योगी सरकार ने साल भर पहले मदरसों का सर्वे क्या केवल दुष्प्रचार की मंशा से किया था?

आम चुनाव के करीब आते ही साम्‍प्रदायिक ध्रुवीकरण की तेज होती कोशिशों के बीच भाजपा के लिए मदरसे अहम चुनावी औजार बन गए हैं। कर्नाटक से लेकर हाल में संपन्‍न हुए राजस्‍थान चुनाव तक मदरसों का भाजपा के प्रचार में जिक्र आया। पिछले साल यूपी की सत्‍ता में लौटते ही योगी आदित्‍यनाथ की सरकार ने मदरसों का सर्वे करवाया था। साल भर बाद भी उसका अता-पता नहीं है। लखनऊ से असद रिज़वी की फॉलो-अप रिपोर्ट

उत्तर प्रदेश सरकार को सूबे के मदरसों का ‘सर्वे’ किए बीते नवंबर में एक साल पूरा हो गया, लेकिन अभी तक न तो इस सर्वेक्षण की रिपोर्ट विधानसभा में पेश हुई, न ही मान्यताविहीन मदरसों को मान्यता देने की कोई पहल शुरू की गई है। ऊपर से सरकार ने वित्तपोषित मदरसों के शिक्षकों और अन्‍य कर्मचारियों के रिकॉर्ड जांचने का एक नया आदेश 1 दिसंबर को दे डाला।

पिछले आठ साल से राज्‍य में एक भी नए मदरसे को मान्‍यता नहीं मिली है। इसके चलते लाखों बच्‍चों का भविष्‍य अधर में लटका पड़ा है। अब फरवरी में होने वाली मदरसा बोर्ड की परीक्षाओं के दौरान अतिरिक्‍त जांच की बात ने मदरसा संचालकों की बेचैनी बढ़ा दी है। साथ ही मदरसों के इर्द-गिर्द हो रही बयानबाजी और सियासत लगातार इनके खिलाफ माहौल रच रही है।

यही वजह है कि अब पिछले साल किए गए सरकारी सर्वे की मंशा पर सवाल उठ रहे हैं। क्या वह सर्वे सत्ताधारी दल की राजनीति का महज एक हिस्सा था जिससे मुस्लिम समाज में भय पैदा कर के हिन्दू वोट बैंक को संतुष्ट और संगठित किया जा सके? यह सवाल आगामी लोकसभा चुनावों के मद्देनजर अकेले उत्तर प्रदेश ही नहीं, बिहार सहित हिंदी पट्टी के सभी सूबों के लिए चिंताजनक और प्रासंगिक है।


सरकारी सर्वे में उत्तर प्रदेश में करीब 25 हजार मदरसों के होने की बात सामने आई है

पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव के बाद प्रदेश में दोबारा भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद मदरसों के सर्वे का मुद्दा उठा था। शुरुआत में मुस्लिम समुदाय ने मदरसों के सर्वे का विरोध किया, लेकिन सरकार द्वारा सर्वे के आदेश होने के बाद सभी मदरसों के दरवाजे सर्वे करने वाले सरकारी अधिकारियों की टीम के लिए खोल दिए गए थे।

बताया जा रहा कि सरकारी सर्वे में प्रदेश में करीब 25 हजार मदरसों के होने की बात सामने आई है, जिसमें लगभग 16,513 मदरसे उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा बोर्ड से मान्यता प्राप्त हैं और 8496 मदरसे अमान्य (सरकारी भाषा में ‘गैर मान्यता प्राप्त’) हैं।

शुरू में यह दावा किया जा रहा था कि इस सर्वे का मकसद मदरसों की शिक्षा प्रणाली को मुख्यधारा के साथ जोड़ना है। बाद में हालांकि इसे नया रंग दे दिया गया, जिसका नतीजा यह हुआ कि समाज का एक बड़ा वर्ग अमान्य मदरसों को ‘अवैध’ मदरसे बताकर उन पर हमला करने लगा और इसके बहाने संविधान में अल्‍पसंख्‍यकों को दिए गए अधिकारों पर एक नई बहस छिड़ गई। कहा जाने लगा कि बहुसंख्‍यकों को नुकसान पहुंचाकर अल्‍पसंख्‍यकों को लाभ दिए जा रहे हैं।

