Culture

Ram Singh Jakhad

राम सिंह जाखड़: राजनीतिक बंदियों की काल कोठरी में अतीत से आती उम्मीद की रोशनी

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पिछले साल की शुरुआत में भारत की जेलों में कैद लोगों की संख्‍या पांच लाख को पार कर गई थी। इनमें 75 प्रतिशत ऐसे बंदी थे जिनके मुकदमों की सुनवाई भी शुरू नहीं हुई थी। इन्‍हीं में सैकड़ों राजनीतिक कैदी भी हैं, जिन्‍हें भारत सरकार अलग से कोई श्रेणी नहीं मानती। इनकी संख्‍या बीते दो-तीन वर्षों में तेजी से बढ़ी है। भीमा-कोरेगांव के दर्जन भर बंदियों से लेकर उमर खालिद, सोनम वांग्‍चुक ऐसे कुछ परिचित नाम हैं। आजादी से पहले राजनीतिक बंदी रहे 22 फरवरी, 1916 को जन्मे छात्र नेता राम सिंह जाखड़ का जेल वृत्तान्‍त इन बंदियों के लिए एक प्रेरक गाथा है। आर्काइव के कोनों से निकली कहानी सुना रहे हैं अखिलेश यादव

Existential threat of AI

अगले दो से तीन साल में AI समूचे मीडिया को निगल जाएगा, मनुष्य को विस्थापित कर देगा!

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘परीक्षा पर चर्चा’ के दौरान विद्याथिर्यों से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के समझदारी भरे उपयोग का आग्रह करते हुए कहा है कि वे उस पर निर्भर न हों, बल्कि केवल दिशानिर्देश के लिए सहयोग लें। यह बात सुनने में जितनी अच्‍छी लगती है, उतनी ही सदिच्‍छा भरी है। AI जितनी तेजी से मानवीय उद्यमों की जगह छेकता जा रहा है, आने वाले दो से तीन साल में तकरीबन समूचे पारंपरिक मीडिया में वह मनुष्‍य की भूमिका का खत्‍म कर देगा। प्रोजेक्‍ट सिंडिकेट के AI संपादक चार्ल्‍स फर्गुसन ने AI कंपनियों के प्रमुखों से इस विषय में बात कर के एक चेतावनी भरा लेख लिखा है, जिसे पढ़ा जाना चाहिए

Joaquin Phoenix in a still from Joker (2019)

हँसना मना है : फ़रमाँ-बरदारी की पूंजी-केंद्रित संस्कृति में धूमिल पड़ता सार्वजनिक हास्यबोध

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हँसी मनुष्‍य की सबसे सहज अभिव्‍यक्ति है; हँसी हर दर्द की दवा है; लेकिन हँसना ही मर्ज बन जाए तब? पहली बार इमरजेंसी के दौरान हँसने पर रखी जा रही निगाह और लोकतंत्र के अंतिम क्षण पर निकलती निरंकुश हँसी की बात रघुवीर सहाय ने की थी। तब से लेकर अब तक, समाज में हँसी सहज नहीं रही है। अब हँसने के प्रयत्‍न करने पड़ते हैं, जैसा परसाई ने बरसों पहले कहा था, कि शीत और गर्मी के बीच से जो जितना वसंत निकाल सके, निकाल ले। दो पाटों के बीच फँसे ‘घायल वसंत’ में चोटिल हास्‍यबोध के सामाजिक इतिहास पर श्रीप्रकाश की नजर

