Fascism

A Gen-Z protestor at Jantar Mantar, 24 July 2026 (Abhishek Srivastava/FUS)

क्‍या लोकतंत्र में तानाशाही को संवैधानिक रूप से बैन किया जा सकता है? एक जरूरी सबक

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क्‍या लोकतंत्र में एक अलोकतांत्रिक दल पर प्रतिबंध की कार्रवाई करना अलोकतांत्रिक है? यह दुविधा कम से कम सौ साल पुरानी है, लेकिन इसे हल करने की मिसाल 1950 के दशक के जर्मनी में मौजूद है। जब लोकतंत्र को निगल जाने वाली तानाशाही ताकत चुनावी रास्‍ते से सत्ता में आ जाए, तो संविधान और अदालतें बहुत कुछ ऐसा कर सकती हैं जिससे लोकतंत्र में स्‍वस्‍थ राजनीतिक प्रतिस्‍पर्धा की बहाली हो सके। प्रिंस्‍टन में राजनीतिशास्‍त्र के प्रोफेसर यान-वर्नर म्‍यूलर की प्रासंगिक टिप्‍पणी, प्रोजेक्‍ट सिंडिकेट के सौजन्‍य से

MAGA rally US, Courtesy Project Syndicate

किताबी फासीवाद : अपने वैचारिक वारिसों के लिए बीसवीं सदी के फासिस्टों की नुस्खा-पर्ची कैसी होगी?

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जो नाज़ीवादी और फासीवादी ताकतें बीसवीं सदी में चले लोकतांत्रिक संघर्षों में खत्‍म हो गई मानी जा रही थीं, उनका इक्‍कीसवीं सदी में नई शक्‍ल में उभार यह सोचने को विवश करता है कि उनकी योजना क्‍या है और आने वाली दुनिया की सूरत कैसी होगी। प्रोजेक्‍ट सिंडिकेट के सौजन्‍य से प्रसिद्ध अर्थशास्‍त्री यानिस वारूफाकिस की एक कल्‍पना, जिसमें वे गिनवा रहे हैं कि आज के फासिस्‍टों के पूर्वज अगर किसी तिजोरी में कोई नुस्‍खा-पर्ची छोड़ गए रहे हों तो उस पर क्‍या-क्‍या लिखा होगा।

‘बुराई को रोजमर्रा की मामूली चीज बना दिया गया है और चेतावनी का वक्त जा चुका है’!

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अपने निबंध संग्रह ‘आज़ादी’ के फ्रेंच अनुवाद के लिए अरुंधति रॉय द्वारा 2023 यूरोपियन एस्से प्राइज़ फ़ॉर लाइफ़टाइम एचीवमेंट स्वीकार करते समय लौज़ान, स्विट्ज़रलैंड में दिए गए भाषण के प्रासंगिक अंश। अनुवाद रेयाज़ुल हक़ ने किया है।