बीसवीं सदी की राजनीतिक तबाहियों से जितने भी सबक निकले हैं, उनमें से एक सबक बड़ा विरोधाभासी किस्म का है। वो यह है, कि लोकतंत्रों को ऐसी ताकतों के खिलाफ अलोकतांत्रिक लगने वाले उपाय कभी-कभार अपना लेने चाहिए जो सत्ता हासिल करने के लिए लोकतांत्रिक व्यवस्था का दोहन करते हैं और फिर पूरी तरह से लोकतंत्र को ही खत्म कर देते हैं। इस सबक में हालांकि समस्या ये है कि खुद इसके ऊपर ही यह आरोप लग सकता है कि ऐसा करने से लोकतंत्र का ह्रास हो जाएगा।
हाल के वर्षों में दुनिया भर में धुर दक्षिणपंथी दलों के उभार के साथ यह दुविधा फिर से खुलकर सामने आ गई है। इनमें से कई ऐसे दल हैं जिनके तमाम नेता खुद को लोकतंत्र का सच्चा पैरोकार बताते नहीं अघाते हैं। कुछ टिप्पणीकार मानते हैं कि इस विरोधाभास का कोई समाधान नहीं।
मेरे खयाल से इसे हल किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, धुर दक्षिणपंथी पार्टी ऑल्टरनेटिव फॉर जर्मनी (एएफडी) पर विचार करें। यह पार्टी जर्मनी की संवैधानिक व्यवस्था के लिए जो खतरा पैदा करती है, उसे देखते हुए एएफडी पर सीधे प्रतिबंध लगाने का एक मजबूत तर्क है।
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जर्मनी से निर्वासित यहूदी कार्ल लोवेनस्टीन उन पहले लोगों में से थे जिन्होंने 1930 के दशक में यह तर्क दिया था कि लोकतंत्रों को उन लोगों के मौलिक अधिकारों को प्रतिबंधित कर देना चाहिए जो लोकतांत्रिक साधनों का उपयोग तानाशाही उद्देश्यों को हासिल करने के लिए करते हैं। उनका आग्रह था कि जब फासिस्ट दलों के उदय को रोका जाना नामुमकिन हो जाय, तो लोकतंत्रों को “आग का जवाब आग से देना” चाहिए।
उस वक्त भी यह समझदारी कायम थी कि लोकतंत्र अगर अलोकतांत्रिक आचरण करने लगे तो वह आत्म-विनाशकारी साबित हो सकता है। फिर भी, इस नुस्खे को दूसरे विश्व युद्ध के बाद अपनाया गया और पश्चिमी जर्मनी के मूल कानून में शामिल कर के इसे लागू किया गया। जर्मन संघीय संवैधानिक न्यायालय ने नाज़ियों की उत्तराधिकारी पार्टी पर प्रतिबंध लगाकर, और फिर 1950 के दशक में जर्मन कम्युनिस्ट पार्टी पर प्रतिबंध लगाकर इसे लागू किया।
इसी अदालत ने हाल ही में एक छोटी नव-नाज़ी पार्टी एनपीडी (जिसका नाम बाद में बदलकर Die Heimat कर दिया गया) पर प्रतिबंध लगाने के प्रयास को इस आधार पर खारिज कर दिया कि सत्ता हासिल करने की उसकी संभावना ज्यादा मजबूत नहीं है। इसके बजाय अदालत ने सुझाव दिया कि जिन दलों को आधिकारिक तौर पर लोकतंत्र के प्रति शत्रुतापूर्ण घोषित किया जा चुका है, उनका सरकारी वित्तपोषण रोकने के लिए सांसद संविधान में संशोधन करें। उसके बाद से जर्मनी के कानून में उपयुक्त संशोधन किया जा चुका है।
