तिजिमाली: पूरा इलाका बना रणक्षेत्र, एक वक्त खाना खाकर वेदांता के खिलाफ डटे हैं आदिवासी

Womens March in Sijimali
Womens March in Sijimali
अक्‍टूबर, 2023 में हमने पहली बार कालाहांडी के सिजिमाली और खंडुआलमाली गांवों से वेदांता और अदाणी के खिलाफ खुल रहे आंदोलन के एक मोर्चे को यहां रिपोर्ट किया था। ढाई साल के भीतर इलाके में आग लग चुकी है। पूरा इलाका छावनी बना हुआ है। मनमानी गिरफ्तारियां जारी हैं। फर्जी मुकदमे लादे जा रहे हैं और आदिवासियों का घर से निकलना मुहाल हो चुका है। रंजना पाढ़ी और रैन्‍डल सेक्‍वेरा के भेजे अपडेट के आधार पर खनन प्रभावित गांवों के एकदम ताजा हाल पर फॉलो अप

ओडिशा के कालाहांडी और रायगड़ा जिलों में स्थित तिजिमाली (सिजिमाली) क्षेत्र के आदिवासी गांवों, विशेष रूप से सगाबाड़ी, बंतेजी, बोंडेल, कंटामाल और तलामपदर के आसपास आजकल सशस्त्र पुलिस और उसके वाहनों की जबरदस्‍त तैनाती और गश्‍ती है। इस इलाके में लगातार ड्रोन उड़ रहे हैं। पुलिस ‘माँ माटी माली सुरक्षा मंच’ के प्रमुख सदस्यों की तलाश में है, जो संगठन लगभग तीन साल से वेदांता की बॉक्साइट खनन परियोजना के प्रतिरोध का नेतृत्व कर रहा है।

बीती 26, 27 और 28 फरवरी को लगभग 200 पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने लगातार तीन गांवों में मार्च कर के सुरक्षा मंच के प्रमुख सदस्यों के घरों की दीवारों पर एसडीएम रायगड़ा और जेएमएफसी काशीपुर द्वारा जारी गिरफ्तारी वारंट चिपकाये। 26 फरवरी को उन्होंने बंतेजी में मार्च किया, 27 फरवरी को उन्होंने आंदोलन के गढ़ों में से एक कंटामाल गांव में मार्च किया और 28 फरवरी को उन्होंने सगाबाड़ी गांव में मार्च किया। वारंट व्यक्तिगत रूप से तामील नहीं किए गए थे और पेड़ों पर भी लगाए गए हैं। तब से लेकर आज तक ड्रोन और पुलिस वाहन उस इलाके में मंडरा रहे हैं।



इसके चलते आदिवासियों का काम और आजीविका बुरी तरह प्रभावित हुई है। हाल ही में इलाके के एक दौरे के दौरान कई आदिवासी किसानों और मज़दूरों ने बताया कि उनका घर से बाहर निकलना असंभव हो चुका है। दैनिक कार्यों के लिए जंगल और नदी तक जाना भी मुश्किल है क्योंकि ड्रोन लगातार सिर पर उड़ रहे हैं, जिनकी मदद से सामान्‍यत: 18 से 25 वाहनों द्वारा गश्त की जाती है। इसके अलावा सशस्त्र पुलिस के लंबे मार्च तो हो ही रहे हैं। चूंकि सैकड़ों मनगढ़ंत आपराधिक मामले बनाकर यहां एफआइआर दर्ज की जा चुकी है, तो लोगों में इस बात का डर है कि पुलिस किसी को कभी भी उठा सकती है। परिजन जेल में बंद अपने लोगों से मिलने अब तक नहीं जा पाए हैं। दूसरी ओर, काम और कमाई छूट जाने से घरों में एक वक्‍त चूल्‍हा जल पा रहा है।

ओडिशा में दो साल पहले हुए चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने एक आदिवासी चेहरे को मुख्‍यमंत्री बनाया था। उस चुनाव से कोई छह माह पहले फॉलो अप स्‍टोरीज़ पर पहली बार कालाहांडी के सिजिमाली क्षेत्र में वेदांता और अदाणी के खिलाफ उठ रहे प्रतिरोध की जमीनी रपट छपी थी, जिसमें बताया गया था कि आदिवासियों की यह लड़ाई तेरह साल पहले कामयाब रहे नियमगिरी के आंदोलन के मुकाबले ज्‍यादा कठिन क्‍यों है।


