ढाई सदी की अमेरिकी आजादी हम सबके लिए एक अफसोस और खतरा क्यों है

Salute to America event in Washington, D.C., 5 July, 2026
A fireworks display over the National Mall in Washington, D.C. celebrates America’s 250th anniversary, Saturday, July 4, 2026. (Official White House Photo by Cody Hendrix)
आज से पचास साल पहले अमेरिकी आजादी की दो सदी पूरी होने का वक्‍त ऐसा था जब अमेरिकी समाज में आलोचना के आंतरिक स्‍वर विरोधाभासों को संतुलित करते दिखते थे। उस वक्‍त किताबों, फिल्‍मों और लोकप्रिय संस्‍कृति के उत्‍पादों में लोगों की आत्‍मा का शुद्धिकरण करने की फिर भी एक ताकत शेष थी। आज उसकी कल्‍पना ही संभव नहीं है। आखिर अमेरिकी समाज अपने ढाई सौवें साल में यहां तक कैसे पहुंचा? इसके हमारे लिए क्‍या निहितार्थ हैं? प्रोजेक्‍ट सिंडिकेट के सौजन्‍य से यानिस वारूफाकिस की टिप्‍पणी

आम तौर पर मैं अमेरिका के पक्ष या विपक्ष में किए जाने वाले तमाम दावों का आर्थिक और भू-राजनीतिक विश्लेषण करता रहा हूं। अमेरिका की 250वीं वर्षगांठ के मौके पर जाने क्‍यों ऐसा लगा कि अबकी यह नहीं करना चाहिए। यह अजीब बात थी। दुनिया की इस दबंग ताकत ने अपने कृत्‍यों और घटनाओं से हम सभी की‍ जिंदगी को जैसे गढ़ा है, उसके प्रति इस बार मैं थोड़ा भावनात्मक और व्यक्तिगत हो गया हूं, या कहें कि एथेनियन दृष्टिकोण से सोच रहा हूं।

अपनी जिंदगी में एक कारक के रूप में अमेरिका की मेरी सबसे पुरानी स्‍मृति जून 1968 की है। वह साल की शुरुआत की एक गर्म दोपहर थी, जिसके बमुश्किल साल भर पहले सीआइए ने तख्तापलट कर के ग्रीस को एक फासिस्‍ट तानाशाही के अधीन ला दिया था। उस दोपहर मेरी माँ और मैं उस जीर्ण-शीर्ण प्राचीन स्टेडियम के बाहर टहल रहे थे जहां 1896 में पहले आधुनिक ओलंपिक खेल आयोजित हुए थे। तभी अखबार बेचने वाले एक लड़के ने अपनी आवाज से सन्‍नाटे को अचानक तोड़ते हुए घोषणा की कि अमेरिका में किसी की मौत हो गई है। उसे सुनते ही माँ की आँखों में आँसू आ गए। वह बोली, “वो हमारी आखिरी उम्‍मीद था“।

मारे गए अमेरिकी का नाम रॉबर्ट एफ. केनेडी था। अब यह सही था या गलत, पर मेरी माँ ने न सिर्फ यहां ग्रीस में हमारी मुक्ति के लिए, बल्कि विश्व शांति के लिए भी उससे कई उम्मीदें पाल रखी थीं। हम सब की जिंदगी में अमेरिका की अहमियत कितनी ज्यादा थी और उसके अंदरूनी विरोधाभासों से इसका कितना लेना-देना था, इस संदर्भ में यह घटना मेरे लिए एक आरंभिक सबक थी।


The Declaration of Independence was signed in Independence Hall in Philadelphia in 1776.
फिलाडेल्फिया का इंडिपेंडेंस हॉल, जहां 1776 में अमेरिका की स्‍वतंत्रता का संकल्‍प पारित किया गया था

बेशक, उससे पहले भी रूह को झकझोर देने वाली कुछ अमेरिकी हत्याओं की खबरें आई थीं, खासकर मार्टिन लूथर किंग जूनियर और मैल्कम एक्स की मौत। आने वाले वर्षों में तो रोजाना ही खबरों में वियतनाम की भयावहता और वॉटरगेट कांड के विवरण सुर्खियां बनते रहे। फिर भी, ऐसी घटनाओं पर मार्मिक, सूक्ष्म और सौंदर्य की दृष्टि से परिष्कृत अमेरिकी आलोचनाएं खुद एक संतुलन बनाने का काम करती रहीं।