एनपीडी के विपरीत, एएफडी इस साल के अंत में होने वाले चुनावों में पूर्वी जर्मनी के एक प्रांत में बेशक अपनी सरकार बना सकती है। इस संभावना को ताड़ते हुए विशेषज्ञों की एक अत्यधिक प्रतिष्ठित टीम ने हाल ही में इस पर एक भारी भरकम रिपोर्ट प्रकाशित की है, कि इस पार्टी के ऊपर प्रतिबंध को संवैधानिक न्यायालय द्वारा मंजूरी दी जा सकती है या नहीं। इस रिपोर्ट में लेखकों ने न केवल एएफडी के आधिकारिक पार्टी कार्यक्रमों का, बल्कि पार्टी के नेताओं और उनके फॉलोवर्स (और 29 लाख सोशल मीडिया पोस्ट का भी) के तमाम बयानों का भी विश्लेषण किया है।
इस रिपोर्ट का मूल्यांकन करने वाले न्यायविदों ने इसकी कठोर अनुशंसा के प्रति व्यापक रूप से सकारात्मक रुख अपनाया है, भले ही कुछ को इस बात पर संदेह है कि एएफडी के भेदभावपूर्ण नीतिगत प्रस्ताव ऐसे नहीं हैं कि मानवीय गरिमा का कानून उल्लंघन कर सकते हों। एएफडी को बैन करने के प्रस्ताव की राजनीतिक तस्वीर हालांकि कानूनी तस्वीर के मुकाबले ज्यादा धुंधली है। कई टिप्पणीकार इस बात से चिंतित हैं कि एक ऐसी पार्टी पर प्रतिबंध लगाना जो पूर्वी जर्मनी के एक प्रांत में 40 फीसद तक वोट हासिल कर सकती है- और जो वर्तमान में राष्ट्रीय सर्वेक्षणों में शीर्ष पर है- नागरिकों के एक बड़े हिस्से को राजनीतिक प्रक्रिया से बाहर करने के समान होगा। वे चेतावनी देते हैं कि ऐसा प्रतिबंध कई मतदाताओं को लोकतंत्र से पूरी तरह निराश कर सकता है, साथ ही धुर दक्षिणपंथियों को शहादत का चोला पहनने का एक मौका दे सकता है।
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उनकी ये चिंताएं अतिरंजित हैं। बेशक पार्टी और उसे मिले वोट का आकार मायने रखता है, लेकिन अगर आप एक ऐसी छोटी पार्टी पर प्रतिबंध नहीं लगा सकते जिसके सत्ता में आने की संभावना बहुत कम है (एनपीडी), तब उसी तर्क से आप एक बड़ी पार्टी (एएफडी) पर प्रतिबंध के खिलाफ दलील नहीं दे सकते। बहुत स्वाभाविक सी बात है कि एक लोकतंत्र-विरोधी पार्टी जितनी बड़ी होगी, लोकतंत्र के लिए वह उतना ही बड़ा खतरा भी होगी।
दूसरी बात, जरूरी नहीं कि प्रतिबंध की लागत अधिक ही हो। हां, कुछ नागरिकों को बेशक वंचित महसूस हो सकता है, लेकिन ऐसा तो हमेशा ही होता रहेगा। लोकतंत्र कोई युटोपिया नहीं है जिसमें हर किसी की विशेष मांगों का हमेशा सम्मान ही किया जाए। कुछ राजनीतिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए दूसरे लक्ष्यों को हारना ही पड़ता है। और कभी-कभी, लोकतांत्रिक शासन, कानून के राज और मानवीय गरिमा के प्रति राजनीतिक व्यवस्था की मौलिक प्रतिबद्धताओं को बनाए रखने के लिए किसी के पसंदीदा कार्यक्रम पर प्रतिबंध लगाना आवश्यक हो जाता है। केंद्रीय आवश्यकता यह है कि समय के साथ लोकतंत्र में स्वतंत्र और निष्पक्ष राजनीतिक प्रतिस्पर्धा जारी रहे।
कोई यह आपत्ति कर सकता है कि यदि किसी अतिदक्षिणपंथी सरकार ने कुछ अल्पसंख्यकों की समान स्थिति को कमजोर करने वाले कानून बनाती है, तो अदालतें उन्हें रद्द कर ही देंगी। लेकिन आत यह है कि ऐसा होने तक तो लोग कष्ट झेलेंगे ही, इसलिए किसी पार्टी को खुले तौर पर अलोकतांत्रिक उद्देश्यों की वकालत करने की अनुमति देना भी देश की राजनीति को नुकसान ही पहुंचाएगा क्योंकि इससे नागरिकों को यह संकेत मिलेगा कि ऐसे लक्ष्य स्वीकार्य हो सकते हैं।