विपक्षी दलों ने तो शुरू से ही मदरसा सर्वे का विरोध किया था और सरकार की मंशा पर सवाल खड़े किए थे। जब मदरसा सर्वे का मुद्दा गरमाया, उस समय प्रमुख विपक्षी दल समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया पर लिखा था, “किसी भी सम्मानित धार्मिक-मज़हबी स्थान का सर्वे करवाना यदि न्यायपूर्ण नहीं है तो ये आस्थाओं को गहरी चोट पहुंचाता है। इंसाफ सबसे बड़ा धर्म होता है।” 

बहुजन समाज पार्टी ने भी मदरसा सर्वे पर कहा था कि ये मदरसे चंदों पर आश्रित हैं और गरीब बच्चों को तालीम दे रहे हैं। पार्टी सुप्रीमो और पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने अपना विरोध दर्ज करते हुए सरकार से सवाल किया था, “ये गैर-सरकारी मदरसे सरकार पर बोझ नहीं बनना चाहते, तो फिर इनमें दखल क्यों?

बिलकुल इसी तर्ज पर ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआइएमआइएम) के नेता असदुद्दीन ओवैसी ने सटीक संवैधानिक बात कही थी। ओवैसी ने मदरसा सर्वे को “मिनी एनआरसी” (नेशनल रजिस्टर फॉर सिटिजन्स) और असंवैधानिक ठहराते हुए तर्क दिया कि मदरसे संविधान के अनुच्छेद 30 के अंतर्गत स्थापित किए जाते हैं और सरकारों को इसमें दखल देने का कोई अधिकार नहीं है।

क्‍या वाकई सरकारें मदरसों के मामलों में दखल नहीं दे सकती हैं? इस बात को संविधान के अनुच्‍छेद 30 और उसकी व्‍याख्‍या से बेहतर समझा जा सकता है, लेकिन जिस तरीके से उत्‍तर प्रदेश सरकार ने सर्वे करवा के पहचाने गए ‘अमान्‍य’ मदरसों को जनधारणा में ‘अवैध’ साबित करने का काम किया है वह सबसे पहले उसकी मंशा पर सवाल खड़ा करता है।

उत्‍तर प्रदेश में हुए मदरसा सर्वे के लिए 12 प्रश्नों के आधार पर एक प्रोफार्मा बनाया गया था। योगी आदित्‍यनाथ की सरकार द्वारा गठित विशेष टीमों ने मदरसों के सर्वे के दौरान मदरसों के प्रबंधन कमेटियों से जो सवाल किए वे कुछ ऐसे थे:

मदरसे का नाम, मदरसे का संचालन करने वाली संस्था का नाम, मदरसा कब से चल रहा है, मदरसा निजी जगह में चल रहा है या किराये पर, मदरसे में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं की सुरक्षा के इंतजाम, मदरसे की बिल्डिंग, फर्नीचर, बिजली, शौचालय के इंतजाम, मदरसे में छात्र-छात्राओं और टीचर की कुल संख्या, मदरसे में पढ़ाया जा रहा सिलेबस, मदरसे की आय का स्रोत, मदरसे के कितने छात्र अन्य किसी स्कूल में पढ़ रहे हैं, मदरसे की सरकारी समूह या संस्था से संबद्धता है, तो उसका विवरण, और अभियुक्ति?


मदरसा सर्वे के लिए 12 प्रश्नों का प्रारूप

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने उस समय ही कहा था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से प्रभावित भाजपा सरकार मदरसों पर शिकंजा कस रही है। मौलाना खालिद सैफुल्लाह रहमानी, जो उस समय बोर्ड के महासचिव थे, उन्‍होंने सवाल किया था, “गुरुकुलों, मठों, धर्मशालाओं और अन्य धार्मिक संस्थानों के ख़िलाफ ऐसी कोई कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही है?” 

