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Pyre protest against Ken-Betwa project in April 2026

लोकप्रियता के दौर में जल, जंगल और जमीन के संघर्ष : संदर्भ केन-बेतवा आंदोलन

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देश में आजकल आंदोलन का माहौल है- जमीन पर कम (या कम-चर्चित) और इंटरनेट पर ज्‍यादा। ऐतिहासिक अन्‍यायों और हकमारी के खिलाफ देश भर में दशकों से लगातार चल रहे सत्ता-विरोधी जमीनी जन आंदोलनों की जगह एक बार फिर आभासी तिकड़मों से छेकने की कोशिश की जा रही है, जैसा 2011 में हुआ था। इस बार भी तमाम आंदोलनकारी भ्रमित हो रहे हैं। ‘जेन-ज़ी’ की पीठ पर जारी इस हो-हल्‍ले में लगातार बारह दिन तक सत्‍याग्रह करने वाले केन-बेतवा परियोजना-विरोधी आदिवासी औरतों और बुजुर्गों की आवाज कहीं दब गई है। हालिया केन-बेतवा नदीजोड़ विरोधी आंदोलन को सतीश भारतीय ने विस्‍तार से कवर किया है। उनके मध्‍य प्रदेश से भेजे डिस्‍पैच, बातचीत और अतीत के प्रसंगों के सहारे इस पर्यावरण दिवस पर जल, जंगल, जमीन बचाने वाले जन आंदोलनों की गति और नियति पर यह लंबी कहानी

Womens March in Sijimali

तिजिमाली: पूरा इलाका बना रणक्षेत्र, एक वक्त खाना खाकर वेदांता के खिलाफ डटे हैं आदिवासी

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अक्‍टूबर, 2023 में हमने पहली बार कालाहांडी के सिजिमाली और खंडुआलमाली गांवों से वेदांता और अदाणी के खिलाफ खुल रहे आंदोलन के एक मोर्चे को यहां रिपोर्ट किया था। ढाई साल के भीतर इलाके में आग लग चुकी है। पूरा इलाका छावनी बना हुआ है। मनमानी गिरफ्तारियां जारी हैं। फर्जी मुकदमे लादे जा रहे हैं और आदिवासियों का घर से निकलना मुहाल हो चुका है। रंजना पाढ़ी और रैन्‍डल सेक्‍वेरा के भेजे अपडेट के आधार पर खनन प्रभावित गांवों के एकदम ताजा हाल पर फॉलो अप

Women fetching water in Barmer, Rajasthan

पानी केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, अब वह न्याय का प्रश्न बन चुका है! पी. साईनाथ का व्याख्यान

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गुरुत्‍वाकर्षण के हिसाब से पानी ऊपर से नीचे की ओर बहता है, लेकिन हजारों साल से जाति, वर्ग और लैंगिक भेदों के मारे भारतीय समाज में यह नियम उलट जाता है। यहां पानी नीचे से ऊपर प्रवाहित होता है। यानी, निचले तबके पानी के लिए श्रम करते हैं और ऊंचे तबके उनका पानी हड़प लेते हैं। यह उलटा प्रवाह जब पानी के निजीकरण के साथ मिलता है तो भयावह असमानता का बायस बन जाता है। फिर पानी महज कुदरती संसाधन नहीं, न्‍याय का सवाल बन जाता है। वरिष्‍ठ पत्रकार पी. साईनाथ का व्‍याख्‍यान ‘पानी का रंग: खत्‍म होता एक प्राकृतिक संसाधन और बढ़ती असमानता’

मणिपुर: हथियारों की लूट, सुरक्षाबलों पर FIR, और अब 15 अगस्त का बहिष्कार!

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आज पूरा देश जब स्‍वतंत्रता दिवस मना रहा है, मणिपुर में सतरह घंटे की बंदी है। मैतेयी सशस्‍त्र संगठन कॉरकॉम ने स्‍वतंत्रता दिवस के बहिष्‍कार का आह्वान कर दिया है। कुछ संगठनों ने 14 अगस्‍त को ही अपनी आजादी का दिवस मना लिया है। 3 मई से शुरू हुई हिंसा सरकारी हथियारों की लूट से लेकर सशस्‍त्र बलों पर एफआइआर और पुलिस के साथ तनाव में तब्‍दील होते हुए इस स्थिति त‍क आखिर कैसे पहुंच गई जबकि पिछले ही हफ्ते कुकी नेता गृहमंत्री से दिल्‍ली में मिलकर गए हैं? मणिपुर से लौटकर रोहिण कुमार की श्रृंखला की तीसरी कड़ी

मणिपुर: पचहत्तर दिन बाद लीक हुआ वीडियो घटना के वक्त दबा कैसे रह गया?