FUS Story on Kalahandi Bauxite Mining, October 2023

पिछले छह महीनों में इस क्षेत्र में हुए घटनाक्रम उस कहानी की पुष्टि करते हैं। दिलचस्‍प है कि ताजा प्रसंग की शुरुआत पिछले साल बिरसा मुंडा की जयंती के आयोजन से होती है। आदिवासी मुख्‍यमंत्री के रहते हुए यहां बिरसा मुंडा की जयंती को मनाने में बाधाएं डाली गईं और दमन की शुरुआत हुई। संदर्भ के लिए, कुछ महीने पहले ही मुख्‍यमंत्री मोहन चरण माझी ने सरकारी अफसरों की एक बैठक में बयान दिया था कि उन्‍हें ‘भोला-भाला आदिवासी’ समझने की गलती न की जाए।     

कालाहांडी जिले की नकरुंडी पंचायत में 15 नवंबर, 2025 को बिरसा मुंडा जयंती के लिए जोर-शोर से तैयारियां चल रही थीं। एक दिन पहले अमझोला गांव के सानू माझी को कुछ घंटों के लिए हिरासत में लिया गया था और कचालेखा गांव के मिथुन नाइक को गिरफ्तार कर के रायगड़ा जेल में बंद कर दिया गया था। कार्यक्रम के ऐन दिन कुछ स्थानीय युवाओं ने कार्यक्रम को बाधित करने का बहुत प्रयास किया, हालांकि आयोजकों ने शांतिपूर्ण तरीके से हस्तक्षेप किया और उन्हें मौके से जाने को राजी कर लिया।

उसी दिन कुछ आयोजकों के खिलाफ एक प्राथमिकी दर्ज की गई थी। यानी आयोजन से एक दिन पहले गिरफ्तारियां हुईं, आयोजन के दिन झगड़े भड़काये गए और उसके एकाध दिन बाद कार्तिक नाइक की गिरफ्तारी हुई। जल्द ही लाबान्या नाइक को गिरफ्तार कर लिया गया। कार्तिक नाइक दूसरी बार जेल में बंद हुए थे। उन्होंने चार महीने भवानीपटना जेल में बिताए और बीते 18 मार्च को जमानत पर रिहा हुए हैं। उनके ऊपर आर्म्स एक्ट की धाराओं सहित भारी आरोप हैं। लाबन्या नाइक को अभी रिहा नहीं किया गया है।


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इस घटनाक्रम के पीछे दिसंबर के पहले हफ्ते में आने वाली एक सरकारी मंजूरी थी, जिसके बाद प्रशासन को स्थितियों के बिगड़ने का अंदाजा था। वन सलाहकार समिति (एफएसी) ने 2 दिसंबर, 2025 को सिजिमाली बॉक्साइट खदानों के लिए 708.204 हेक्टेयर जंगल की जमीन दिए जाने के लिए पहले चरण के सैद्धांतिक अनुमोदन की सिफारिश की। एफएसी ने यह भी कहा कि ग्रामसभा की कार्यवाही में अनियमितताओं और धोखाधड़ी से उसके संचालन का आरोप लगाते हुए उसे कई आवेदन प्राप्त हुए हैं। गौरतलब है कि कंपनी के गुंडों और पुलिस के दबाव की मदद से जिला प्रशासन द्वारा आयोजित ग्राम सभाओं को ग्रामीणों द्वारा उच्च न्यायालय में चुनौती दी जा चुकी है।

बहरहाल, इसके तुरंत बाद 7 दिसंबर को लोगों का एक समूह काशीपुर ब्लॉक के सुंगेर चौक पर दयानिधि नाइक (उम्र 28) के गैराज में घुस गया। अज्ञात लोगों का यह समूह दो वाहनों में आया था जिनमें संभवत: काशीपुर पुलिस के लोग थे। उन्होंने दयानिधि के साथ मारपीट की और उसे गाड़ी तक खींच लाए। उन्होंने खुद कहा कि वे पुलिस के कर्मचारी हैं, लेकिन कोई भी वर्दी में नहीं था। वाहनों पर पुलिस की प्लेट नहीं लगी थी और उसके ऊपर कोई रोशनी भी नहीं थी, जैसा पुलिस वाहनों में होता है।

ये सब देखकर लोगों का एक समूह नाइक की मदद के लिए दौड़ा। इस बीच पुलिस ने 11 साल के एक लड़के के पैर पर बुरी तरह से वार किया। वह काफी देर तक लंगड़ाता रहा। उन्होंने एक छोटी सी बच्‍ची को उसकी माँ की गोद में से लेकर फेंक दिया। दयानिधि ने पुलिस का मुकाबला किया और खुद को उनकी पकड़ से छुड़ाने में कामयाब रहे। एकमात्र व्यक्ति जिसे लोग पहचान सकते थे, वह काशीपुर थाने के एसआइ पीके स्‍वाईं थे।

