकिन एक ऐसा शख्‍स है जो अपने गिरोहों से दूरी नहीं कायम रखता- ट्रम्‍प! अमेरिका का राष्‍ट्रपति कानून का रखवाला है लेकिन कानून तोड़ने वाले गिरोहों का सबसे बड़ा सरगना भी; वह सरकार है लेकिन सरकार से निजी हर्जाने की मांग कर रहा मुकदमे में खड़ा वादी भी है। प्रोजेक्‍ट सिंडिकेट के सौजन्‍य से ट्रम्‍प पर ज़ीज़ेक की टिप्‍पणी

फ्रांसिस फुकुयामा ने 1989 की गर्मियों में इतिहास के अंत का अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत किया था। उनका तर्क था कि चूंकि उदार-लोकतांत्रिक पूंजीवाद ही सर्वोत्तम सामाजिक व्यवस्था है, इसलिए इस व्यवस्था को दुनिया भर में धीरे-धीरे साकार करते चले जाने के अलावा और किसी भी तरह की प्रगति संभव नहीं है।

इतिहास का उनका बताया वह “अंत” अधिकतम तीन दशक तक ही चल पाया। हम लोग आज खुद को उसके ठीक विपरीत छोर पर खड़ा पाते हैं। आज की दुनिया में सबसे प्रचलित विचार यह है कि उदार-लोकतांत्रिक पूंजीवादी विश्व-व्यवस्था अपने उन तमाम जटिल नियमों के साथ टूट कर बिखर चुकी है, जो बुनियादी मानवाधिकारों (बोलने की आजादी, सार्वभौमिक स्वास्थ्य देखभाल, सार्वजनिक शिक्षा, आदि) की गारंटी देते थे। उसकी जगह ले रही है एक क्रूर नई दुनिया, जिसमें बड़ी मछलियां छोटी मछलियों को खा जाती हैं; इस नई दुनिया में विचारधाराओं को अब गंभीरता से नहीं लिया जाता क्योंकि आज असल मायने रखने वाली चीजें हैं कोरी आर्थिक, सैन्य और/या राजनीतिक ताकत!

इस हिसाब से कहें, तो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने लोकतंत्र बहाल करने के लिए वेनेज़ुएला में हस्तक्षेप नहीं किया; उन्होंने जाहिर तौर पर ऐसा इसलिए किया ताकि वहां के विशाल तेल और खनिज भंडारों तक मुफ्त में पहुंचा जा सके। ठीक इसी तरह, रूसी राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन ने यूक्रेन के ऊपर उसके इलाकों को कब्जाने के लिए हमला किया ताकि उस ग्रेटर रूस (अखंड रूस) की बहाली की जा सके जो बोल्शेविक क्रांति से पहले हुआ करता था और उसके बाद भी एक अलग रूप में मौजूद रहा था।


Slavoj Zizek on FUS

यानी, आजकल की प्रचलित विश्वदृष्टि एक ऐसा यथार्थवाद है जिसमें किसी किस्‍म का कोई भ्रम और आदर्श नहीं बच गया है। संदेश यह है कि अगर आपका देश छोटा है तो आप स्वीकार कर लीजिए कि आपको डर में ही जीना है और यदि आप छुट्टा ताकत का आनंद ले सकते हैं तो आपको वैसा ही करना चाहिए- बस इतना ध्यान रखें कि इसमें सिद्धांतों के लिए कोई जगह न रहे। अकसर इस दलील के साथ यह भी कहा जाता है कि विचारधाराओं के पार इस नई दुनिया में मानवाधिकारों, अन्य देशों की संप्रभुता के सम्मान, और बाकी हर एक चीज का मुखौटा उतर चुका है।

