Popular Culture

Salute to America event in Washington, D.C., 5 July, 2026

ढाई सदी की अमेरिकी आजादी हम सबके लिए एक अफसोस और खतरा क्यों है

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आज से पचास साल पहले अमेरिकी आजादी की दो सदी पूरी होने का वक्‍त ऐसा था जब अमेरिकी समाज में आलोचना के आंतरिक स्‍वर विरोधाभासों को संतुलित करते दिखते थे। उस वक्‍त किताबों, फिल्‍मों और लोकप्रिय संस्‍कृति के उत्‍पादों में लोगों की आत्‍मा का शुद्धिकरण करने की फिर भी एक ताकत शेष थी। आज उसकी कल्‍पना ही संभव नहीं है। आखिर अमेरिकी समाज अपने ढाई सौवें साल में यहां तक कैसे पहुंचा? इसके हमारे लिए क्‍या निहितार्थ हैं? प्रोजेक्‍ट सिंडिकेट के सौजन्‍य से यानिस वारूफाकिस की टिप्‍पणी

Gabbar Singh, the most recognised face of Sholay

पूरे पचास साल: मौलिकता की बहसों के बीच फैलता एक सिनेमा का लोक-जीवन

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सांभा के ‘पूरे पचास हजार’ और गब्‍बर के ‘पचास-पचास कोस दूर’ वाले अतिपरिचित संवादों से कल्‍ट बन चुकी ‘शोले’ को आए इस स्‍वतंत्रता दिवस पर पूरे पचास साल हो रहे हैं। मनोरंजन का एक लोक‍रंजक उत्‍पाद कैसे लोक को घेरता है तो घेरता ही चला जाता है, ‘शोले’ यदि इसका जीवंत उदाहरण है तो इसकी वजह उसकी राजनीतिक पृष्‍ठभूमि है। यह फिल्‍म इमरजेंसी के बीचोबीच आई थी- एकदम चरम दिनों में, महज डेढ़ महीने में। आज भले घोषित इमरजेंसी नहीं है, लेकिन स्थितियां कुछ कम भी नहीं हैं और अन्‍याय व जुल्‍म के खिलाफ ‘शोले’ निरंकुशता के आकाश में अटल सूरज की तरह चमक रही है। ‘शोले’ की पृष्‍ठभूमि और प्रासंगिकता पर चर्चा कर रहे हैं श्रीप्रकाश

‘पॉप’ हिंदुत्‍व: तीन संस्‍कारी नायक और उनकी कुसांस्‍कृतिक छवियां

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भारतीय जनता पार्टी के जन्‍म से ही उसके चुनावी घोषणापत्रों का पहला वादा रहे अयोध्‍या के राम मंदिर में जब प्राण प्रतिष्‍ठा को कुछ दिन ही बच रहे हैं, तब धर्म और शास्‍त्रोक्‍त पद्धतियों पर बहस छिड़ी हुई है। सच्‍चाई यह है कि हिंदू धर्म के रूढ़ हो चुके संस्‍थागत स्‍वरूप को त्‍यागकर उसे लोकप्रिय व सर्वग्राह्य बनाने से भाजपा का यह प्रोजेक्‍ट पूरा हुआ है। नए मीडिया में विभिन्‍न लोकरंजक विधाओं के माध्‍यम से हिंदुत्‍व के प्रचार-प्रसार पर बहुत कम अध्‍ययन हुआ है। इसी विषय पर कुणाल पुरोहित की लिखी पुस्‍तक ‘एच-पॉप’ पर चर्चा कर रहे हैं अतुल उपाध्‍याय