Culture

Manikarnika in its original form, 2019

खंडित हुआ महादेव का त्रिशूल: काशी विध्‍वंस के नये अध्‍याय मणिकर्णिका पर भ्रम-खंडन

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पिछले दिनों बनारस के मणिकर्णिका घाट पर तोड़ी गई अहिल्‍याबाई होल्‍कर की प्रतिमा को लेकर राष्‍ट्रीय स्‍तर पर जो बवाल मचा, उसके बाद इस घटना को झूठा ठहराने के कई प्रयास हुए। जब संस्कृति बनाम विकास पर बहस उठी, तो इस क्रम में कुछ ऐसा लेखन सामने आया जिसमें पौराणिक और मिथकीय सूत्रों के हवाले से मणिकर्णिका घाट पर चल रही तोड़फोड़ को आधुनिक विकास के मुहावरे में उचित या स्‍वाभाविक ठहराया गया। ऐसी मिथकीय कुव्‍याख्‍याओं के भ्रमजाल को तोड़ते हुए काशी की संस्‍कृति और जन के हक में कुछ तथ्‍यात्‍मक बातें बता रहे हैं बनारस से वरिष्‍ठ पत्रकार अजय राय

Gargi Chakraborty

हम दिल्ली में उनकी बाट जोहते रहे, वे कोलकाता से ही कॉमरेड सुमित के पास चली गईं…

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प्रतिष्ठित इतिहासकार, महिला और कम्‍युनिस्‍ट आंदोलन की महत्‍वपूर्ण आवाज डॉ. गार्गी चटर्जी बीते 2 मार्च को नहीं रहीं। उनका 78 वर्ष की उम्र में कोलकाता में निधन हो गया। अभी साल भर भी नहीं हुआ उनके जीवनसाथी सुमित चक्रवर्ती को गुजरे हुए जो साप्‍ताहिक पत्रिका मेनस्‍ट्रीम के संपादक हुआ करते थे और देश के बौद्धिक समाज के भीतर बचे-खुचे चुनिंदा नैतिक स्‍वरों में एक थे। सुमित चक्रवर्ती और गार्गी चक्रवर्ती के साथ अपनी मुलाकातों, संस्‍मरणों और प्रसंगों पर श्रद्धांजलि-स्‍वरूप विनीत तिवारी की टिप्‍पणी

Ram Singh Jakhad

राम सिंह जाखड़: राजनीतिक बंदियों की काल कोठरी में अतीत से आती उम्मीद की रोशनी

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पिछले साल की शुरुआत में भारत की जेलों में कैद लोगों की संख्‍या पांच लाख को पार कर गई थी। इनमें 75 प्रतिशत ऐसे बंदी थे जिनके मुकदमों की सुनवाई भी शुरू नहीं हुई थी। इन्‍हीं में सैकड़ों राजनीतिक कैदी भी हैं, जिन्‍हें भारत सरकार अलग से कोई श्रेणी नहीं मानती। इनकी संख्‍या बीते दो-तीन वर्षों में तेजी से बढ़ी है। भीमा-कोरेगांव के दर्जन भर बंदियों से लेकर उमर खालिद, सोनम वांग्‍चुक ऐसे कुछ परिचित नाम हैं। आजादी से पहले राजनीतिक बंदी रहे 22 फरवरी, 1916 को जन्मे छात्र नेता राम सिंह जाखड़ का जेल वृत्तान्‍त इन बंदियों के लिए एक प्रेरक गाथा है। आर्काइव के कोनों से निकली कहानी सुना रहे हैं अखिलेश यादव

Existential threat of AI

अगले दो से तीन साल में AI समूचे मीडिया को निगल जाएगा, मनुष्य को विस्थापित कर देगा!

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘परीक्षा पर चर्चा’ के दौरान विद्याथिर्यों से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के समझदारी भरे उपयोग का आग्रह करते हुए कहा है कि वे उस पर निर्भर न हों, बल्कि केवल दिशानिर्देश के लिए सहयोग लें। यह बात सुनने में जितनी अच्‍छी लगती है, उतनी ही सदिच्‍छा भरी है। AI जितनी तेजी से मानवीय उद्यमों की जगह छेकता जा रहा है, आने वाले दो से तीन साल में तकरीबन समूचे पारंपरिक मीडिया में वह मनुष्‍य की भूमिका का खत्‍म कर देगा। प्रोजेक्‍ट सिंडिकेट के AI संपादक चार्ल्‍स फर्गुसन ने AI कंपनियों के प्रमुखों से इस विषय में बात कर के एक चेतावनी भरा लेख लिखा है, जिसे पढ़ा जाना चाहिए

Joaquin Phoenix in a still from Joker (2019)

हँसना मना है : फ़रमाँ-बरदारी की पूंजी-केंद्रित संस्कृति में धूमिल पड़ता सार्वजनिक हास्यबोध

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हँसी मनुष्‍य की सबसे सहज अभिव्‍यक्ति है; हँसी हर दर्द की दवा है; लेकिन हँसना ही मर्ज बन जाए तब? पहली बार इमरजेंसी के दौरान हँसने पर रखी जा रही निगाह और लोकतंत्र के अंतिम क्षण पर निकलती निरंकुश हँसी की बात रघुवीर सहाय ने की थी। तब से लेकर अब तक, समाज में हँसी सहज नहीं रही है। अब हँसने के प्रयत्‍न करने पड़ते हैं, जैसा परसाई ने बरसों पहले कहा था, कि शीत और गर्मी के बीच से जो जितना वसंत निकाल सके, निकाल ले। दो पाटों के बीच फँसे ‘घायल वसंत’ में चोटिल हास्‍यबोध के सामाजिक इतिहास पर श्रीप्रकाश की नजर