इन सब बातों में से कुछ भी सच नहीं है। हकीकत यह है कि उदारवाद के बाद वाली हमारी यह दुनिया उदार-लोकतांत्रिक व्यवस्था वाली दुनिया की तुलना में विचारधारा से कहीं ज्‍यादा प्रभावित है। (अमेरिका को दोबारा महान बनाने वाला) ट्रम्प का MAGA दृष्टिकोण विशुद्ध एक विचारधारा है, भले ही अपनी हरकतों से वह रोज कोई अंतर्विरोध पैदा करते हों। ट्रम्‍प मार्का लोकलुभावनवाद के एक प्रमुख वैचारिक सिपाही स्टीव बैनन खुद को ऐसा लेनिनवादी बताते हैं जो राज्य को नष्ट करने के लिए काम कर रहा है, लेकिन हकीकत में अमेरिका की राजकीय मशीनरी ट्रम्प के तहत पहले से इतनी मजबूत और दबंग हो चुकी है कि वह मौजूदा कानूनों का नियमित रूप से उल्लंघन कर रही है और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं व बाजारों में हस्तक्षेप कर रही है। MAGA की नजर में, “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” उत्पीड़ित और शोषित लोगों के लिए अपनी आवाज मुखर करने का अधिकार नहीं है, बल्कि वह कमजोर लोगों (प्रवासी, अश्‍वेत, और यौन अल्पसंख्यक) को अपमानित करने और नीचा दिखाने के लिए ताकतवर लोगों का विशेषाधिकार है।

इज़रायल और रूस के लिए भी यह बात सही है। ये केवल दो उदाहरण हैं। इज़रायल अब चौतरफा यहूदी कट्टरपंथ से घिरा हुआ है जो गाजा और वेस्ट बैंक के क्रूर उपनिवेशीकरण को वैध ठहराने के लिए ओल्‍ड टेस्‍टामेंट का सहारा लेता है। इसी तरह, पुतिन अपनी ताकत को उस यूरेशियाई विचारधारा के सहारे वैध ठहराते हैं जो पश्चिम के व्यक्तिवादी उदारवाद की विरोधी है और कथित तौर पर पारंपरिक ईसाई मूल्यों को महत्व देती है। उसके मुताबिक, समुदाय को प्राथमिकता देते हुए व्यक्तियों को राज्य के लिए खुद का बलिदान देने को तैयार रहना चाहिए।

पुतिन की विचारधारा के एक शीर्ष प्रचारक अलेक्जेंडर खारिचेव ने इसी तर्ज पर होमो पुतिनस नाम की एक मानवीय प्रजाति को सूत्रीकृत किया है, जिसकी प्रकृति ही कथित तौर पर “आत्‍मबलिदानी” है। उनके मुताबिक, “पश्चिम के व्‍यक्ति के लिए जीवन जितना अर्थ रखता है, हमारे लिए वह उतना मायने नहीं रखता। हमारा मानना है कि महज अस्तित्व से भी अधिक महत्वपूर्ण कुछ चीजें होती हैं। सार रूप में, वही चीजें किसी भी आस्था की बुनियाद हैं।”

इन सभी मामलों में हम पाते हैं कि दुनिया जैसी है, उसे वैसा का वैसा देख पाने से हमें यथासंभव दूर रखा जा रहा है। जिस प्रचलित “यथार्थवाद” की बात हमने आज के दौर में ऊपर की, वह दरअसल विचारधारा के अतिरेक की ओर से आंख मूंदे हुए है, उसकी उपेक्षा करता है, जबकि वही अति‍रेकी विचारधारा यथास्थिति को कायम रखने और पुनुरुत्‍पादित करने के काम आ रही है।