मदरसा सर्वे पर बात करते हुए उत्तर प्रदेश कांग्रेस (अल्पसंख्यक मोर्चा) के अध्यक्ष शाहनवाज आलम कहते हैं कि सर्वे का उद्देश्‍य केवल मुसलामानों में भय पैदा करना था ताकि उनका उत्पीड़न कर कट्टरपंथी हिन्दू समूह को खुश किया जा सके। वह मानते हैं सर्व शिक्षा अभियान में मदरसों की अहम भूमिका है।

ऐसा कहा जा रहा था कि सरकार का उद्देश्‍य सर्वे द्वारा अमान्य मदरसों की “फंडिंग और किसी बाहरी संगठन से जुड़ाव” आदि का डेटा इकट्ठा करना था, न कि मदरसों को मुख्यधारा से जोड़ना। अब जाकर उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा परिषद को भी महसूस हो रहा है कि सरकार द्वारा कराए गए सर्वे से कोई नतीजा अभी तक क्‍यों नहीं निकला है।

परिषद ने हाल में ही एक पत्र मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लिखकर याद दिलाया कि अमान्य मदरसों की मान्यता का काम अब भी लंबित है। बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. इफ्तिखार अहमद जावेद ने मुख्यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ को भेजे पत्र में याद दिलाया कि 2022 में मदरसा बोर्ड के प्रस्ताव पर शासन द्वारा प्रदेश स्थित मान्यताविहीन मदरसों का सर्वे कराया गया था। उस सर्वे की रिपोर्ट को आए 15 नवंबर, 2023 को एक साल पूरा हो गया है, जिसमें यह तथ्य पाया गया था कि 8449 ऐसे मदरसे संचालित हो रहे हैं जो मदरसा शिक्षा परिषद/विभाग से मान्यता प्राप्त नहीं हैं। 



डॉ. जावेद बताते हैं कि मदरसा शिक्षा परिषद ने आठ साल में प्रदेश के किसी भी मदरसे को मान्यता नहीं दी है। मान्यताविहीन मदरसों में पढ़ रहे बच्‍चों की अनुमानित संख्‍या साढ़े सात लाख के आसपास है। मदरसा सर्वे से पड़े नकारात्मक प्रभाव के बारे में डॉ. जावेद अफसोस जताते हुए कहते हैं  कि अब तो स्थिति यह हो गई है कि कुछ सामाजिक लोग भी भूलवश इन मदरसों को ‘अवैध’ कहने लगे हैं।

एक अहम बात जो अपने पत्र में डॉ. जावेद ने रेखांकित की थी, वो यह है कि इन मदरसों में पढ़ने वाले 90–95 प्रतिशत बच्चे पसमांदा समाज से आते हैं। जहां एक तरफ सत्तारूढ़ भाजपा पसमांदा (पिछड़े) मुसलमानों से स्नेह का दावा कर रही है, वहीँ प्रदेश की योगी सरकार की अनदेखी के कारण लाखों पसमांदा बच्चों का भविष्य दांव पर लगा हुआ है। 

मौलाना आदिल फराज कहते है कि मदरसों पर उंगली उठाने वाले और उनके साथ सौतेला बरताव करने वाले भूल जाते हैं कि देश के स्वतंत्रता संग्राम में मदरसों ने अहम भूमिका निभाई थी।

मौलाना आदिल याद दिलाते हैं कि मदरसे के छात्र रहे मौलाना मोहम्मद बाकिर ने 1857 में अंग्रेजों के खिलाफ अखबार निकाला था, जिसके बाद उनको फांसी दी गई। देश के पहले शिक्षा मंत्री और प्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मौलाना अबुल कलाम आजाद की शुरुआती पढ़ाई मदरसे से ही हुई थी।

“बींग मुस्लिम इन हिन्दू इंडिया” के लेखक जिया-उस-सलाम कहते हैं कि मदरसों को निशाना बनाने के पीछे का उद्देश्य यह है कि गरीब मुसलमानों की एक बड़ी संख्या पढ़ाई-लिखाई न कर सके, जिसका नतीजा यह होगा कि वे गाड़ी का पंचर बनाएंगे, जैसी धारणा उनके लिए बनाई भी जाती है। आखिर में उनकी साक्षरता दर कम होगी और उनकी अर्थव्यवस्था कमजोर होती चली जाएगी।

इसके साथ ही हालांकि जिया उस सलाम यह भी मानते हैं कि मौजूदा समय में मदरसों का स्वरूप बदला है। जबकि इस्लामिक मदरसे की अवधारणा में केवल धार्मिक विषय या उर्दू ही नहीं बल्कि मदरसों में विज्ञान और दर्शनशास्‍त्र जैसे विषय पढ़ाया जाना भी है। वे बताते हैं कि पहले भी यह विषय मदरसों में पढ़ाए जाते थे।