इन घटनाओं के मद्देनजर 15 दिसंबर, 2025 को पीपुल्‍स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़ (पीयूसीएल) ने राष्ट्रीय मीडिया को एक पत्र जारी किया जिसमें देश भर के 125 से अधिक वकीलों, विधि शिक्षकों और कानून के छात्रों ने वेदांता लिमिटेड की प्रस्तावित सिजिमाली बॉक्साइट खनन परियोजना के लिए ओडिशा के रायगड़ा और कालाहांडी जिलों में वन और पांचवीं अनुसूची की भूमि के अवैध अधिग्रहण और इसका विरोध करने वाले आदिवासी ग्रामीणों के निरंतर अपराधीकरण और धमकी के खिलाफ अपना विरोध दर्ज कराया।


15december-PUCL-Letter-to-Odisha-administration

ओडिशा के राज्यपाल, रायगड़ा और कालाहांडी के पुलिस महानिदेशक व जिला कलेक्टरों और पुलिस अधीक्षकों को संबोधित एक विस्तृत याचिका में वकीलों ने पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों में भूमि अधिग्रहण को रोकने, ग्रामीणों के खिलाफ आपराधिक मामलों को वापस लेने और सिजिमाली में वेदांता की खनन परियोजना को सुविधाजनक बनाने के लिए किए गए “औपनिवेशिक युग के दमन” पर अंकुश लगाने के लिए तत्काल हस्तक्षेप करने की मांग की।

संविधान की पांचवीं अनुसूची के तहत राज्यपाल की विशेष शक्तियों का उपयोग करते हुए वकीलों ने अनुसूचित क्षेत्रों में शांति और सुशासन बहाल करने के लिए तत्काल हस्तक्षेप का आग्रह किया। इस बात पर जोर दिया कि कॉर्पोरेट हितों के पक्ष में इन संवैधानिक जिम्मेदारियों का त्याग नहीं किया जा सकता है।

उनकी प्रमुख मांगों में वेदांता को दिए गए खनन पट्टे की समीक्षा, ग्रामीणों के खिलाफ सभी एफआइआर को वापस लेना, अवैध गिरफ्तारी और यातना के मुआवजे के साथ हिरासत में लिए गए नेताओं की रिहाई और परियोजना से संबंधित सभी कार्यों को तब तक पूरी तरह से रोकना शामिल था, जब तक कि ग्राम सभाएं भयमुक्त वातावरण में निर्णय नहीं ले लेतीं। वकीलों ने पुलिस और प्रशासनिक ज्यादतियों की स्वतंत्र जांच, कंपनी के कर्मचारियों के गांवों में प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने और क्षेत्र में किसी भी पुलिस की तैनाती के लिए ग्रामसभा की मंजूरी की भी मांग की।

इस इलाके में जनवरी के मध्य से राज्य का दमन तेज हुआ, जब तिजिमाली, मझिंगीमाली और कुटुरूमाली के ग्रामीणों ने अपनी जमीन, पहाड़ियों और नदियों पर अपनी स्वायत्तता का दावा करने के लिए एक पदयात्रा निकाली।

ये पदयात्राएं एफएसी द्वारा बॉक्साइट खदानों के लिए जंगल की जमीन दिए जाने संबंधी सिफारिश (2 दिसंबर, 2025) के खिलाफ निकाली गई थीं। पदयात्रा के मुद्दे बहुत सारे थे। लोगों ने गिरफ्तार किए गए नौ से अधिक नेताओं की रिहाई की भी मांग की: पद्मन नाइक, कार्तिक नाइक और लाबन्या नाइक (भवानीपटना जेल), और नारिंगी देई माझी, जलेश्वर नाइक, रमाकांत नाइक, मिथुन नाइक, सुंदर सिंह माझी और लक्ष्मण नाइक (रायगड़ा जेल)।



बॉक्साइट खनन के खिलाफ संघर्ष के साथ एकजुटता में दो सहज विरोध प्रदर्शन क्रमशः 12 और 13 जनवरी को संबलपुर विश्वविद्यालय और रेवेनशॉ विश्वविद्यालय में हुए। आदिवासियों और दलितों की कैद और क्षेत्र में बढ़ते पुलिस दमन की निंदा करने वाले इन विरोध प्रदर्शनों ने लोगों के अपने पांचवीं अनुसूची के क्षेत्रों की रक्षा करने और बॉक्साइट खनन को मना करने के अधिकार को बरकरार रखा।  रावेनशॉ विश्वविद्यालय की तख्ती पर लिखा था, “हमारी अरावली: सिजिमाली!! हम सिजिमाली के लोगों के साथ खड़े हैं।

