Justice

Nobel Peace Prize laureate Navi Pillay visits International Criminal Court, 12 October 2026

Nobel Peace Prize: निरंकुशता के दौर में लगातार सच कहते जाने की सहजता के नाम

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नोबेल पुरस्कारों की अपनी कुछ सीमाएं हैं। उसका इतिहास विवादों से मुक्त नहीं है। पिछले साल हुई शांति पुरस्‍कार की किरकिरी उदाहरण है। वैसे भी, पुरस्कार देना दुनिया में शांति नहीं ला देता, लेकिन कभी-कभार कोई पुरस्कार व्यक्ति से अधिक उस सिद्धांत के सम्‍मान में होता है जिसका वह व्यक्ति महज प्रतिनिधि बन जाता है। इस बार की नोबेल शांति पुरस्‍कार विजेता दक्षिण अफ्रीकी न्‍यायविद् नवि पिल्‍लै के मामले में यह बात सच है। जब पूरी दुनिया में निरंकुश सत्ताएं कानून के राज को खारिज करती जा रही हों, पिल्‍लै को मिला सम्‍मान नूरेम्‍बर्ग से इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट तक चली आई द्वितीय विश्‍वयुद्धोत्तर विरासत को बचाने का महत्त्व रेखांकित करता है, जिसके मूल में कानून की सार्वभौमिकता और मनुष्‍य की गरिमा का सिद्धांत है। शैलेंद्र चौहान की टिप्‍पणी

Fali S. Nariman

न्याय की अंतहीन प्रतीक्षा और एक न्यायविद का अधूरा प्रायश्चित

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अदालती फैसले मुकदमों का अंत नहीं होते। फैसलों के बरसों बाद तक लोग जजों और वकीलों के बारे में अपने-अपने फैसले सुनाते रहते हैं। जज और वकील तो अपनी पेशेवर भूमिका निभाकर और अपने हिस्‍से के सारे तमगे बंटोरकर एक दिन गुजर जाते हैं, लेकिन फिजाओं में उन हादसों के शिकार लोगों का आर्तनाद गूंजता रहता है जिन्‍हें नैतिकता को ताक पर रखकर इन्‍होंने दबाने का काम किया था। दिवंगत न्‍यायविद् फली एस. नरीमन पर डॉ. गोपाल कृष्‍ण का स्‍मृतिलेख

तीन साल बाद भूलगढ़ी: हाथरस की वह घटना, जिसने लोकतंत्र को नाकाम कर दिया

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आज हाथरस गैंगरेप कांड को तीन साल हो गए। तकनीकी रूप से साबित किया जा चुका है कि यह रेप कांड नहीं था। हत्‍या की मंशा भी नहीं थी। केवल एक आदमी जेल में है, तीन बाहर। परिवार कहीं ज्‍यादा सघन कैद में, जिसका घर सीआरपीएफ की छावनी बन चुका है। गांव से बाहर निकलने की छटपटाहट अदालतों में नाकाम हो चुकी है, हाथरस से शुरू हुई बंटवारे की राजनीति कामयाब। एक जीता-जागता गांव कैसे तीन साल में मरघट बन गया, बता रही हैं गौरव गुलमोहर के साथ भूलगढ़ी से लौटकर नीतू सिंह इस फॉलो-अप स्‍टोरी में