Manglesh Dabral (16 May 1948 – 9 December 2020)

मंगलेश डबराल के अभाव में बीते तीन साल और संस्कृति से जुड़े कुछ विलंबित लेकिन जरूरी सवाल

वे ‘नुकीली चीजों’ की सांस्‍कृतिक काट जानते थे लेकिन उनका सारा संस्‍कृतिबोध धरा का धरा रह गया क्‍योंकि न तो उन्‍होंने पिता की टॉर्च जलायी न बाहर वालों ने आग मांगी। वे बस देखते रहे और रीत गए। शायद कभी कोई सुधी आलोचक मंगलेश जी के रचनाकर्म में छुपी उस चिड़िया को जिंदा तलाशने की कोशिश कर पाए, जिसका नाम संस्‍कृति है और जिसके बसने की जगह इस समाज की सामूहिक स्‍मृति है।

वसुंधरा के लंबे दबाव से उबरा आरएसएस राजस्थान चुनाव में कुछ ज्यादा सक्रिय क्यों है?

बीस साल से वसुंधरा राजे के पाश में फंसा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पहली बार खुलकर सांस लेता दिख रहा है, तो राजस्थान के चुनाव में भी पर्याप्त सक्रिय है। उसकी सक्रियता भले ऊपर से दिखती न हो, लेकिन हर प्रचारक गेमप्लान और स्ट्रेटजी की बात करता सुनाई देता है। आखिर क्या है यह रणनीति और संघ इससे क्या हासिल करना चाह रहा है? राजस्थान से लौटकर अभिषेक श्रीवास्तव की रिपोर्ट

वेदांता के खिलाफ अब कालाहांडी में खुल रहा है मोर्चा, लेकिन अबकी सामने अदाणी भी है…

नियमगिरि आंदोलन की कामयाबी के बाद माना गया था कि पूर्वी तट के आदिवासियों के पहाड़ खनन से बच जाएंगे। आज दस साल बाद ठीक उलटा हो रहा है। वेदांता को तो बॉक्‍साइट खदान मिली ही है, अदाणी भी दो खदानों के साथ मैदान में है। संघर्ष का नया मोर्चा खुल रहा है कालाहांडी जिले के सिजिमाली और खंडुआलमाली में, जो देश का सबसे गरीब इलाका है। पिछले हफ्ते हुई दो जनसुनवाइयों में आदिवासियों ने कंपनी का जैसा प्रतिरोध किया है वह प्रेरक है, लेकिन यह लड़ाई तिहरी है और चुनाव पास हैं। अभिषेक श्रीवास्‍तव की लंबी रिपोर्ट

बदलाव के सुराग : केवल एक दंगा कैसे दस साल के भीतर भाईचारे का पलड़ा पलट देता है

मुजफ्फरनगर में दस साल पहले दंगा हुआ था। सितंबर 2013 का महीना था। तब यूपी में सरकार भाजपा की नहीं थी। कमीशन बना, रिपोर्ट आई, समाजवादी सरकार बरी हो गई। समाज ने धीरे-धीरे खुद को संभाला। फिर हाइवे बने, किसान आंदोलित हुए, यूट्यूब चैनल पनपने लगे। दस साल में दुनिया इतनी बदल गई कि एक मामूली स्‍कूल की छोटी सी घटना तक सुप्रीम कोर्ट में पहुंचने लगी। मुजफ्फरनगर के गांव-कस्‍बों में लोग इस बदलाव को कैसे देख रहे हैं? क्‍या सोच रहे हैं? मुजफ्फरनगर से लौटकर अभिषेक श्रीवास्‍तव की मंजरकशी

यूपीए या एनडीए? गदर ने कहा था- हिरन से पूछो, शेर अच्छा या चीता!

गुम्‍माडि विट्ठल राव उर्फ ‘गदर’ जिंदगी भर घूम-घूम कर जनता को अपने गीतों से सत्‍ताओं के खिलाफ जगाते रहे। तेलंगाना राज्‍य बन जाने के बाद उन्‍होंने केसीआर द्वारा जमीनों की लूट के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। तीन महीने पहले तक वे सरकार के खिलाफ पदयात्रा कर रहे थे। अचानक 6 अगस्‍त को हुई मौत के बाद उन्‍हें राजकीय सम्‍मान दे दिया गया। जनता के एक और नायक को जीते जी नहीं, तो मरने के बाद सत्‍ता ने अपनी चादर में समेट लिया। 2006 में गदर के साथ हुई मुलाकात के बहाने उन्‍हें याद कर रहे हैं अभिषेक श्रीवास्‍तव

दिल्ली की जंग: सरकार को दिखाई नहीं दे रही यूक्रेन युद्ध से बच कर लौटे MBBS छात्रों की व्यथा

लोगों को लगता है कि विदेश में डॉक्‍टरी पढ़ने वाले छात्र या तो बहुत पैसे वाले घरों से होते हैं या पढ़ाई में कमजोर होते हैं। सच्‍चाई इसके उलट है। यूक्रेन की जंग से किसी तरह बचकर आए हजारों एमबीबीएस छात्र आज दिल्‍ली की सड़कें छान रहे हैं ताकि उन्‍हें किसी और देश में ट्रांसफर मिल सके, लेकिन सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही। मई 2024 के बाद ऐसे बीस हजार छात्रों का भविष्‍य अनिश्चित होने जा रहा है।

तमिलनाडु: राज्यपाल का द्रविड़ प्राणायाम और एक सनातन संवैधानिक संकट

बिहार के रहने वाले पूर्व खुफिया अधिकारी रवि को जब नगालैंड से तमिलनाडु भेजा गया था, तभी कुछ नेताओं ने इस नियुक्ति को राजनीतिक करार दिया था। रवि ने इन तमाम आशंकाओं को बीते दो साल में सच साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। अबकी सीधे मंत्री को बर्खास्त कर के उन्होंने साफ बता दिया है कि वे किसके लिए काम कर रहे हैं। घटना नई है, रीत पुरानी।

नेपाल का फर्जी शरणार्थी घोटाला और प्रचंड की भारत यात्रा

फर्जी शरणार्थी घोटाले की आंच में तप रहे नेपाल के प्रधानमंत्री प्रचण्‍ड अपनी भारत यात्रा पर प्रधानमंत्री मोदी के साथ द्विपक्षीय वार्ता में भूटानी शरणार्थियों का मुद्दा उठा पाएंगे या नहीं? कुछ लोगों की उम्‍मीद भारत से भी है क्‍योंकि ‘भूटान भारत की सुनता है’, लेकिन इस मसले पर अतीत के संदिग्‍ध रिकॉर्ड के मद्देनजर क्‍या भारत भूटान से कुछ कह पाएगा, यह भी एक सवाल है। फर्जी शरणार्थी घोटाले पर चर्चा के बीच नेपाली मूल के भूटानी शरणार्थियों यानी ल्‍होत्‍सम्‍पा समुदाय की व्‍यथा याद कर रहे हैं अभिषेक श्रीवास्‍तव

भारत का पत्रकार मानवाधिकार कार्यकर्ता कैसे बना?

इस प्रेस स्‍वतंत्रता दिवस पर युनेस्‍को की थीम में एक अदृश्‍य सबक छुपा है, कि अब समुदाय, पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता के बीच अंतर बरतने का वक्‍त जा चुका