18 फरवरी को नरेंगी देई माझी, सुंदर सिंह माझी और रमाकांत नाइक रायगढ़ जेल से रिहा हुए थे। जलेश्वर नाइक को 11 मार्च को रिहा किया गया था। लक्ष्मण नाइक को 1 दिसंबर को रायगड़ा स्थित उनके आवास से गिरफ्तार किया गया था। उन्हें 16 दिसंबर को जमानत मिल गई थी। कचालेखा गांव के मिथुन नाइक को 14 नवंबर से 14 जनवरी तक हिरासत में रखा गया था। 15 दिसंबर को मिथुन नाइक और लक्ष्मण नाइक दोनों की रिहाई पर ग्रामीणों ने जश्न मनाया, हालांकि मिथुन नाइक को 29 जनवरी को एक बार फिर से गिरफ्तार कर लिया गया और 28 फरवरी को रिहा कर दिया गया।

मिथुन नाइक की गिरफ्तारी की परिस्थितियां भाड़े के गुंडों और बिचौलियों पर प्रशासन की बढ़ती निर्भरता की ओर इशारा करती हैं।

मिथुन पिछले साल हुई बिरसा मुंडा जयंती के आयोजन में बहुत करीब से जुड़े हुए थे। आयोजन से एक दिन पहले की बात है जब वे कर्लापट रोड से लौट रहे थे। तब नौ लोगों के एक समूह ने एक गांव के पास एक पुल पर घात लगाकर उन पर हमला कर दिया। उन्होंने उन्‍हें बुरी तरह पीटा और उनका बैग छीन लिया। इसके बाद उन्‍हें रामपुर में एक स्थान पर छोड़ दिया गया, जहां एक अन्य समूह उनके पीछे वहां एक बस से पहुंचा। उनमें से मिथुन ने दो व्यक्तियों को पहचाना। उनमें एक सादे कपड़ों में कर्लापट पुलिस स्टेशन का एक पुलिसकर्मी था। इसके बाद उन्हें काशीपुर में रायगड़ा पुलिस को सौंप दिया गया।

जब उन्‍हें अदालत के सामने पेश किया गया, तो वे बहुत दर्द और सदमे में थे, फिर भी न तो न्यायाधीश ने उनकी स्थिति के बारे में पूछताछ की, न ही वह अपनी यातना के बारे में बात कर पाए। उन्‍हें अदालत के सामने कुछ भी न बोलने के लिए धमकाया गया था। जब वे इस साल 14 जनवरी को रिहा हुए, तो कुछ समय तक इंतजार करने के बाद 14 नवंबर, 2025 को हुए अपने अपहरण के संबंध में प्राथमिकी दर्ज कराने के उद्देश्‍य से कर्लापट थाने पहुंचे। पुलिस ने उनकी शिकायत दर्ज कर ली और कुछ दिनों बाद वापस आने के लिए कहा।


Mithum Naik (Left) in a rally on March 30, 2026
लोक अधिकार समावेश की रैली में मिथुन नाइक (बाएं), 30 मार्च 2026 (स्रोत: टेलीग्राफ)

जब वह 29 जनवरी को वापस थाने गए तो पता चला कि पुलिस ने न तो उनकी एफआइआर दर्ज की थी और न ही कोई डायरी एंट्री की थी। इसके बजाय, उन्‍हें सूचित किया गया कि उनके खिलाफ वारंट जारी किया गया है। उन्‍हें मौके पर ही गिरफ्तार कर लिया गया।

फरवरी के अंत में हुई घटनाओं के खिलाफ बीते 8 मार्च की सुबह सैकड़ों महिलाएं गहन निगरानी और पुलिस गश्त के जवाब में एकत्र हुईं। उन्होंने वेदांता वापस जाओ और जमीन पर अपना दावा करने वाले नारे लगाते हुए कंटामाल से सागबारी तक मार्च किया।

10 मार्च की रात कालाहांडी जिले के तलामपदर गांव के लोगों का कंपनी के समर्थक एक ग्रामीण के साथ चल रहा झगड़ा बहुत आगे बढ़ गया। पुलिस आधी रात को गांव में पहुंची और 11 महिलाओं सहित 21 आदिवासियों को उसने उठा लिया। उन्होंने बेतरतीब ढंग से घरों पर छापा मारा और कई दरवाजे तोड़ दिए। उठाई गई 11 महिलाओं में से एक 19 वर्षीय महिला गर्भवती है, तीन नाबालिग हैं, और कुछ ऐसी औरतें हैं जिनके बच्‍चे बहुत छोटे हैं। वे कालाहांडी जिले की भवानीपटना जिला जेल में बंद हैं। जैसा कि पता चला है, सैकड़ों की संख्‍या में आए पुलिसबल में से कुछ लोग ही वर्दी में थे। उनके साथ कई निजी वाहन भी थे।  