A still from Farmers Movement 2020-21

किसान आंदोलन: पांच किताबें जिनमें दर्ज है अन्नदाता की बगावत और किस्मत का इतिहास

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स्‍वतंत्र भारत के इतिहास में उसकी राजधानी की चौहद्दी पर सबसे लंबे समय तक चले किसान आंदोलन को अब पांच साल पूरे हो गए हैं। आजकल पांच साल में स्‍मृतियां धुंधली पड़ जाती हैं। नई घटनाएं तो दिमाग पर तारी हो ही जाती हैं, ऊपर से अतीत को बदलने की कोशिशें भी हो रही हैं। फिलहाल बड़े जन आंदोलनों से तकरीबन खाली हो चुके इस समाज में पांच साल पहले घटे एक व्‍यापक आंदोलन को कैसे याद रखा जाए, कैसे समझा जाए और आगे उस समझ का क्‍या किया जाए, यह सवाल अहम है। किसान आंदोलन पर कुछ किताबें हैं, दस्‍तावेज हैं और पत्रिकाएं भी, जो इस काम को आसान बना सकती हैं। बीते पांच बरस में छपी ऐसी पांच चुनिंदा किताबों का जिक्र कर रहे हैं अभिषेक श्रीवास्‍तव

Speckled Cobra in a field near an agricultural worker, WHO

MP : तांत्रिक हो या अफसर, यहां सबके लिए है सांप के जहर में अवसर सिवाय मरने वाले के…

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कभी सपेरों का देश कहे जाने वाले भारत में सांप के काटे से मरने वालों की संख्‍या पूरी दुनिया में सर्पदंश से होने वाली मौतों की आधी से ज्‍यादा है। अस्‍पतालों का टोटा, अंधविश्‍वास की व्‍याप्ति और विलुप्‍त होते देसी उपचारक समस्‍या को और गहरा कर रहे हैं। जहररोधी उपलब्‍ध करवाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका, सरकार के निर्देश, और बीते सात साल से हर 19 सितंबर को मनाए जा रहे अंतरराष्‍ट्रीय सर्पदंश जागरूकता दिवस का कोई असर नहीं पड़ रहा है। उलटे, सांप भी अब भ्रष्‍टाचार की चपेट में आ गए हैं। अपनी तरह का मौलिक सांप घोटाला देखने वाले मध्‍य प्रदेश के सागर से सतीश भारतीय की रिपोर्ट

Indian historical figures depicted in Gyanendra Pandey's book

पुस्तक समीक्षा : भारतीय समाज के ऐतिहासिक किरदार अपने घर की औरतों के लिए कैसे ‘मर्द’ थे?

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बहुत लंबे समय तक लैंगिकता के प्रश्‍न का अध्‍ययन औरतों को केंद्र में रखकर किया गया। आज भी भारतीय नारीवाद खुद को ज्‍यादातर औरतों के सवालों तक ही सीमित रखता है, हालांकि पुरुषों को समझने के लिए उनको केंद्र में लाने का चलन पश्चिम में काफी पहले शुरू हो चुका था। सबाल्‍टर्न इतिहासकार ज्ञानेंद्र पाण्‍डेय की इस साल आई नई किताब ‘मेन ऐट होम’ भारत की कुछ नायकीय विभूतियों के घरेलू व्‍यवहार की पड़ताल कर के घर और बाहर के बीच मर्दानगी की फांक को समझने की कोशिश करती है। इस किताब की समीक्षा अतुल उपाध्‍याय ने की है, जो लोकसंगीत में मर्दानगी के तत्‍वों पर खुद शोध कर रहे हैं

पुस्तक अंश: हिन्दी-उर्दू शुरू में एक ही थीं, उन्हें बांटना भारत के विभाजन की छल भरी शुरुआत थी!

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हिंदी को लेकर आम हिंदीभाषियों में बहुत सी गलत धारणाएं और भ्रम हैं। जाहिर है, यह इतिहासबोध के अभाव और गौरवबोध के संकट के चलते हुआ है। एक ओर अंग्रेजी और दूसरी ओर उर्दू के प्रति दोहरा विद्वेष जो संस्‍कृतनिष्‍ठ हिंदी और संस्‍कृत के प्रति मोह को जन्‍म देता है, ऐतिहासिक रूप से गलत जमीन पर खड़ा है। भाषाविद् डॉ. पेगी मोहन ने अपनी किताब “Wanderers, Kings, Merchants: The Story of India through Its Languages” में हिंदी और उर्दू के कभी एक होने और फिर जुदा हो जाने के इतिहास पर बाकायदे एक अध्‍याय लिखा है! हिंदी दिवस पर वहीं से कुछ अहम अंश