यही तनाव आज की दुनिया की प्रमुख विशेषताओं में से एक को रेखांकित करता है: जहां ज्‍यादा से ज्‍यादा देश (राज्य) अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिए सशस्त्र आपराधिक गिरोहों के ऊपर निर्भर हैं। हैती, जिसे गुलामों की कामयाब क्रांति के लिए 200 से अधिक वर्षों तक दंडित किया गया, आज कथित विफल राज्य का सबसे चरम उदाहरण है जहां के अस्‍सी प्रतिशत इलाकों के ऊपर गिरोहों का कब्‍जा है। अब इक्‍वेडर में भी ऐसी ही चीजें हो रही हैं (जहां गिरोह खुलेआम शहरों के हिस्सों पर कब्जा कर रहे हैं)। मेक्सिको के उन हिस्सों का भी यही हाल है जो पूरी तरह से ड्रग कार्टेल द्वारा नियंत्रित हैं।

इस संदर्भ में हमें ईरान की नैतिकता का भी उल्लेख करना चाहिए, जहां इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स एक वैचारिक पुलिसबल का काम करते हैं और अक्सर सरकार को शर्मिंदा कर देने वाले चरमपंथी कदम उठाते हैं। महसा अमीनी की हत्या को याद करें, जिसे कथित तौर पर अपना हिजाब ठीक से न पहनने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। इसी तरह एक वैग्‍नर ग्रुप हुआ करता था, जिसका इस्‍तेमाल रूसी सरकार ने अपने विदेशी सैन्य अभियानों से इनकार करने के लिए एक प्रॉक्सी के रूप में किया था। बाद में वह ग्रुप पुतिन के ही खिलाफ चला गया।

ऐसा सबसे स्पष्ट मामला इज़रायली बाशिंदों का है जो खुले तौर पर वेस्ट बैंक में रहने वाले फलस्तीनियों को आतंकित कर रहे हैं। वे एक स्वतंत्र आंदोलन के रूप में काम करते हैं- फलस्तीनियों के घरों और जैतून के पेड़ों को जलाने से लेकर उन्हें मारने-पीटने, हत्‍या करने तक के तमाम अपराध! इज़रायली रक्षाबल ये सब बस देखते रहते हैं और केवल तभी हस्तक्षेप करते हैं जब फलस्तीनियों की ओर से कोई प्रतिरोध उठता है। यहां पर भी हम देखते हैं कि राज्य एक आपराधिक गिरोह को न सिर्फ बरदाश्‍त कर रहा है बल्कि उसे प्रोत्साहित भी कर रहा है क्‍योंकि वह अपने किये-धरे से इनकार की स्थिति को कायम रखना चाहता है।


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इस कहानी में ट्रंप तो हैं ही। पहले उन्‍होंने अमेरिका में सत्ता के संवैधानिक केंद्र के खिलाफ एक विद्रोह को उकसाने का काम किया। अब वे अपने राज में अपने ही देश के भीतर आंतरिक उपनिवेशवाद को अंजाम दे रहे हैं, जिसके तहत डेमोक्रेट-शासित नगरों के निवासियों को आतंकित करने के लिए (अब नेशनल गार्ड नहीं) सैन्यीकृत आप्रवासन और सीमा शुल्क प्रवर्तन एजेंटों (ICE) को तैनात किया जा रहा है। ट्रंप के व्हाइट हाउस में लौटने के बाद से आइसीई के कर्मचारियों की संख्या में 120% की वृद्धि हुई है। गोरे राष्ट्रवादियों को लक्षित करने वाले एक अभियान के माध्यम से उसमें 12,000 नए एजेंट और अधिकारी भर्ती किए गए और उन्हें केवल 47 दिनों के प्रशिक्षण के बाद बंदूकें सौंप दी गईं। अपने चेहरे पर नकाब लगाए ये लोग वेस्ट बैंक वाले इज़रायली कब्‍जेदार बाशिंदों जैसा काम ट्रंप के लिए करते हैं और बिना किसी न्यायिक वारंट के लोगों के घरों में जबरन घुस जाते हैं। मिनियापोलिस में काम करने वाले एक मैक्सिकन पादरी ने आइसीई को अपने देश के ड्रग कार्टेलों से बदतर बताया है।