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मणिपुर में हिंसा भड़कने के ठीक बाद दो कुकी महिलाओं का गैंगरेप और निर्वस्‍त्र परेड हुआ था, जिसका वीडियो ढाई महीने बाद लीक हुआ। तब तक सरकारी आंकड़े के मुताबिक डेढ़ सौ लोग मारे जा चुके थे। इसके बावजूद देश की संवेदना नहीं जगी थी। सवाल उठता है कि जब घटना की जानकारी मणिपुर में आम थी, तो वह मई में ही खबर क्‍यों नहीं बन सकी? मणिपुर से लौटकर आए रोहिण कुमार की श्रृंखला की दूसरी कड़ी

1. इंफाल में मैतेयी समुदाय का धरना प्रदर्शन | 2 जुलाई | रोहिण कुमार

मणिपुर: आग लगाने की तैयारी तो पहले से थी, 3 मई की रैली होती या नहीं…

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मणिपुर में दो समुदायों के बीच हिंसा को जल्‍द ही तीन महीने पूरे हो जाएंगे। प्रधानमंत्री ने केवल एक वाक्‍य अब तक कहा है, वो भी संसद का सत्र शुरू होने से ठीक पहले, संसद के बाहर, भीतर नहीं। सुप्रीम कोर्ट शुरू में लापरवाह रहा, फिर सख्‍त हुआ, लेकिन उसका कुछ हासिल नहीं है। उधर, दर्द और हिंसा की कहानियां दोनों तरफ से बराबर आ रही हैं। संवेदना पाले में बंट गई है। सच्‍चाई धुंधली हो गई है। ऐसे में मणिपुर से लौटकर रोहिण कुमार सुना रहे हैं आंखों देखी, कानों सुनी और महसूस की हुई कहानियां किस्‍तों में। पहली कड़ी प्रस्‍तुत है

मणिपुर: ‘राजकीय हिंसा’ पर बहस के लिए SC ‘सही मंच नहीं’, मीडिया में बोलने वालों पर FIR

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आज सुप्रीम कोर्ट ने एक सुनवाई में मणिपुर की हिंसा से अपना पल्‍ला पूरी तरह झाड़ लिया और इसे राज्‍य सरकार का मसला करार दिया। मणिपुर के विभिन्‍न समूहों की याचिका पर सुनवाई करते हुए मुख्‍य न्‍यायाधीश चंद्रचूड़ और और पीएस नरसिम्‍हा की पीठ ने साफ कहा कि वह राज्‍य में कानून व्‍यवस्‍था का मसला अपने हाथ में नहीं सकती, ज्‍यादा से ज्‍यादा अधिकारियों को हालात बेहतर करने के सुझाव दे सकती है।

देश के सबसे कम शिक्षित जिले में अपने जंगलों को कैसे बचाए हुए हैं भील आदिवासी

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आजादी के पचहत्‍तर साल में वन अधिकार पर अब जाकर कुछ बातें हो रही हैं और परंपरागत वनवासियों को कहीं-कहीं पट्टे दिए भी जा रहे हैं, लेकिन कुछ आदिवासी इलाके ऐसे हैं जहां जंगल को बचाने का विवेक और तकनीक बरसों से कायम है। मध्‍य प्रदेश का अलीराजपुर ऐसा ही एक जिला है, जिसे सबसे पिछड़ा माना जाता है। बावजूद इसके यहां के लोग अपने अधिकारों को लेकर सबसे जागरूक दिखाई देते हैं। अलीराजपुर के ककराना से आदित्‍य सिंह की रिपोर्ट

नरसिंहपुर का चुनावी बांध: यहां विरोध मना है क्योंकि परियोजना का बनना तय है

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एक बांध परियोजना, जिसे सात साल पहले कई कारणों से बंद कर दिया गया था, कोरोनाकाल में दोबारा शुरू की गई। मध्य प्रदेश के तीन जिलों के सौ से ज्यादा गांव आज डूब की जद में हैं, लेकिन प्रशासन मौन है। नरसिंहपुर से ब्रजेश शर्मा सुना रहे हैं विकास की एक नई कहानी