वामपंथी नेता मोहम्मद सलीम कहते हैं कि जब यूनिवर्सिटी नहीं होती थी तब सभी मदरसों में ही पढ़ने जाते थे। आज आर्थिक रूप से कमजोर गरीब मुसलामान मदरसों में पढ़ाई के लिए अपने बच्चों को भेजते हैं। उनका मानना यह है कि यूनिवर्सिटी के छात्रों की बड़ी संख्या अक्सर बेरोजगारी का शिकार हो जाती है, लेकिन कम कमाई के बावजूद मदरसे के अधिकतर छात्रों को काम मिल जाता है। मदरसे अपना खर्च खुद ज़कात (इस्लाम की अनिवार्य दान प्रणाली) जमा कर के उठा लेते हैं, किसी पर आर्थिक भार नहीं डालते हैं। 

मदरसों की भूमिका के बारे में बात करते हुए मदरसा टीचर्स एसोसि‍एशन के राष्ट्रीय महामंत्री वहीदुल्लाह खान सईदी कहते हैं कि बड़ी संख्या में मदरसे गरीब बच्चों के पठन-पाठन की निशुल्क व्यवस्था करते हैं और बड़े पैमाने पर राष्ट्र की साक्षरता दर को बढ़ाने में भूमिका अदा कर रहे हैं। 

उत्‍तर प्रदेश में मदरसों को लेकर समय-समय पर अलग-अलग विवाद खड़े होते रहे हैं। मदरसा सर्वे की रिपोर्ट आने के दो महीने बाद दिसंबर 2022 में प्रदेश में मदरसों में गैर-मुस्लिम बच्चों की पढ़ाई को लेकर राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) और उत्तर प्रदेश मदरसा परिषद के बीच विवाद उत्पन्न हो गया था।

एनसीपीसीआर ने गैर-मुस्लिम बच्चों की मदरसे में पढ़ाई का विरोध शुरू किया और उनको सामान्य स्कूलों शिफ्ट करने की मंशा जाहिर की थी, हालांकि मदरसा बोर्ड एनसीपीसीआर की मंशा के खिलाफ था। उसने साफ कहा कि किसी भी गैर-मुस्लिम बच्चे को मदरसे से नहीं निकाला जाएगा।

यह विवाद आयोग (एनसीपीसीआर) द्वारा उत्तर प्रदेश सरकार को भेजे गए एक पत्र से शुरू हुआ था। आयोग ने अपने पत्र में कहा था कि मदरसों में गैर-मुस्लिम बच्चों का सर्वे कर उनका प्रवेश अन्य सामान्य स्कूलों में कराया जाए जबकि परिषद ने आयोग (एनसीपीसीआर) की बात मानने से साफ इंकार कर दिया था।



एनसीपीसीआर के अध्यक्ष प्रियंक कानूनगो ने सोशल मीडिया पर अपने पत्र की मंशा को जाहिर करते हुए लिखा था कि मदरसे प्राथमिक रूप से “इस्लामिक धार्मिक शिक्षा” सिखाते हैं इसलिए वहां हिंदू या दूसरे बच्चों का कोई काम नहीं है। 

जब मदरसों के सर्वे को लेकर यह नया विवाद जन्म ले रहा था और मदरसा शिक्षा को “पिछड़ेपन” और “कट्टरता” से जोड़कर प्रचारित किया जा रहा था, उस वक्‍त देश के अलग-अलग मदरसों के छात्र नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट (नीट) में कामयाब हो रहे थे।

सितंबर 2002 में लखनऊ स्थित दारुल उलूम फरंगी महल में मदरसे के कुछ ऐसे छात्र मेहमान के रूप में आए जिन्होंने सरकार और मुख्यधारा के मीडिया द्वारा मदरसों के खिलाफ बनाए जा रहे भ्रामक “नैरेटिव” को तोड़ा था। चिकित्सा पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए यूजी स्तर पर आयोजित की जाने वाली देश की एकल प्रवेश परीक्षा “नीट” में इन्‍होंने अपना झंडा फहराया था।