Shanti Majumdar

भुला दी गईं माँओं और सवालिया नागरिकताओं के देश में शांति मजुमदार की कहानी का जी उठना…

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पांच साल पहले नागरिकता संशोधन विधेयक के खिलाफ देशव्‍यापी आंदोलन हुआ था। आज जब सैकड़ों की संख्‍या में पिछले चार माह से मुस्लिम बांग्‍लाभाषियों को चुन-चुन कर बांग्‍लादेश भेजा रहा है, नागरिकता के दावे रद्द किए जा रहे हैं और सरकारी कागजों का अदालतों में कोई अर्थ नहीं रह गया, सड़कें सूनी हैं। ऐसे में अचानक एक कहानी जिंदा हुई है- बंगाल की उस मां की कहानी, जिसने अपने नौ बच्‍चे धरती पर न्‍योछावर कर दिए फिर भी उसे अंत में यहां शरणार्थी ही माना गया। बीते 26 अगस्‍त को दिल्‍ली में मंचित हुए एक नाटक के बहाने नागरिकता के संकट पर अभिषेक श्रीवास्‍तव की कहानी

Tomb of Nawab Abdul Samad in Fatehpur, UP

फतेहपुर : हिंदुत्‍व की पुरानी समझदारी से इबादतगाहों के नए विवादों को समझने की अड़चनें

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देश की सेकुलर जमातों के ऊपर बाबरी विध्‍वंस का कर्ज इस कदर हावी है कि पिछले साल संभल हो, इस साल बहराइच या ताजा-ताजा फतेहपुर, हर जगह उन्‍हें नई अयोध्‍या ही बनती दिखाई देती है। इसके बरक्‍स, हर बार राज्‍य का धर्म में हस्‍तक्षेप और प्रत्‍यक्ष होता जाता है; हिंदुत्‍व की राजनीति और जटिल होती जाती है; जबकि हर बार जमीन पर बहुसंख्‍यकों की गोलबंदी कमतर। अयोध्‍या की घटना तो एक सुगठित आंदोलन की परिणति थी, लेकिन फतेहपुर के मकबरे पर इस माह दिखे बाबरी जैसे दृश्‍य? बाबरी के मुहावरे में आज के हिंदुत्‍व को समझना क्‍यों भ्रामक हो सकता है, संभल और फतेहपुर की जमीन से बता रहे हैं शरद और गौरव

Gabbar Singh, the most recognised face of Sholay

पूरे पचास साल: मौलिकता की बहसों के बीच फैलता एक सिनेमा का लोक-जीवन

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सांभा के ‘पूरे पचास हजार’ और गब्‍बर के ‘पचास-पचास कोस दूर’ वाले अतिपरिचित संवादों से कल्‍ट बन चुकी ‘शोले’ को आए इस स्‍वतंत्रता दिवस पर पूरे पचास साल हो रहे हैं। मनोरंजन का एक लोक‍रंजक उत्‍पाद कैसे लोक को घेरता है तो घेरता ही चला जाता है, ‘शोले’ यदि इसका जीवंत उदाहरण है तो इसकी वजह उसकी राजनीतिक पृष्‍ठभूमि है। यह फिल्‍म इमरजेंसी के बीचोबीच आई थी- एकदम चरम दिनों में, महज डेढ़ महीने में। आज भले घोषित इमरजेंसी नहीं है, लेकिन स्थितियां कुछ कम भी नहीं हैं और अन्‍याय व जुल्‍म के खिलाफ ‘शोले’ निरंकुशता के आकाश में अटल सूरज की तरह चमक रही है। ‘शोले’ की पृष्‍ठभूमि और प्रासंगिकता पर चर्चा कर रहे हैं श्रीप्रकाश