यहां 10 से 13 मार्च तक तनाव लगातार बढ़ता गया है। ड्रोन का उपयोग लोगों के ठिकाने और गतिविधियों का पता लगाने के लिए किया जा रहा है। 13 मार्च को माँ माटी माली सुरक्षा मंच के पांच प्रमुख सदस्यों का पुलिस ने पीछा किया। उन्होंने पहाड़ी पर दौड़ने में पुलिस को पछाड़ दिया, लेकिन उमाकांत नाइक पीछे रह गए और उन्हें तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया। यह दूसरी बार है जब उन्हें हिरासत में लिया गया है।


Maa Maati Maali Suraksha Manch pamphlet
माँ माटी माली सुरक्षा मंच का परचा

ध्‍यान देने वाली बात है कि परियोजना को पर्यावरणीय मंजूरी मिलने से पहले ही सगाबाड़ी के रास्ते खनन क्षेत्र के लिए एक पहुंच मार्ग बनाने की हलचल तेज हो चुकी है। सुरक्षा मंच कई महीनों से इस निर्माण कार्य को करने के लिए पुलिस या प्रशासन के प्रवेश का विरोध कर रहा है और उसके सदस्‍य सगाबाड़ी के पास बनाए गए एक शिविर में पहरा दे रहे हैं। यह सड़क पहाड़ी की चोटी पर स्थित मालीपदर और तिजिमाली गांवों की ओर जाती है।

आंदोलन के एक अन्य मोर्चे पुलिंगपदर और चांदगिरी गांवों में भी लोग वेदांता द्वारा जमीन हड़पने का विरोध कर रहे हैं। वेदांता सिजिमाली खनन परियोजना से होने वाली प्रस्तावित बेदखली के लिए यहां पुनर्वास कॉलोनियां बनाने की जोरदार कोशिश कर रहा है।

बीते 19 मार्च से पुलिंगपदर के सैकड़ों ग्रामीण कंपनी के बुलडोजरों को पेड़ काटने और पवित्र उपवनों को नष्ट करने से रोकने के लिए कुर्कुटी वन ब्लॉक में अनिश्चितकाल के लिए डेरा डाले हुए हैं। वनाधिकार कानून के अनुसार इस भूमि पर उनका परंपरागत अधिकार है। इसी तरह की स्थिति सुंदरगढ़ जिले में भी है, जहां प्रशासन भारी पुलिस और अर्धसैनिक बलों के साथ चूना पत्थर खनन में डालमिया सीमेंट की मदद कर रहा है।


गिरता पानी खंडधार, बिक गया तो रक्तधार


ये सभी पांचवीं अनुसूची के क्षेत्र हैं जो सैद्धांतिक रूप से लोगों को उनकी भूमि, जंगलों, पहाड़ियों, नदियों और पवित्र स्थलों पर स्वायत्तता प्रदान करते हैं। इस कानून-प्रदत्त स्‍वायत्तता का खुला उल्‍लंघन करते हुए कंपनियों को जमीन देने के लिए जारी गिरफ्तारियां, दमन, भाड़े के गुंडों का इस्‍तेमाल और अंत में न्‍यायालय की शर्तें आदिवासियों की जिंदगी को कठिन बना रही हैं और उनके सामने एक जटिल कानूनी मोर्चा खोल रही हैं।  

रायगड़ा जिला अदालत ने लक्ष्मण नाइक, नरेंगी देई माझी, सुंदर सिंह माझी, रमाकांत नाइक और जलेश्वर नाइक की जमानत पर जो शर्त लगाई है वह देखी जानी चाहिए: ‘’याचिकाकर्ता उपरोक्त मामले में अपनी वास्तविक रिहाई की तारीख से दो महीने तक सुबह के समय (सुबह 6.00 बजे से 9.00 बजे के बीच) काशीपुर थाने के परिसर की सफाई करेगा। काशीपुर थाने के प्रभारी इंस्‍पेक्‍टर याचिकाकर्ता को झाड़ू, फिनाइल और अन्य सफाई सामग्री प्रदान करेंगे ताकि वह उक्त परिसर को साफ कर सके।‘’


रंजना पाढ़ी और डॉ. रैन्‍डल सेक्‍वेरा द्वारा संकलित और प्रेषित अपडेट व सूचनाओं पर आधारित


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