मदरसों का नाम रोशन करने वाले छात्र

करीब चार साल तक बेंगलूरू में रह कर मदरसा जियाउल कुरान में कुरान हिफ्ज़ (याद कर लेना) करने वाले मोहम्मद अली इकबाल को नीट की परीक्षा में 680 अंक प्राप्त हुए थे। इसी तरह, प्राथमिक शिक्षा मदरसे में लेने के बाद गुलमन अहमद जर्दी ने हाईस्कूल में 96 प्रतिशत अंक प्राप्त किए थे। मदरसे में जर्दी ने कुरान हिफ्ज़ किया और कक्षा 12 के साथ मेडिकल शिक्षा की तैयारी शुरू कर दी और नीट में 646 अंक प्राप्त किए।

हुजैफा मंजूर मिर्जा ने कक्षा सातवीं से दीनी (धार्मिक) तालिम हासिल की और नीट में उनको 602 अंक प्राप्त हुए थे। मोहम्मद सफीउल्लाह कक्षा चार के बाद से मदरसे से जुड़ गए थे। उनके पिता एक मस्जिद में नमाज पढ़ते हैं और उनका एक भाई डॉक्टर हैं। सफीउल्लाह ने कुरान हिफ्ज़ करने के बाद आधुनिक पढाई शुरू की और कक्षा 10 में 91 तथा कक्षा 12 में 93 प्रतिशत अंक प्राप्त किए। नीट में उन्‍होंने 577 अंक प्राप्त किए।

भाजपा सरकार की मदरसों के प्रति अनदेखी के खिलाफ अब मदरसों में पढ़ाने वाले शिक्षक मुखर हो रहे हैं। एक तो मान्यता का मसला है ही, दूसरे मानदेय का सवाल भी अटका पड़ा है।

आल इण्डिया टीचर्स एसोसीएशन मदारिसे अरबिया का कहना है कि प्रदेश में संचालित अरबी फारसी मदरसों की 2015 के बाद से ही उत्‍तर प्रदेश मदरसा शिक्षा परिषद द्वारा मान्यता प्रदान नहीं की जा रही है। वहीदुल्लाह खान सईदी के अनुसार प्रदेश में संचालित मान्यताविहीन मदरसों के संचालन में उनके सामने कानूनी मुश्किलें आ रही हैं।

सईदी कहते हैं कि बेसिक शिक्षा, माध्यमिक शिक्षा और मदरसा शिक्षा के अधिकारियों द्वारा अमान्य करार दिए गए मदरसों के संचालन पर “रोक लगाने और आर्थिक दण्ड” लगाने की धमकियां नियमित रूप से दी जा रही हैं।

सर्वे के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा कि करीब 7500 मदरसे मान्यताविहीन पाए गये थे। इन मदरसों को निर्देश दिए गए थे कि वे परिषद से अविलम्ब मान्यता प्राप्त कर लें, परन्तु परिषद द्वारा मान्यता के सन्दर्भ में आज तक कोई प्रक्रिया संचालित नहीं की गई। सईदी की मानें, तो उत्तर प्रदेश के अमान्य मदरसों की मान्यता हेतु पत्रावली परिषद के कार्यालय में जमा है और अनेक मदरसों के संचालक मान्यता की प्रक्रिया चालू होने का इंतजार कर रहे हैं, जिसके लिए मदरसा बोर्ड को पत्र भी भेजा जा चुका है।


बकाया भुगतान नहीं, तो चुनाव के बाद पढ़ाई बंद: मदरसा शिक्षकों का ऐलान

शाहनवाज आलम बताते हैं कि सरकार मदरसों का सर्वे तो करवा रही थी, लेकिन वहां आधुनिक विषय पढ़ाने वाले शिक्षकों के बकाया मानदेय देने की सरकार को कोई फिक्र नहीं है। गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त 21,000 से अधिक मदरसा शिक्षकों को पिछले कई वर्षों से मानदेय नहीं दिया गया है। इन शिक्षकों को (मदरसों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने की योजना) के तहत नियुक्त किया गया था, जिसे 2009 में धार्मिक स्कूलों में शिक्षा प्रणाली को आधुनिक बनाने के लिए पेश किया गया था। 

मदरसा आधुनिकीकरण शिक्षक एकता समिति के अध्यक्ष अशरफ अली ‘सिकंदर’ ने बताया कि उत्तर प्रदेश में इस योजना के तहत 7742 मदरसे पंजीकृत हैं जहां ये शिक्षक मदरसा पाठ्यक्रम के अलावा विभिन्न विषय जैसे इंग्लिश, हिन्दी, मैथ, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान और कंप्यूटर आदि पढ़ाते हैं। प्रत्येक मदरसे में धर्म से इतर दूसरे विषयों को पढ़ाने के लिए दो-तीन शिक्षक नियुक्त हैं। 

