Kumbh 2025

Bhado Mela, Ratanpur, Kutch

पारंपरिक मेलों का सिकुड़ता संसार, पूंजी के हमले में बेदखल होते जा रहे अनुभवी कामगार

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श्रावणी मेले शुरू हो चुके हैं। अब साल के अंत तक मेलों का सिलसिला देश में चलता रहेगा और उत्‍सवी माहौल तो होली के बाद ही जाकर थमेगा। जो समाज साल के आधे से ज्‍यादा वक्‍त मेले-ठेले, व्रत-त्‍यौहार, जलसों और यात्राओं में गुजारता हो, वहां सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि कितनी बड़ी आबादी का जीवन-जगत इनके सहारे टिका होगा। छह साल पहले अचानक आए कोरोना ने समाज में दूरियां बढ़ाईं, मेलजोल पर पाबंदियां लगाईं, तो मेलों का स्‍वरूप भी बदलता गया। आज हालत ये है कि पारंपरिक मेलों पर टिकी लाखों जिंदगियां विस्‍थापित हो चुकी हैं और इसकी गिनती कहीं नहीं है। बाजार, पूंजी और सरकार में फंसकर दम तोड़ते मेलों के समाज पर अमरपाल सिंह वर्मा की लंबी कहानी

A Boatman at Sangam

कुम्भ-2025: एक अपराधी की सरकारी प्रेरक-कथा में छुपी मल्लाहों की सामूहिक व्यथा

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कुम्‍भ के दौरान एक नाविक की पैंतालीस दिन में हुई तीस करोड़ रुपये की कमाई वाला यूपी के मुख्‍यमंत्री का असेंबली में दिया बयान इलाहाबाद के मल्‍लाहों के गले की फांस बन गया है। डेढ़ महीने के कुम्‍भ में बमुश्किल औसतन बीस-पचीस हजार रुपया कमा पाने वाले अधिसंख्‍य नाविक प्रशासन और ठेकेदारों के आपराधिक गठजोड़ तले दम तोड़ रहे हैं, जिसने नदी पर आश्रित समुदाय की आजीविका के सारे स्रोत ठेके पर उठा दिए हैं। कुम्‍भ के आयोजन के नाम पर इस बार जो कुछ भी हुआ है, पिंटू महारा उस मॉडल को समझने का प्रतीक है। संगम से सुशील मानव की फॉलो-अप रिपोर्ट