उदाहरण के लिए, वियतनाम युद्ध के आपराधिक पागलपन को समझने के लिए फ्रांसिस फोर्ड कपोला की फिल्‍म अपोकलिप्स नाउ’ से बेहतर कुछ और हो सकता है क्या? कैलिफ़ोर्निया में व्याप्त भ्रष्टाचार का रोमन पोलान्स्की की चाइनाटाउन से कोई बेहतर खुलासा संभव है क्‍या? या फिर एलन पकुला की ऑल द प्रेसिडेंट्स मेन से बेहतर खुलासा वॉटरगेट का? सीआइए को तख्‍तापलट का हथियार बनाए जाने को सिडनी पोलैक की थ्री डेज़ ऑफ़ द कॉन्डोर से बेहतर कोई चित्रित कर सकता था क्‍या? कपोला की द गॉडफादर या मार्टिन स्‍कॉर्सीज़ की टैक्सी ड्राइवर से बेहतर ढंग से अमेरिका की खतरनाक तलछट को भला कौन दिखा सकता था?

फिर जैसे-जैसे मैं बड़ा हुआ और मुश्किल किताबें पढ़ने लगा, अमेरिकी लेखकों ने मेरे सामने ऐसी खिड़कियां खोल दीं जिनसे मैं अमेरिका के रोमांचक विरोधाभासों की झलक देख सका। थॉर्स्टीन वेब्लेन की द थ्योरी ऑफ द लेजर क्लास  ने मुझे अमेरिकी पूंजीवाद की ऐसी समझ दी जो अर्थशास्त्र की किसी भी पाठ्यपुस्तक से बेहतर थी। जॉन स्‍टाइनबेक की द ग्रेप्स ऑफ रैथ  ने  महामंदी की भयावहता और उसके बाद आई न्यू डील की सराहना को इस तरह से मेरे मन पर अंकित कर दिया, जैसा किसी अर्थशास्त्री ने कभी नहीं किया।

संगीत की बात करें तो, रॉक ‘एन’ रोल मेरे लिए वह प्रवेशद्वार बना जिसने मुझे सिखाया कि अमेरिकी आजादी- या उसके अभाव- का अर्थ क्‍या है। हीगेल की स्वतंत्रता की द्वंद्वात्मक अवधारणा अमेरिका के दक्षिणी क्षेत्रों में कैसे घुली-मिली, उसका इससे बेहतर सार क्‍या हो सकता था जिसे मूल रूप से रे चार्ल्स और बाद में सोलोमन बर्क ने एक शानदार ब्लूज़ गीत में गाया था, “नन ऑफ अस आर फ्री, इफ वन ऑफ अस आर चेन्‍ड’’ (हम में से कोई भी स्वतंत्र नहीं है, अगर हम में से कोई एक भी जंजीरों में कैद हो)?



कई साल बाद टेक्सस के मार्फा में डोनाल्ड जड की शिल्‍पकला ने मुझे अमेरिका की सांस्कृतिक छाप को आकार देने में मैन्‍युफैक्‍चरिंग के महत्त्व का एहसास दिलाया। यहीं पर मैंने पहली बार महसूस किया कि अमेरिकी उद्योग की बनाई चीजों- यानी उसकी औद्योगिक वस्‍तुओं के निपट सादेपन- ने यूरोप तक में आसपास की चीजों के हमारे बोध से लेकर और प्रकाश व आयतन के आपसी रिश्‍ते पर हमारी समझदारी को कैसे आकार दिया था।

यह वह दौर था जब अमेरिकी समुदायों के भीतर रचनात्मक आत्मनिरीक्षण की एक लहर चल रही थी। उस लहर में आत्मशुद्धि अथवा रेचन की पर्याप्‍त संभावना थी। जैसा कि अरस्तू ने अपनी पोएटिक्स में समझाया भी था, कि त्रासदियां जनता की अदालत में घटती हैं, वे कभी मनोरंजन का मसला नहीं होतीं। अमेरिकी लेखक, संगीतकार और फिल्मकार दरअसल यही कर रहे थे: वे अपनी गहरी चिंताओं और बेचैनियों को जनता की अदालत में अपने माध्‍यमों से अभिव्‍यक्‍त कर रहे थे।