A still from Farmers Movement 2020-21

किसान आंदोलन: पांच किताबें जिनमें दर्ज है अन्नदाता की बगावत और किस्मत का इतिहास

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स्‍वतंत्र भारत के इतिहास में उसकी राजधानी की चौहद्दी पर सबसे लंबे समय तक चले किसान आंदोलन को अब पांच साल पूरे हो गए हैं। आजकल पांच साल में स्‍मृतियां धुंधली पड़ जाती हैं। नई घटनाएं तो दिमाग पर तारी हो ही जाती हैं, ऊपर से अतीत को बदलने की कोशिशें भी हो रही हैं। फिलहाल बड़े जन आंदोलनों से तकरीबन खाली हो चुके इस समाज में पांच साल पहले घटे एक व्‍यापक आंदोलन को कैसे याद रखा जाए, कैसे समझा जाए और आगे उस समझ का क्‍या किया जाए, यह सवाल अहम है। किसान आंदोलन पर कुछ किताबें हैं, दस्‍तावेज हैं और पत्रिकाएं भी, जो इस काम को आसान बना सकती हैं। बीते पांच बरस में छपी ऐसी पांच चुनिंदा किताबों का जिक्र कर रहे हैं अभिषेक श्रीवास्‍तव

Speckled Cobra in a field near an agricultural worker, WHO

MP : तांत्रिक हो या अफसर, यहां सबके लिए है सांप के जहर में अवसर सिवाय मरने वाले के…

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कभी सपेरों का देश कहे जाने वाले भारत में सांप के काटे से मरने वालों की संख्‍या पूरी दुनिया में सर्पदंश से होने वाली मौतों की आधी से ज्‍यादा है। अस्‍पतालों का टोटा, अंधविश्‍वास की व्‍याप्ति और विलुप्‍त होते देसी उपचारक समस्‍या को और गहरा कर रहे हैं। जहररोधी उपलब्‍ध करवाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका, सरकार के निर्देश, और बीते सात साल से हर 19 सितंबर को मनाए जा रहे अंतरराष्‍ट्रीय सर्पदंश जागरूकता दिवस का कोई असर नहीं पड़ रहा है। उलटे, सांप भी अब भ्रष्‍टाचार की चपेट में आ गए हैं। अपनी तरह का मौलिक सांप घोटाला देखने वाले मध्‍य प्रदेश के सागर से सतीश भारतीय की रिपोर्ट

Indian historical figures depicted in Gyanendra Pandey's book

पुस्तक समीक्षा : भारतीय समाज के ऐतिहासिक किरदार अपने घर की औरतों के लिए कैसे ‘मर्द’ थे?

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बहुत लंबे समय तक लैंगिकता के प्रश्‍न का अध्‍ययन औरतों को केंद्र में रखकर किया गया। आज भी भारतीय नारीवाद खुद को ज्‍यादातर औरतों के सवालों तक ही सीमित रखता है, हालांकि पुरुषों को समझने के लिए उनको केंद्र में लाने का चलन पश्चिम में काफी पहले शुरू हो चुका था। सबाल्‍टर्न इतिहासकार ज्ञानेंद्र पाण्‍डेय की इस साल आई नई किताब ‘मेन ऐट होम’ भारत की कुछ नायकीय विभूतियों के घरेलू व्‍यवहार की पड़ताल कर के घर और बाहर के बीच मर्दानगी की फांक को समझने की कोशिश करती है। इस किताब की समीक्षा अतुल उपाध्‍याय ने की है, जो लोकसंगीत में मर्दानगी के तत्‍वों पर खुद शोध कर रहे हैं

पुस्तक अंश: हिन्दी-उर्दू शुरू में एक ही थीं, उन्हें बांटना भारत के विभाजन की छल भरी शुरुआत थी!

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हिंदी को लेकर आम हिंदीभाषियों में बहुत सी गलत धारणाएं और भ्रम हैं। जाहिर है, यह इतिहासबोध के अभाव और गौरवबोध के संकट के चलते हुआ है। एक ओर अंग्रेजी और दूसरी ओर उर्दू के प्रति दोहरा विद्वेष जो संस्‍कृतनिष्‍ठ हिंदी और संस्‍कृत के प्रति मोह को जन्‍म देता है, ऐतिहासिक रूप से गलत जमीन पर खड़ा है। भाषाविद् डॉ. पेगी मोहन ने अपनी किताब “Wanderers, Kings, Merchants: The Story of India through Its Languages” में हिंदी और उर्दू के कभी एक होने और फिर जुदा हो जाने के इतिहास पर बाकायदे एक अध्‍याय लिखा है! हिंदी दिवस पर वहीं से कुछ अहम अंश

Shanti Majumdar

भुला दी गईं माँओं और सवालिया नागरिकताओं के देश में शांति मजुमदार की कहानी का जी उठना…

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पांच साल पहले नागरिकता संशोधन विधेयक के खिलाफ देशव्‍यापी आंदोलन हुआ था। आज जब सैकड़ों की संख्‍या में पिछले चार माह से मुस्लिम बांग्‍लाभाषियों को चुन-चुन कर बांग्‍लादेश भेजा रहा है, नागरिकता के दावे रद्द किए जा रहे हैं और सरकारी कागजों का अदालतों में कोई अर्थ नहीं रह गया, सड़कें सूनी हैं। ऐसे में अचानक एक कहानी जिंदा हुई है- बंगाल की उस मां की कहानी, जिसने अपने नौ बच्‍चे धरती पर न्‍योछावर कर दिए फिर भी उसे अंत में यहां शरणार्थी ही माना गया। बीते 26 अगस्‍त को दिल्‍ली में मंचित हुए एक नाटक के बहाने नागरिकता के संकट पर अभिषेक श्रीवास्‍तव की कहानी