सिकंदर के अनुसार, पहले केंद्र सरकार ने 2017-18 में मानदेय रोका। अब प्रदेश सरकार ने भी मानदेय देना बंद कर दिया है। उन्होंने कहा कि अगर लोकसभा चुनावों तक शिक्षकों का बकाया अदा नहीं हुआ तो वे चुनावों के बाद पढ़ाना छोड़ देंगे। 

मदरसों के शिक्षकों को मीडिया में की जा रही रिपोर्टिंग से भी ऐतराज है। सईदी मानते हैं कि देश के प्रिन्ट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अमान्य मदरसों को फर्जी मदरसा साबित करने का प्रचार कर बड़े-बड़े मदरसों पर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर रहे हैं, जिसके चलते राष्ट्र की साक्षरता दर के प्रभावित होने की आशंका है।

उत्‍तर प्रदेश में मदरसों का भविष्‍य तो अधर में है ही, बिहार सरकार ने भी इस मामले में चाल चल दी है। खबर है कि राज्य सरकार ने एक झटके में अपने यहां के 50 मदरसों की मान्‍यता रद्द कर दी है। इनमें 32 मदरसे अकेले एक जिले दरभंगा से हैं। यह खबर दैनिक जागरण ने छापी है, हालांकि सरकार की तरफ से अभी कोई बयान नहीं आया है।

दिलचस्‍प है कि यह खबर तब सामने आई है जब भाजपा के नेता गिरिराज सिंह ने मुख्‍यमंत्री नीतिश कुमार से मांग की कि बिहार में ‘अवैध’ मदरसों पर रोक लगाई जाए। इस बयान पर सियासी बवाल मच गया था। बिहार के पंचायती राज मंत्री ने इसके जवाब में कह दिया था कि ‘किसी की औकात नहीं है कि बिहार में मदरसे को बंद कर दे’, तो शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर ने गिरिराज सिंह की डिग्री मांग दी थी।   

यह जुबानी विवाद अभी थमा नहीं था कि दरभंगा, समस्‍तीपुर, किशनगंज और पूर्वी चंपारण के मदरसों का कथित रूप से वेतनअनुदान रोक कर इनकी मान्‍यता रद्द कर दी गई। बताया जाता है कि यह कदम उच्‍च न्‍यायालय के निर्देश पर गठित तीन सदस्‍यों की एक समिति की सिफारिश पर उठाया गया है जिसने 142 मदरसों की जांच की थी।

पिछले ही महीने राजस्‍थान विधानसभा चुनाव के प्रचार के दौरान भाजपा के एक नेता ने मस्जिदों और गुरुद्वारों की बढ़ती संख्‍या पर चिंता जताई थी। जब शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने इस पर एतराज जताया, तो उक्‍त नेता ने अपना बयान बदलते हुए कह दिया कि उनका आशय ‘मस्जि‍दों-मदरसों’ से था, गुरुद्वारे से नहीं।



कर्नाटक विधानसभा चुनाव में भी ऐसे बयान देखने को मिले थे, जब भाजपा के एक नेता ने कहा था कि अगर उनकी सरकार जीतकर आई तो वे मदरसों को बंद कर देंगे।

आम चुनाव के पास आते जाने के साथ जिस ढंग से मदरसों को बंद करने की मुनादी और उनको बदनाम करने की बयानबाजी हो रही है, वैसे में यह समझना बहुत जरूरी है कि नेताओं के ऐसे बयान और सरकारों के ऐसे हस्‍तक्षेपकारी कदम आखिर क्‍यों बुनियादी रूप से ‘असंवैधानिक’ हैं।  

भारत में भाषाई और धार्मिक समूहों के पास कौन से अधिकार प्राप्‍त हैं? भारत में ऐसे केवल तीन अधिकार हैं। इनमें से एक भी सामाजिक-आर्थिक या राजनीतिक नहीं है।

पहला, अपनी पसंद के स्‍कूल या संस्‍थान चलाने का अधिकार (अनुच्‍छेद 30); दूसरे, अपनी विशेष भाषा, लिपि या संस्‍कृति का संरक्षण करना (अनुच्‍छेद 29); और तीसरा, जो कि खास तौर से धार्मिक समूहों के लिए है- धार्मिक दायरे में अपनी गतिविधियों का प्रबंधन और इस हेतु संस्‍थानों की स्‍थापना व उनक रखरखाव (अनुच्‍छेद 26)।

