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RSS Chief Shri Mohan Bhagwat

GenZ-भागवत संवाद : काल के कठघरे में खड़ा संघ और सवाल पूछता नए दौर का प्रतिवादी

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सत्ता के ऊपर फुलप्रूफ नियंत्रण के बावजूद देश में स्थितियां कुछ ऐसी बन चुकी हैं कि न सिर्फ पांचसाला चुनाव लड़ने वाली भाजपा, बल्कि भविष्‍य को अपने वैचारिक निर्धार के हिसाब से गढ़ने वाली उसकी मातृसंस्‍था आरएसएस भी बेचैन है। बेचैनी इस हद तक कि पचहत्तर पार कर रहे इनके शीर्ष बुजुर्गों को युवाओं से सीधा संवाद करने की मजबूरी आन पड़ी है। कभी संकेतों में राजनीति करने वाला संघ अब अपने ही कहे का व्‍याख्‍याकार है। संघ प्रमुख आजकल जितना बोल रहे हैं, वह अभूतपूर्व है। क्‍या बदले हुए समय और पीढ़ी के साथ यह महज तादात्‍म्‍य बैठाने की कवायद है या कुछ और? हालिया घटनाक्रम पर संघ के जानकार व्‍यालोक की टिप्‍पणी

Prof. Arun Kumar

पूंजी के राज में मजदूर कैसे बेदखल और अदृश्य हो गया? अर्थशास्त्री प्रो. अरुण कुमार का व्याख्यान

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मौजूदा दुनिया में जब भी मजदूरों की बात होगी, सबसे बुनियादी अंतर्विरोध पूंजी बनाम श्रम से ही बात उठेगी। पिछले सौ साल में कैसे पूंजी की बढ़ती हुई ताकत ने श्रमिकों को संगठित होने से रोका, कमजोर किया, कभी उनके संगठित होने का फायदा उठाया तो कभी उन्‍हें बिखेर दिया, यह न सिर्फ पूंजीवाद बल्कि मजदूर आंदोलन का भी इतिहास है। इसी इतिहास की रोशनी में और भारत के असंगठित मजदूरों के खास संदर्भ में आज की दुनिया और भविष्‍य के खतरों पर अर्थशास्‍त्री प्रो. अरुण कुमार ने दिल्‍ली में 5 जून 2026 को एक लंबा व्‍याख्‍यान दिया। व्‍याख्‍यान जेएनयू में उनके सहपाठी रहे शिक्षाविद अनिल चौधरी की स्‍मृति में था। उस व्‍याख्‍यान का लिप्‍यंतरित, संक्षिप्‍त और संपादित रूप

Emperor's mask has fallen, representative image made by AI

मुखौटा गिर चुका है: शासक की निजी डिजिटल जागीर बनते जा रहे देश और नागरिक के सवाल पर

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दुनिया की राजनीति और आर्थिकी आपस में मिलकर कैसे आधुनिक राज्‍य के चरित्र को बदल रही है; सम्‍प्रभु लोकतांत्रिक राष्‍ट्रों के भीतर चुनी हुई सरकार और नागरिक के बीच का रिश्‍ता कैसे विकृत हो रहा है; और अपनी अंतर्वस्‍तु व स्‍वरूप में हर लोकशाही कैसे राजशाही की ओर बढ़ रही है; इन विषयों पर दुनिया भर में कोरोना के बाद से बहुत चर्चा हुई है। भारत अपवाद है। यहां राज्‍य-सम्‍बंधी विमर्श नदारद दिखता है जबकि पांचसाला चुनाव ही विमर्शों के केंद्र में रहता है। फॉलो-अप स्‍टोरीज़ के संरक्षक रहे दिवंगत शिक्षाविद् अनिल चौधरी राज्‍य, सरकार, कानून और समाज की जटिल गुत्‍थी पर लगातार बोलते थे। उनके 76वें जन्‍मदिवस पर दिल्‍ली में आयोजित सम्मिलन इसी विषय पर परिचर्चा का बायस बना। सम्मिलन में प्रस्‍तुत अरुण सिंह का लिखा यह आधारपत्र बदलती हुई दुनिया पर कुछ रोशनी डालता है

Existential threat of AI

अगले दो से तीन साल में AI समूचे मीडिया को निगल जाएगा, मनुष्य को विस्थापित कर देगा!

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘परीक्षा पर चर्चा’ के दौरान विद्याथिर्यों से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के समझदारी भरे उपयोग का आग्रह करते हुए कहा है कि वे उस पर निर्भर न हों, बल्कि केवल दिशानिर्देश के लिए सहयोग लें। यह बात सुनने में जितनी अच्‍छी लगती है, उतनी ही सदिच्‍छा भरी है। AI जितनी तेजी से मानवीय उद्यमों की जगह छेकता जा रहा है, आने वाले दो से तीन साल में तकरीबन समूचे पारंपरिक मीडिया में वह मनुष्‍य की भूमिका का खत्‍म कर देगा। प्रोजेक्‍ट सिंडिकेट के AI संपादक चार्ल्‍स फर्गुसन ने AI कंपनियों के प्रमुखों से इस विषय में बात कर के एक चेतावनी भरा लेख लिखा है, जिसे पढ़ा जाना चाहिए

2025 Nepalese Gen Z movement protesters celebrating

हमारी उद्देश्यपूर्ण सामाजिक कार्रवाइयों के परिणाम क्या हमारे नियंत्रण से बाहर निकल चुके हैं?

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प्रौद्योगिकी ने बीते दो दशकों में सामूहिक कार्रवाई, गोलबंदी, और आंदोलन का स्‍वरूप बुनियादी रूप से बदल डाला है। निश्‍चित रूप से सामाजिक कार्रवाइयां सोद्देश्‍य ही की जाती हैं, लेकिन उनके नतीजे करने वालों के हाथ से फिसल भी जाते हैं। आज की दुनिया इस मामले में कहीं ज्‍यादा अनिश्चित हो चली है। जैसे, नेपाल में युवाओं की ताजा बगावत जिसने दो दिन में सत्ता तो पलट दी, लेकिन उस क्रम में हुई भारी हिंसा से युवाओं ने खुद को अलग भी कर लिया। जो अंतिम परिणाम निकला, क्‍या बगावत उसी उद्देश्‍य से थी? हम नहीं जानते। अप्रत्‍याशित नतीजों के समाजविज्ञान पर एडवर्ड टेनर की यह टिप्‍पणी शायद रोशनी दे