फिर, यह डर कि प्रतिबंध लगाने से दक्षिणपंथी लोग खुद को शहीद बता देंगे, यह भी अनुपयुक्त है क्योंकि धुर दक्षिणपंथी खेमे के लोकलुभावन नेता पहले से ही खुद को शहीद के रूप में प्रस्तुत करने के आदी होते हैं। उनकी रणनीति ही नागरिकों को यह यकीन दिलाने की होती है कि उन्हें एक षडयंत्रकारी सत्ता दबा रही है, और वे ही हैं जो सत्ता के सामने अकेले सच बोल रहे हैं।
उदाहरण के लिए आप फ्रांस में मरीन ले पेन या युनाइटेड किंगडम में नाइगेल फरागे को ही देख लीजिए। ये नेता तो राजनीति के मैदान में प्रतिस्पर्धा के लिए आजाद हैं (बुनियादी नियमों को तोड़ने के बावजूद), फिर भी वे खुद को कुलीन वर्ग की साजिशों का शिकार ही दिखाते हैं।
एक और गंभीर आपत्ति बचती है। यदि धुर दक्षिणपंथ के ऊपर यह आरोप है कि वह लोगों को राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से बाहर करने या लोकतांत्रिक चुनाव में धांधली करने की कोशिश करता है (यह आरोप AfD के खिलाफ भी है), तो यह नुस्खा विरोधाभासी लग सकता है कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए एक पार्टी को दौड़ से बाहर रखना आवश्यक होगा।
यह तर्क भी एक महत्वपूर्ण बिंदु की अनदेखी करता है। चरम दक्षिणपंथी आम तौर पर उस बुनियादी लोकतांत्रिक समझौते को ही खारिज करते हैं जिसे बाकी सब ने स्वीकार कर लिया है। लोकतंत्र इस पारस्परिक इच्छा पर निर्भर करता है कि जो भी चुनाव जीते, उसके द्वारा शासित होने के लिए तैयार रहा जाए, लेकिन कई अतिदक्षिणपंथी नेताओं ने यह साफ कर दिया है कि वे इस समझौते का सम्मान नहीं करेंगे। एक तो वे चाहते हैं कि उनकी शक्ति पर कोई अंकुश न हो, और दूसरे वे ऐसे किसी भी प्रतिनिधि से शासित होने को स्वीकार करने से इनकार करते हैं जिन्हें वे अपनी नजर में “असली” नहीं मानते।
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यह बात केवल अनुमान की नहीं है। सत्ता में आने वाले तमाम धुर दक्षिणपंथी नेता- हंगरी में विक्टर ओर्बन और पोलैंड में जारोस्लाव काज़िंस्की से लेकर संयुक्त राज्य अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प तक- ने लगातार उन परिस्थितियों को अपने पक्ष में झुकाने की कोशिश की है जो सभी के लिए समान होनी चाहिए। आप एक दक्षिणपंथी पार्टी को पर्याप्त समय और ताकत देंगे तो वह “प्रतिस्पर्धी तानाशाही” को जन्म दे सकती है: एक ऐसी प्रणाली जिसमें चुनाव तो होते हैं, लेकिन निष्पक्ष नहीं होते।
यानी, लोकतंत्र में लोकतंत्रवादियों का पक्ष वह है जो राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को बनाए रखना चाहता है; दूसरा तानाशाहों का पक्ष है जो प्रतिस्पर्धा को स्थायी रूप से समाप्त करना चाहता है। इसीलिए लोकतंत्रवादियों और तानाशाहों के प्रति बरताव को लेकर दोहरे मानदंड की कोई भी शिकायत अपने आप में गलत है।
कॉपीराइट: प्रोजेक्ट सिंडिकेट, 2026