इनमें संविधान का अनुच्‍छेद 30 स्‍पष्‍ट कहता है:

(1) सभी अल्पसंख्यकों को, चाहे वे धर्म या भाषा पर आधारित हों, अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने और संचालित करने का अधिकार होगा;
(2) राज्य शैक्षणिक संस्थानों को सहायता देते समय किसी भी शैक्षणिक संस्थान के ख़िलाफ इस आधार पर भेदभाव नहीं करेगा कि यह किसी अल्पसंख्यक के प्रबंधन के अधीन है, चाहे वह धर्म या भाषा पर आधारित हो।


अल्पसंख्यक अधिकार बहुसंख्यकों का विशेषाधिकार हनन नहीं हैं

इसका अर्थ क्‍या है? राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर और विश्‍व-प्रसिद्ध विद्वान राजीव भार्गव के मुताबिक (द हिंदू में स्‍तंभ):

अधिकार का मतलब है किसी व्‍यक्ति के हित में कानूनी रूप से किया गया प्रावधान जो दूसरों पर उससे छेड़छाड़ न करने का कर्तव्‍य डालता है। अगर मुझे धार्मिक आजादी का अधिकार मिला है, तो कोई दूसरा मेरे चुनाव और धार्मिक आचार में दखल नहीं दे सकता। ऐसे कुछ अधिकार व्‍यक्तियों के बजाय समूहों को दिए गए हैं क्‍योंकि कुछ कृत्‍य समूह ही संपन्‍न कर सकते हैं, व्‍यक्ति नहीं। मसलन, एक भाषा को बोलना, एक धार्मिक आचार को बरतना, या एक प्रथा को कायम रखना अकेले एक व्‍यक्ति के वश में नहीं है, यह समूह का काम है। इसीलिए भाषाई और धार्मिक अधिकार समूहों को दिए गए हैं और उन्‍हें सशक्‍त किया गया है कि इसमें दूसरे के गलत हस्‍तक्षेप को वे दूर रख सकें। ये अधिकार निजी अधिकारों के पूरक का काम करते हैं, उनसे प्रतिस्‍पर्धा नहीं करते। समूह अधिकार का इस्‍तेमाल उक्‍त समूह के किसी सदस्‍य की आजादी पर बंदिश लगाने में नहीं किया जा सकता।

‘गलत हस्‍तक्षेप’ का यही वह नुक्‍ता है जो राजनीतिक दलों से लेकर प्रांतों की सरकारों को समझना होगा। इसके साथ एक और अहम बात उनके समझने की है जो अल्‍पसंख्‍यक अधिकारों को अपने अधिकारों में कटौती के रूप में देखते हैं। इनमें ज्‍यादातर गैर-मुसलमान या बहुसंख्‍यक लोग हैं।

प्रो. भार्गव लिखते हैं कि जिस तरह शारीरिक रूप से सक्षम लोगों को किसी अलग प्रवेश द्वार की जरूरत नहीं होती, वैसे ही सामाजिक और राजनीतिक रूप से सशक्‍त बहुसंख्‍यकों को विशेष अधिकार की जरूरत नहीं होती है। जिस तरह शारीरिक विकलांग व्‍यक्तियों को किसी विशेष प्रवेश द्वार की जरूरत होती है ताकि वे भी वही कर सकें जो आम लोग नियमित रूप से करते हैं, उसी तरह संख्‍या व ताकत में कम समूहों को अलग सांस्‍कृतिक, भाषाई व धार्मिक अधिकारों की जरूरत पड़ती है।

यानी, अल्‍पसंख्‍यक को जिस चीज का लाभ मिलता है, वह बहुसंख्‍यक के पास पहले से ही मौजूद है। अल्‍पसंख्‍यक उस लाभ के बदले बहुसंख्‍यक का कुछ छीनता नहीं है। इसलिए अल्‍पसंख्‍यक अधिकारों के विचार में कहीं कोई दिक्‍कत नहीं है। विविधता और बराबरी वाले समाजों में अल्‍पसंख्‍यक अधिकारों का होना एक अच्‍छी बात है।


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