उन्होंने यह पहचान लिया था कि प्रामाणिक त्रासदियों के नायक, जैसे ईडिपस, एंटीगोन और प्रॉमीथियस, स्वभाव से अच्छे या बुरे नहीं हैं; वे भी अधिकांश अमेरिकियों की तरह ही अपने भव्‍य न्यायबोध के हिसाब से उस “सच” के हक में काम कर रहे थे जिसे कायम रखने के लिए वे खुद को बाध्य महसूस करते थे।

इन नायकों की त्रासदी यह थी कि ब्रह्मांड ने, या बहुत संभव है कि ‘नगर-राज्‍य’ (पोलिस) ने, उनके किए को अपनी विरोधी ताकत से कुचल डाला। इस दमन से उभरने वाली पीड़ा को देखकर दर्शक की दबी हुई करुणा उभर आ सकती थी, उनके भीतर का भय तिरोहित हो सकता था और वे खुद को निथरा हुआ महसूस कर सकते थे। यही वह रेचन का क्षण होता है जहां आत्‍मा शुद्ध हो जाती है। अफसोस, कि अमेरिका अंततः इसी पल से वंचित रह गया।

अमेरिकियों से उनकी आत्‍मशुद्धि को जिस चीज ने छीन लिया, वह वहां की अर्थव्यवस्था में आया एक हिंसक पलटाव था जिसने अमेरिका को सरप्‍लस (अधिशेष) के उत्पादक से घाटे के स्रोत में बदल डाला था। 1971 का निक्सन शॉक इस पलटाव का प्रतीक था, जिसने ब्रेटनवुड्स प्रणाली को समाप्त कर दिया। नतीजा, कि जिन फिल्मों और किताबों से मैं पहले प्यार करता था, उनकी जगह 1980 का दशक आते-आते रैम्‍बो, टॉप गन, और फ्रांसिस फुकुयामा  की द एंड ऑफ हिस्ट्री जैसे भद्दे राष्ट्रवादी आदर्शों ने ले ली।


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बेशक, आत्मचिंतन की क्षमता अब भी पूरी तरह से खत्म नहीं हुई थी। अमेरिका के रेचन का क्षण इसलिए कुचल दिया गया क्योंकि उसका कुलीन वर्ग अमेरिकी घाटे को अपार असभ्य ताकत के स्रोत में बदलने में कामयाब हो गया। विदेशी पूंजी जिस वक्‍त पूरे उत्‍साह के साथ न्यूयॉर्क शहर को मुनाफे और किराये में डुबो रही थी, उसी समय ओलिवर स्टोन की फिल्‍म वॉल स्ट्रीट  ने गॉर्डन गेको जैसे व्‍यक्तियों के उदय को दर्शाने का काम किया।

स्टोन की फिल्म एक ऐसे दौर की शुरुआत में आई जब अमेरिकी शक्ति की स्थिरता के साथ-साथ उसकी आर्थिक अस्थिरता का लगातार विस्तार हो रहा था। वह एक ऐसी प्रक्रिया थी जिसने अमेरिका और शेष पश्चिम में तमाम लोगों को गरीब बना दिया जबकि डॉलरधारी पूंजीपतियों को अत्यधिक अमीर बनने में समर्थ बनाया। अब तो चार दशक से अधिक समय हुआ जब दुनिया भर में, और खास तौर से अमेरिका में कामगार लोगों के खिलाफ एक वैश्विक वर्ग-युद्ध छेड़ा गया था। यह वर्ग-युद्ध ही अमेरिकी त्रासदी के रेचन को रोके हुए है।

इसके ठीक उलट, वित्तीयकरण की प्रक्रिया और हाल ही में क्लाउड पूंजी, बिग टेक और AI का उदय अमेरिकी समाज के भीतर उस विभाजन को और पक्का कर रहा है जिसके परिणामस्वरूप राष्ट्रपति पद पर डोनाल्ड ट्रम्प का कब्‍जा हो चुका है। नतीजा यह है कि अमेरिका अब एक कोरी विवेकहीन ताकत के साथ-साथ घातक रूप से बढ़ती हुई अस्थिरता का उत्पादन करने लगा है। यानी, अमेरिका के बनने के दो सौ साल पूरा होने के मौके पर उसकी आत्मशुद्धि की जो संभावना उसकी पहचान बनी थी, आधी सदी बाद आज उसकी कल्पना करना भी कठिन हो चुका है। यही चीज हम सब के लिए नुकसानदायक है।


कॉपीराइट: प्रोजेक्ट सिंडिकेट, 2026
www.project-syndicate.org


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