फिर भी, एक अहम फर्क है: इज़रायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू या पुतिन के इनकार से उलट, ट्रम्प अपने आपराधिक गिरोह से कोई दूरी नहीं बनाए रखते। वह उन गिरोहों के प्रत्‍यक्ष कमांडर हैं। वे खुद ही उन्हें लोकतांत्रिक संस्थानों और स्थानीय अधिकारियों की अनदेखी करने का आदेश दे रहे हैं।

यानी, देश के मुख्य कार्यकारी के रूप में ट्रम्प, एक ही वक्‍त में अमेरिकी कानून के शीर्ष प्रवर्तक भी हैं और वहां के शीर्ष गैंग लीडर भी हैं। यहां जी. के. चेस्टर्टन की कही एक बात याद आती है: “ईसायत इस धरती पर एकमात्र धर्म है जिसने महसूस किया है कि सर्वशक्तिमान ईश्‍वर अधूरा होता है। अकेले ईसाई धर्म को ही इस बात का अहसास है कि ईश्वर को संपूर्ण होने के लिए राजा होने के साथ-साथ बागी भी होना चाहिए।” थोड़ी विडंबना के साथ हम कह सकते हैं कि ट्रम्प प्रभावी रूप से तो ईसाई ईश्‍वर की तरह ही काम करने की कोशिश करते हैं जहां वे अपने देश को ज्यादातर अपने दैवीय फरमानों से चलाते हैं, और साथ ही वे राज्य के खिलाफ सबसे बड़े बागी की भूमिका में भी हैं।

ट्रंप का हालिया व्यवहार इस विरोधाभास को और स्पष्ट करता है। उन्होंने हाल ही में आंतरिक राजस्व सेवा (आइआरएस) के खिलाफ एक मुकदमा दायर किया है और 10 अरब डॉलर के हर्जाने की मांग की है। आइआरएस एक संघीय सरकारी एजेंसी है जिसके मुखिया खुद ट्रम्‍प हैं। उनका आरोप है कि व्यक्तिगत रूप से उनके साथ अन्याय हुआ है। जाहिर है, इस मुकदमे में फैसला तय करने का अंतिम अधिकार उन्हीं के पास होगा, कि वे कितनी रकम लेकर एजेंसी से समझौता करते हैं।

एक ऐसा मुकदमा जिसमें खुद ट्रम्‍प ही वादी और प्रतिवादी दोनों हैं, उस पर कुछ रिपब्लिकन सांसदों तक ने चिंता जताई है। ट्रम्‍प ने खुद इस मामले में अपनी “अजीब स्थिति” को स्वीकार किया है, जहां उन्हें “खुद से ही सौदा करना है।” कैलिफ़ोर्निया के एक डेमोक्रेट सीनेटर एडम शिफ़ ने इस पर ठीक ही टिप्‍पणी की है: “इस घोटाले को इतने बेधड़क साहस के साथ अंजाम देने का श्रेय तो आपको उन्‍हें देना ही होगा, भले यह कितना ही विकृत क्‍यों न हो। उन्‍होंने खुलेआम एकदम आपके मुंह पर दे मारा है।”

ऐसा दृश्‍य हमने पहले भी कुछ-कुछ देखा है- वास्तविकता में नहीं, बल्कि एक फिल्म में। वुडी एलन की शुरुआती उत्कृष्ट फिल्‍मों में से एक ‘बनानाज़’ (1971) को याद करिए। अदालत के एक दृश्य में नायक और मुकदमे का प्रतिवादी फील्डिंग मेलिश खुद ही अपना वकील बना है। वह अपने से जवाब तलब करता है, खाली कठघरे के ऊपर आक्रामक होकर चिल्लाता है, सवाल पूछता है, फिर भागकर सीट पर जाता है और बकबक करते हुए उलझे जवाब देता है। आधी सदी पहले जो दृश्‍य लतीफा था, अब वह यथार्थ बन चुका है।


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(आवरण चित्र AI निर्मित)


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